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फाटन की गोली ले लो साहब…

उसी हथिनी की तस्वीर, जिसकी हादसे में मृत्यु हुई।

जानवरों के प्रति मनुष्य की क्रूरता को दर्शाता एक चित्र

एडीटर अटैक- डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 

मुझे याद है मैं उत्तरप्रदेश के चित्रकूटधाम कर्वी स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने के लिए बैठा था। वहां कुछ आदिवासी जनजाति के लोग कुछ ऐसा बड़बड़ाते हुए निकल रहे थे कि फाटन की गोली ले लो साहब.. जैसे आमतौर पर रेलवे स्टेशनों में लोग तमाम दूसरी चीजें बेंचते हैं। मुझे वैसा ही लगा। महानगरीय स्टेशनों की अपेक्षा कर्वी बेहद छोटा और कह सकते हैं जंगल से जुड़ा स्टेशन है। आपसपास पहाड़ियां औऱ घने जंगल हैं।

मैंने आवाज सुनकर सोचा कि कोई खाने पीने की ही वस्तु होगी जिसे ये लोग फाटन की गोली कहकर बेच रहे हैं। उतने में  मैं देखता हूं कि मेरे बगल में बैठे एक बुजुर्ग ने आवाज लगाकर गोली बेचने वाली एक महिला को रोका और उससे कुछ बात करने लगा। मैं जिज्ञासावश पास जाकर खड़ा हो गया। मैंने सुना कि वो आदमी बोल रहा था स्थानीय भाषा में कि गोली काम त करी, पिछले बार हम लै गै रहेन तबहूं दर्द न मिटान। मतलब कि पिछली बार हम गोली ले गए थे लेकिन दर्द नहीं खत्म हुआ। इस बार काम करेगी न?  वो अपने पैरों की हड्डियों की ओर इशारा करते हुए ऐसा बेचने वाली से कह रहा था। तब मुझे ये बात तो पता लगी कि गोली दर्द मिटाने की है। उसके बाद शायद बेचने वाली ने कुछ गोलियों की कीमत पचास रुपए से शुरुआत की औऱ अंत में 10 रुपए में दे दीं। मैं ये सब देख रहा था।

उसके बाद मैंने बेचने वाली औरत को रोका और इस संदर्भ में बातचीत करना शुरू की। तो उसने बताया कि चमगादड़ की हड्डियों को ही फाटन की गोली बोलते हैं। ये बेचने वाले चमगागड़ों को मारकर उनकी हड्डियों को गोली के आकार में छोटा छोटा काट लेते हैं और बेचते हैं। इनका ऐसा मानना है कि चमगादड़ की हड्डी जिस जगह में दर्द हो वहां बांधने से संबंधित जगह का पुराना दर्द, जोड़ों व एड़ी का दर्द चला जाता है। आदिवासियों द्वारा चमगादड़ों को मारना, उनकी हड्डियों को फाटन की गोली के नाम से बेचना और रोजी रोटी कमाना एक बात है, पर सवाल ये है कि एक जिला स्तर के स्टेशन में जहां स्टेशन स्टाफ औऱ रेलवे पुलिस हरदम मौजूद रहती है, वहां सरेआम पक्षियों की हड्डियां बेची जा रही हैं और कोई रोकने वाला नहीं है। जैसे कोई चने बेच रहा है, कोई कुरकुरे, वैसे ही फाटन की गोली। न जाने कब से ये व्यवसाय चल रहा होगा और न जाने कबतक चलेगा। कौन दोषी है किसी को फुरसत नहीं। पर चमगादड़ों की हत्याएं जारी हैं।

ये तो एक घटना आंखों देखी। लेकिन ऐसे न जाने कितने मामले होंगे जहां वन्य जीवों की हत्याएं रोजगार और व्यवसाय के लिए की जाती हैं। मैं इस संदर्भ की बात इसलिए आज कर रहा हूं क्योंकि हाल में केरल में एक हथिनी की असमायिक मृत्यु के बाद देशभर में रुदन और हंगामा मचा है। क्या आम लोग क्या खास सब इस घटना से खिन्न हैं। पर ये नया नहीं है। मैंने ही एक घटना बताई। अब जीव तो जीव है। क्या हाथी क्या चमगादड़। मैं हथिनी वाली घटना के पक्ष में नहीं हूं, मुझे भी दुख है। लेकिन मैं ये बताना चाहता हूं कि किसी एक घटना के लिए  नहीं बल्कि समूचे वन्य जीव जंतुओं के लिए सामूहिक लड़ाई की जरूरत है। बरसाती नाले की तरह उफन कर किसी घटना विशेष के लिए विलाप या विरोध या कार्रवाई,  क्रांति नहीं होती।

केरल की जो घटना है, वो ये कि हथिनी ने एक ऐसा नारियल खा लिया, जिसमें बम लगाए गए थे और हथिनी के मुंह में वो फट गया, हथिनी की घटना के तीन दिन बाद मौत हो गई। मामले में देशभर में हंगामा हुआ, विरोध हुआ औऱ दोषियों पर कार्रवाई हो गई।

