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पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं कैसे दूं…

डीडी न्यूज
डीडी न्यूज के कैमरा मैन योगेश, जिनका कोरोना से निधन हो गया

एडीटर अटैक-डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक, मीडिया मिरर

pratap.prashant@rediffmail.com

उमंग, उल्लास और उत्साह का तो ये दौर ही नहीं है। फिर भला शुभकामनाओं की बात कैसे हो भला। मुझे आश्चर्य़ है इन हालातों में कैसे कोई पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं दे सकेगा औऱ कैसे कोई ले सकेगा। जब पत्रकार आज जिंदगी औऱ रोटी के बीच झूल रहे हैं। उन्हें दो में से किसी एक को चुनना है और वो क्या चुनेंगे। हम सब जानते हैं।

सूचना मिल रही है कि कल हिंदुस्तान पटना का टैबलॉयड स्मार्ट युवा बंद कर दिया गया है। औऱ वो भी हमेशा के लिए। इस टैबलायड से जुड़े दर्जनभर पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। दैनिक भास्कर पटना ने अपने चार वरिष्ठ पत्रकारों को घर बैठने के लिए कह दिया है। दैनिक जागरण और प्रभात खबर में भी ऐसी ही सुगबुगाहट है। ये हालिया घटनाक्रम है। इससे पूर्व टॉइम्स ऑफ इंडिया समूह ने तकरीबन सौ से ज्यादा पत्रकारों को फायर किया, जिसमें एनबीटी दिल्ली एनसीआर के ही तीस से ज्यादा लोग हैं। क्विंट, न्यूज नेशन ने भी छंटनी की। पंजाब केसरी ने अपने कैमरा पर्सन सहित कई लोगों को घर बैठा दिया। समूह ने 2 महीने से पत्रकारों को तनख्वाह नहीं दी है। आशंका है वेतन जब भी मिले, कटौती करके मिले। जैसा कि एनबीटी प्रबंधन ने किया है।

कोरोना के इस भयावह दौर में जब चारो ओर अशांति, डर और अस्थिरता का माहौल है, तब पत्रकारिता उद्योग की भी इस संक्रमण काल ने रीढ़ तोड़ दी है। ऐसा शायद कभी सोचा नहीं गया होगा कि मीडिया चारो खाने चित्त हो जाएगी। पत्रकारों की सैलरी में कटौती कर दी गई, पत्रकारों को बड़ी संख्या में निकाल दिया गया और ये क्रम जारी है। आगामी समय में किसकी नौकरी जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। अखबार अपने संस्करण बंद कर रहे हैं। टॉइम्स ऑफ इंडिया जैसे समर्थ संस्थान धरातल पर आ गए हैं। अपनी फीचर सेवाएं बंद कर दीं, लोगों को निकाल दिया। अपने समूह के दो प्रमुख अखबारों को हमेशा के लिए बंद ही कर दिया। क्रमशः सांध्य समाचार दिल्ली व इकोनॉमिक टाइम्स हिंदी। इनमें काम करने वाले पत्रकार सड़क पर आ गए, तब जब उन्हें आर्थिक सुरक्षा कवच की सबसे ज्यादा जरूरत है। अखबारों ने पृष्ठों की संख्या घटा दी, रंगीन की जगह श्याम-श्वेत अखबार निकल रहे। क्या ऐसा हमने सोचा था कभी। दिल्ली के तमाम बड़े अखबार आठ से दस पन्नों में सिमट गए। इन्होंने अपने पुलआउट खत्म कर दिए। जब काम खत्म हो या गया या कम हो गया तो पत्रकारों को निकाला जाना शुरू हो गया। पंजाब केसरी में पत्रकारों को 2 माह से वेतन नहीं मिला। इंडिया न्यूज समूह में वेतन की मारामारी लंबे समय से चल रही। न्यूज नेशन से पत्रकारों के हटाने का क्रम शुरू है। जी न्यूज का मुख्यालय ही कोरोना संक्रमण की जद में आकर सील हो गया। अब उसका संचालन समूह के ही अन्य चैनल विओन के दफ्तर से हो रहा है। सवाल ये है कि जी न्यूज में 30 के आसपास कोरोना संक्रमित पत्रकार मिले हैं। उनका इलाज और इलाज के बाद उनके रोजी रोटी का क्या होगा। दैनिक जागरण आगरा के पंकज कुलश्रेष्ठ, दिव्य भास्कर गुजरात के एक पत्रकार और दूरदर्शन के पत्रकार योगेश की कोरोना से मौत हो गई। सवाल ये है कि इनके लिए सरकारें, पत्रकारिता संगठन और इनके संस्थान क्या करेंगे ताकि संकट के इस दौर में इनके परिवार का भरण पोषण हो सके। क्या इन मृतक पत्रकारों के परिजनों को कोई आर्थिक सहायता दी गई अबतक। अनिवार्य सेवाओं के अंतर्गत आने वाले पत्रकार जब काल के गाल में समा चुके हैं ऐसे में उनके लिए थाली, शंख, कटोरे पिटवाने वाली सरकारें उनके लिए क्या कर रही हैं। ये जानना जरूरी है। लगातार ये मांग की जाती रही कि तमाम अनिवार्य़ सेवाओं के कर्मियों की तरह पत्रकारों के लिए भी केंद्र सरकार बीमा घोषित करे। संस्थान जो काम ले रहे हैं वो मदद सुनिश्चित करें। पर क्या ऐसा हुआ। नहीं। क्या ये पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाओं का वक्त है।

