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मीडिया में महासंकटः पत्रकारों का बुरा दौर शुरू

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एडीटर अटैकः 

डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

pratap.prashant@rediffmail.com

 

अभी थोड़ी ही देर पहले टॉइम्स ऑफ इंडिया समूह के सम्पादक स्तर के एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र से बात हो रही थी। बेहद डरे हुए थे। उनकी बातचीत से ऐसा जान पड़ रहा था कि सबकुछ ठीक नहीं है। कह रहे थे हमारे समूह में सबसे पहले पत्रकारों व अन्य विभागों के कर्मचारियों की सैलरी में कटौती की गई। फिर छंटनी की गई। अबतक तकरीबन सौ लोगों को समूह ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। लेकिन अब जो धमाका हुआ है वो न सिर्फ टाइम्स समूह के लिए अपितु समूचे मीडिया जगत के लिए चिंता का सबब है। टाइम्स समूह ने अपने दो सहयोगी अखबारों क्रमशः इकोनॉमिक टाइम्स हिंदी व सांध्य टाइम्स के प्रकाशन पूरी तरह से स्थगित कर दिए हैं। दोनों ही अखबारों की अपनी विशेष पहचान और साख थी।

बैनेट कॉलमैन समूह देश का प्रमुख या कहें शीर्ष मीडिया समूह कहा जाता है। अगर वहां ये स्थिति है कि पहले सैलरी काटी गई, फिर लोगों को निकाला गया और अब अखबारों के बंद होने का क्रम शुरू हो गया है। तो अन्य समूह अपना निर्वाह कैसे करेंगे। ये बड़ा सवाल है। कहा ये भी जा रहा कि मेट्रो सिटीज की शान कहे जाने वाले टाइम्स समूह के ही प्रमुख हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स को भी बंद किया जा सकता है। हालांकि मैंने जब संस्थान के वरिष्ठ लोगों से बात की तो उन्होंने इस बात की पुष्टि नहीं की लेकिन संभावना से इंकार भी नहीं किया। कोरोना का असर हर क्षेत्र में देखने को मिल ही रहा है लेकिन मीडिया भी अब इससे प्रभावित दिखने लगा है। टाइम्स समूह में जो हलचल मची हुई है उससे सबक लेना होगा। ये अलर्ट है।

मैंने कई विशेषज्ञों से बात की उनका कहना है कि ये तो शुरूआत है। आगामी समय में और त्रासद भरी सूचनाएं मीडिया जगत से मिलना शुरू होंगी। लॉक डाउन कब तक चलेगा, सरकारी व कार्पोरेट विज्ञापन कब तक मीडिया से दूर रहेंगे, लोग कबतक अखबारों को खरीदने से बचेंगे (क्योंकि कोरोना के डर से लोग अखबार खरीदना बंद कर चुके हैं औऱ अखबारों के सुर्कुलेशन जमींदोज हो गए हैं)। इन तमाम बातों पर मीडिया का अस्तित्व निर्भर करेगा और खासकर के प्रिंट मीडिया का। क्योंकि कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित प्रिंट मीडिया उद्योग हुआ है। आगामी समय में अगर सबकुछ सामान्य नहीं हुआ तो हम लोग देखेंगे कि अन्य मीडिया समूह भी टाइम्स समूह की राह पर चल सकते हैं। हालांकि वेतन कटौती, संस्करणों को बंद करना, पेजों की संख्या कम करना,  छंटनी, ये तमाम मीडिया समूहों में लगातार जारी है। चाहे वो प्रिंट या इलेक्टानिक या डिजिटल समूह हों।

पत्रकारों के अब ये हाल हो चुके हैं कि उन्हें स्वयं नहीं पता कि इस बार की सैलरी कितनी कट के आएगी, और दुख की बात ये है कि वो इसके लिए मानसिक रूप से तैयार भी हैं सिवाय किसी विरोध के, क्योंकि पत्रकार चाहते हैं कि सैलरी में कटौती हो जाए तो हो जाए कम से कम नौकरी तो बची है। लेकिन नौकरी कबतक बचेगी ये भी कहा नहीं जा सकता। मीडिया जानकारों का कहना है कि खासतौर पर अखबारों में प्रसार संख्या का खत्म हो जाना, सरकारी और कारपोरेट विज्ञापनों के एकदम खत्म हो जाने से बहुत तगड़ा घाटा मालिक उठा रहे हैं। और वो कबतक भारी भरकम तनख्वाह दे पाएंगे औऱ व्यवस्था का खर्च उठा पाएंगे।  सबकुछ जल्दी कुछ महीनों में नहीं सुधरा तो बहुत संभव है कि हमें सुनने को मिले कई बड़े अखबार धऱाशायी हो जाएं। अपने संस्करण बंद कर दें, पृष्ठों में कमी कर दें, या प्रकाशन ही बंद कर दें। ऐसे में पत्रकार के पेट में लात पड़नी तय है।

अखबार प्रबंधन पहले ही पृष्ठों की संख्या में कमी करके, फीचर को लगभग खत्म करके, स्टाफ की छंटनी करके, सैलरी में कटौती करके नुकसान की भरपाई की कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन बहुत लम्बे समय तक ये तरीके कारगर होने वाले नहीं हैं। अगला कदम यही होगा कि प्रकाशन ही रोक दिए जाएं।

इस दौर में संकट की बात ये है कि जल्दी नौकरी नहीं मिलेगी। क्योंकि हर संस्थान फायर ही कर रहा है, वेकेंसी बनने की कहीं कोई स्थिति नहीं है। ऐसे में एक होशियारी ये भी है कि बेशक सैलरी कटौती हो पर आक्रोश दिखाए बगैर काम करते रहें, साथ ही वैकल्पिक तौर पर अगर कोई बिजनेस या अन्य कमाई के स्रोत हैं तो उनपर जरूर गौर करें। क्योंकि आना वाला समय पत्रकारों के हित में नहीं है। आपकी नौकरी किसी भी वक्त जा सकती है। आप यू ट्यूबर हैं, कोई साइट चलाते हैं, पारिवारिक कोई व्यवसाय है। उसके लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहें। क्योंकि पत्रकारों के लिए हाल फिलहाल नौकरी से निकल जाने के बाद नौकरी मिलने की संभावना वर्षों बनने से रही। तो अपनी पीठ तैयार करके रखें। फ्री लांसिंग के लिए संपर्क साधें, अनुवाद कर लेते हैं तो किताब प्रकाशनों से जुड़ें, प्रूफ रीडिंग अन्य काम जो प्रिंट आदि से जुड़ा है उसका लाभ लें।

शेष कामना यही है हमारी विरादरी सुरक्षित व स्वस्थ रहे। दाना पानी चलता रहे।

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