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द वायर के 5 साला होने पर जाने-माने पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन का कहा पढ़ा जाए

द वायर के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन
द वायर के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन

द हिंदू अंग्रेजी दैनिक के सम्पादक रहे प्रसिद्ध पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने ठीक आज से 5 साल पहले स्वतंत्र रूप से डिजिटल मीडिया में प्रवेश किया, उन्होंने न्यूज वेबसाइट द वायर की स्थापना की। आज वो वेबसाइट तीन भाषाओं में संचालित हो रही है। बहुत कम संसाधनों और कम मैन पावर छोटी से जगह में शुरू हुई इस वेबसाइट ने न सिर्फ देश में नाम कमाया बल्कि विदेशों में इसकी समान रूप से ख्याति है। भारत में जब इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया के साथ हजारों लाखों वेबसाइट हैं, वहां द वायर का स्थापित हो जाना उतना आसान नहीं था। मुझे इन पांच सालों में पत्रकारिता का कोई बड़ा कारनामा अगर पनामा पेपर को छोड़ दें तो याद नहीं आता। और पनामा पेपर में सीधे तौर पर भारतीय संस्थानों या पत्रकारों की भागेदारी नहीं थी। ये विदेशी खोजी पत्रकारों के समूह की पड़ताल थी। भारतीय मीडिया जो लिखता दिखाता है वो तो सुधीर बनाम रवीश तक सिमट जाता है। लेकिन द वायर ने ऐसी रिपोर्ट की हैं जिनसे सत्ता की चूले हिल गईं। अमित शाह के बेटे की बेनामी संपत्ति की रिपोर्ट हो या अन्य तमाम खबरें। द वायर चर्चा में बना। सरकार विरोधी छवि के बावजूद देश विदेश में वायर को खास लोकप्रियता मिली। वैसे मीडिया संस्थाओं का सरकार विरोधी कहलाना उनके लिए बुराई नहीं अच्छाई है।

ऐसे में द वायर के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन ने एक विशेष सम्पादकीय लिखी है, जिसमें हम द वायर से साभार यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे पढ़ा जाना चाहिए। ये उनके कर्मपथ को समझने की दिशा में एक कदम होगा। 

 

 

 

मीडिया के ऐसे परिदृश्य में, जहां कई अख़बारों का इतिहास तक़रीबन 200 साल पुराना है, द वायर का पांच साल पूरे करना शायद बहुत महत्वपूर्ण न लगे.

लेकिन भारत में डिजिटल पत्रकारिता को आए अभी एक दशक से कम ही समय हुआ है, लेकिन इसी छोटी समयावधि में इसने कई चुनौतियां देखी हैं- तेजी से बदलती तकनीक से लेकर वित्तीय संसाधनों की कमी और शासकीय द्वेष.

पांच साल पहले जब आज ही के दिन द वायर शुरू हुआ था, तब इस क्षेत्र की स्थितियां ज्यादा अनिश्चित थीं. आज से मुकाबले यहां काफी कम लोग थे और हमारा पूंजी कमाने या निवेशकों को लाने के बजाय एक नॉट फॉर प्रॉफिट (गैर-लाभकारी) संस्थान बनाने के फैसले को कहीं ज्यादा जोखिमभरा माना गया था.

लेकिन इस बात की गवाही तो हमारे पाठक और दर्शक देंगे कि हमने गैर-लाभकारी रहने का जो जोखिम लिया था- जिससे हमारी पत्रकारिता आज़ाद और किसी भी दबाव से मुक्त रहे- वो सही साबित हुआ है.

सच तो यह है कि हमारा किसी ‘बॉस’ को जवाब न देना ही हमें उन रिपोर्ट्स को सामने लाने में मदद करता है, जो चाहे किसी के भी खिलाफ जाती हों.

लेकिन जैसे-जैसे डिजिटल मीडिया ने पांव फैलाए हैं, ऑनलाइन रहने वाले पाठकवर्ग को विभिन्न विकल्प मिले हैं, लेकिन पूरी न्यूज़ इंडस्ट्री या पत्रकारिता के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता.

इन पांच सालों में प्रेस की आजादी पर लगातार हमले हुए, अंदर से भी और बाहर से भी, जिसने न केवल इसकी आजादी बल्कि विश्वसनीयता भी कम की है.

सरकार मीडिया को एक साथी की तरह देखती है और इसकी मदद से अपनी छवि चमकाती है. कई बड़े मीडिया हाउस स्वेच्छा से इस योजना का हिस्सा बने हैं.