आपको मालूम है कि किन हालातों में पत्रकार काम कर रहे हैं। उनके पास दो विकल्प हैं। रोटी या जिंदगी। मीडिया संस्थानों ने कोरोना के प्रारंभिक दौर में ही जो रवैय्या अपनाया है। उसमें पत्रकार मौत या फिर बेरोजगारी के मुहाने पर खड़ा हो गया है। नौकरी करता है तो कोरोना ने मारा, नहीं करता है तो भूख ने मारा।

वेतन में कटौती हो गई है, पत्रकारों को निकाला जा रहा है। कुलमिलाकर जो पत्रकार अभी संस्थानों में काम कर रहे हैं वो इतने दबाव में आ चुके हैं कि कोरोना के भय के बीच काम करते रहो, वरना नौकरी चली गई तो रोटी के लाले पड़ जाएंगे। बावजूद संस्थान जिसे निकालना चाह रहे हैं उसे बगैर किसी आधार के निकाल ही रहे हैं। चाहे डेस्क के साथी हों या फील्ड के सभी कोरोना के संक्रमण से डरे हुए हैं लेकिन बगैर किसी न नुकुर के ड्यूटी बजा रहे हैं। भारतीय श्रम कानून मीडिया मुगलों के आगे एक बार फिर नतमस्तक हैं। कोई भी कानून ऐसा नहीं है जो मीडिया मालिकों से पूछे कि आखिर संकट के इस दौर में पत्रकारों को क्यों निकाला जा रहा है औऱ आप पर कार्रवाई हो सकती है। कोई कानून ऐसा नहीं दिखता। प्रधानमंत्री ने भी अपने संबोधन में कहा था कि श्रमिकों को न निकाला जाए। पर मीडिया मालिक लगातार छंटनी कर रहे हैं। इन्हें किसी का भय नहीं है। जिन मीडिया संस्थानों में दो दो माह से वेतन नहीं मिला यकीन मानिए उनके पत्रकारों के पास शायद ही अगले कुछ दिनों के राशन की भी व्यवस्था हो। पत्रकार भी दिहाड़ी मजदूर ही हैं, इनकी मासिक तनख्वाह का मतलब है महीने भर का गुजारा। अब तनख्वाह बंद है कई माह से तो गुजारा कैसे हो। दिल्ली की मीडिया में 70 प्रतिशत पत्रकार बाहरी मूल के हैं। जो किराए पर रहते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं। तनख्वाह के अलावा कमाई का उनके पास कोई स्रोत नहीं है।  वो कैसे निर्वाह करेंगे। एक तो 2 माह से वेतन नहीं है, उसके बाद भी ये तय नहीं है कि वेतन पूरा आएगा या नहीं और उसके बाद ये चिंता हर मीडिया समूह के पत्रकारों को है कि फायर करने के क्रम में कहीं अगला नम्बर उनका न हो। जान हंथेली पे लेकर पत्रकार नौकरी पर जा रहा है। अगर उसे किसी भी तरह की स्वतंत्रता होती या जॉब सिक्योरिटी होती तो वो रिस्क न लेता। बावजूद उसकी रोटी जलने जा रही है। औऱ हम पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं दे रहे हैं… नहीं.. मुझसे नहीं होगा।

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