लेकिन जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग हैं मेरे जैसे,  उनके लिए ये कोई पहली घटना और अनोखी घटना नहीं है। मैं मध्यप्रदेश के उन तमाम इलाकों को करीब से जानता हूं जहां सदियों से फसलों को बचाने के लिए करंट के तार, फलों में बम, जंगली सुअरों के लिए मांस के लोथड़ों में बम आदि रखे जाते रहे हैं और अब भी होता है। जिससे आए दिन जंगली सुअरों के सिर ब्लास्ट में उड़ जाते थे। मैंने प्रत्यक्ष देखा है ये। उसके बाद जंगली सुअर की चर्बी आदवासी बेच देते हैं और मांस खा लेते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जंगली सुंअर की चर्बी से भी गठिया बात की समस्या जड़ से खत्म हो जाती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में आप आसानी से जंगली सुअर की चर्बी खरीद सकते हैं, वो सुअर को मारने के बाद ही मिलती है। हाथी की अपेक्षा सुअर का आकार तो बेहद कम होता है। जब उसके जबड़े में बम फटता है तो सोचिए क्या हाल होता होगा उसका। उल्लुओं को हमेशा से तंत्र विद्या के लिए मारा जाता रहा है। कसाई खाने, बलि प्रथा औऱ यहां तक कि मांसाहारी मनुष्य जीभ के लिए पशुओं की नृशंस हत्या ही तो करते करवाते हैं। मांसाहारी मनुष्य भी हथिनी की मौत से शोकग्रस्त हैं, सुखद है। है न?  आपके लिए भी तो बकरे और मुर्गे की गर्दन उड़ाई जाती है। हलाल। यहां तो सिर्फ आपके स्वाद का मसला है लेकिन हथिनी की हत्या ही सही तो उसके पीछे एक बुनियादी कारण है।

सेना में भी मैंने सुना था पूरी तरह से पक्का नहीं है लेकिन कहा जाता है कि सेना या फोर्स में जो डॉग सेवाएं देते हैं, उनकी उम्र पूरी होने के बाद उन्हें गोली मार दी जाती थी। हालांकि एक याचिका के बाद इसपर शायद रोक लग चुकी है। अबकिसी जानवर को सरकारी व्यवस्था में ही गोली मारने की परंपरा थी। ये क्या है। ये भी हिंसा है। जिंदा जानवर को सीधे गोली मार देना।

कभी फसलों को बचाने के लिए, कभी तंत्र मंत्र के लिए, कभी राजशाही के लिए, कभी तस्करी के लिए, कभी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की बलि तो चढ़ती रहती है। इस हथिनी ने भी वही गोला खा लिया था जिसे वहां के किसानों ने फसलों को बचाने के उद्देश्य से रखा था। हो हल्ला मत मचाइए, किसी एक को दोषी मत बनाइए। पूरे मामले की जड़ में जाइए। व्यवस्था दोषी है। परंपरा दोषी है। भूख का सवाल है। पेट का सवाल है। सरकारें दोषी हैं। एक मामूली अदिवासी या किसान जो पूरे साल की फसल एक आध बीघा जंगली भूमि में उगाता है और जब कटने को होती है या पक रही होती है तो उस समय ऐसे खतरनाक इंतजाम करता है, जैसे करंट भरे तार और बम रखना खेतों के किनारे। आप सोच नहीं सकते कि हाथियों या जंगली सुंअरों के झुंड आदिवासी किसान की साल भर की मेहनत कुछ ही घंटों में तहस नहस कर देते हैं। उस नजरिए से देखेंगे तो एक हथिनी की मौत भूख पर भारी नहीं लगेगी। माफी के साथ मुझे कहना पड़ रहा है। मैं खुद इस बात का गवाह हूं जहां मेरी फसल थ्रेसर से निकलने के लिए रखी थी औऱ अनुमान था कि 70 क्विवंटल के आसपास गेहूं होगा, वहां झुंड में आए सुअरों की तबाही से हमे 8 से 10 क्विंटल अनाज में संतोष करना पड़ा। पूरी कटी फसल का अनाज जमीन पर बिखर गया। कई एकड़ों में खड़ी फसल को सुंअरों, नील गायों और हाथियों के झुंड कुछ ही घंटों में तहस नहस कर देते हैं। किसान क्या करे। उन्हें आप विकल्प दीजिए। नीलगायों को तो मारने के कई बार सरकारी आदेश दिए जा चुके हैं सिर्फ इसीलिए कि इनसे फसलों का व्यापक नुकसान होता है। केरल के कुछ इलाके हाथियों के उत्पात से भी प्रभावित हैं। वहीं आदिवासी जनजातियों के अपने कुछ दो नम्बरी व्यवसाय हैं तो कुछ को दो वक्त की रोटी का जुगाड़ इन्ही सबसे है। मैं यहां समस्या का समाधान तो प्रस्तुत कर पाने की स्थिति में नहीं हूं लेकिन चाहता हूं खामियों को समूल नष्ट करिए और दोष को केंद्रित करके मत चलिए। इस हथिनी के आरोपी को जेल भेजने भर से बात नहीं बनने वाली और हथिनी ही नहीं समस्त वन्य जीवों को संरक्षण की जरूरत है।

वातानुकूलित कमरों में बैठकर आप वनांचलों में चल रही उठापटक को कभी नहीं समझ पाएंगे, सिवाय विलाप के और वो भी क्षणिक..

शेष फिर कभी

( एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है)

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