कई चर्चित अखबार और टीवी चैनल सरकारी भोंपू बन चुके हैं, जो सरकार के दावों को दिखाते हैं और अपनी आलोचना इसके विरोधियों के लिए बचा लेते हैं.

सरकार या इसके नेतृत्व से कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं किया जाता, जवाबदेही की कोई मांग सामने नहीं आती. चीखते हुए चैनलों, नफरत और धर्मांधता उगलते बेशर्म एंकरों के बारे में कम ही कहा जाए तो बेहतर है.

वो बहादुर पत्रकार, जो अपने पेशे के उसूलों के साथ खड़े होते हैं, उन्हें अक्सर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. कुछ की हत्या कर दी गई, कइयों की नौकरी गई और कुछ के खिलाफ अदालतों में मामले चल रहे हैं.

द वायर भी इस दबाव से मुक्त नहीं है, न केवल मानहानि के मुकदमे बल्कि अब तो बात गैर क़ानूनी आपराधिक मुकदमे तक पहुंच गई है.

लेकिन हमारी चुनौतियां जम्मू कश्मीर के उन तीन पत्रकारों– जिन पर यूएपीए कानून के तहत मामला दर्ज हुआ- या कोयंबटूरअंडमान और ऐसे ही जगहों के पत्रकारों से कम हैं, जिन्हें फर्जी आरोपों में गिरफ्तार किया गया.

इस बात की वाजिब वजहें हैं कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के 180 देशों की सूची में भारत 142वें स्थान पर है. फिर भी सूचना और प्रसारण मंत्री की इस बारे में प्रतिक्रिया यह है कि उनकी सरकार इन सर्वेक्षणों का भंडाफोड़ करेगी.

द वायर को सहयोग देने का यही समय है. अगर द वायर अब तक बचा हुआ है, तो इसकी वजह हमारे पाठकों और दर्शकों का साथ रहना है.

वे हमारे साथ खड़े रहे और नियमित रूप से आर्थिक सहयोग देकर हम पर अपना भरोसा जताया. इस आर्थिक सहयोग के बगैर हम वहां नहीं होते जहां आज हैं.

सच्ची पत्रकारिता बची रहेगी

भारतीय पत्रकारिता अभी बहुत नाजुक दौर में है. ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि अब भारत का मीडिया सुधारों से परे जा चुका है और यह कभी अपनी पेशेवर ईमानदारी वापस नहीं पा सकेगा.

हो सकता है उनके पास ऐसा कहने की वजह हों. लेकिन हिंदुस्तान में अब भी ऐसे अखबार, टीवी चैनल और वेबसाइट हैं, जो ये लड़ाई लड़ना चाहते हैं. साथ ही बहुत से पत्रकार- जिनमें कई युवा भी हैं, बदलाव लाने के लिए काम कर रहे हैं.

इसी के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे स्वतंत्र पत्रकारों की संख्या बढ़ रही है, जो जनता के हित के लिए काम करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि बड़े मीडिया संस्थानों की चुप्पी के बीच उनकी आवाज जगह बना सके.

अब भी हजारों कहानियां बाकी हैं. लॉकडाउन की चुनौतियों के बीच, जिन लोगों को मुख्यधारा का हिस्सा होने के बावजूद शायद ही कभी मुख्यधारा के मीडिया में जगह मिलती है, वे हमारी चेतना का हिस्सा बन चुके हैं.

पूरे देश में पत्रकार इस मौके पर खड़े हुए हैं और उनकी कहानियां बता रहे हैं, हालांकि कुछ मीडिया संस्थानों ने इसकी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की है, लेकिन भारतीय सच जानना चाहते हैं न कि सजा-संवरा प्रचार. और यही वजह है कि सच्ची और अच्छी पत्रकारिता हमेशा आगे बढ़ेगी.

द वायर का मकसद अपने पाठकों और दर्शकों तक जनवादी पत्रकारिता लाना है और हम जानते हैं कि आप हमारा सहयोग करते रहेंगे.

जैसा कि हमने पांच साल पहले कहा था कि हम नये तरीके से ऐसे मीडिया का निर्माण करना चाहते हैं जो पत्रकारों, पाठकों और जिम्मेदार नागरिकों का संयुक्त प्रयास हो.

हम अपने इस सिद्धांत पर टिके रहे हैं और यही आगे बढ़ने में हमारी मदद करेगा

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