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भारत-नेपाल संबन्ध और मीडिया की भूमिका

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और चीनी राजदूत होउ यांकी

एडीटर अटैकः डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 

मैं छः सात दिन पहले जी न्यूज के सम्पादक सुधीर चौधरी का ट्वीट पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने लिखा था कि नेपाल तो हमारे चैनलों से ही डर गया, भारत जब सामने आएगा तो क्या होगा। सुधीर चौधरी की ये टिप्पणी नेपाल में भारतीय चैनलों के प्रसारण प्रतिबंध पर थी। मामला दरअसल ये है कि कुछ भारतीय निजी चैनलों ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और चीनी महिला राजदूत होउ यांकी मामले में मसालेदार खबरें चलाईं। एक चैनल ने दोनों के संबंधों को हनीट्रेप से जोड़ कर बताया। इसके बाद नेपाल में भारतीय चैनलों के प्रसारण को बैन कर दिया गया। सुधीर चौधरी इसी बैन पर मुखर थे।

सुधीर चौधरी के बयान के संदर्भ में अगर मेरी प्रतिक्रिया पूछे आप तो मुझे हंसी आती है और मुझे लगता है कि पांचवीं या आठवीं कक्षा का अबोध बच्चा शायद ऐसी बात करे तो हास्य रस की दृष्टि से आनंद लिया जा सकता था लेकिन भारत के टॉप के न्यूज चैनल का मुख्य सम्पादक अगर ऐसा बयान देता है तो वो चिंताजनक और शर्मनाक है। उसकी समझ पर सवालिया निशान लगाता है। मैं उसदिन से यही सोच रहा हूं ये क्या खा़क एडीटर इन चीफ हैं। इन्हें तो कहीं ट्रेनी होना चाहिए किसी चैनल पर। इनकी बुद्धि का स्तर कितना बौना है। मैं पूरी गंभीरता से ये कह रहा हूं कि भारतीय टीवी मीडिया को वाकई एक घटिया नेतृत्व से जूझना पड़ रहा है। जिसका अपना कोई सुगठित औऱ बुनियादी पक्ष नहीं है।

मैं ही नहीं दक्षिण एशिया की थोड़ी भी समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति से बात करेंगे और बताएंगे कि ये सुधीर चौधरी का बयान है तो वो या तो लजाएगा या दुखी होगा। दो देशों के बीच संबंधों में मीडिया की कितनी महती भूमिका है इसको दरकिनार नहीं किया जा सकता। पूरे मामले पर विस्तृत बात करते हैं। नेपाल ने नया राजनैतिक नक्शा पास किया था जिसमें उसने ऐसी कुछ जगहों कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपना हिस्सा बताया था जिसे भारत अपना कहता है। तनातनी वहां से शुरू हुई। पड़ोसी मुल्कों का परस्पर एक दूसरे से मेलमिलाप करके रहना कितना जरूरी है ये कूटनीतिज्ञ अच्छी तरह से जानते हैं। भारत औऱ नेपाल के बीच तमाम अस्थिरताएं चरम पर हैं, चीन इसका फायदा उठा रहा है और हमारा मीडिया गैर जिम्मेदाराना रवैय्या बनाए हुए है। नेपाल एक स्वतंत्र औऱ लोकतांत्रिक राष्ट्र है। जैसे भारत। किसी भी राष्ट्र के लिए पड़ोसी राष्ट्र की क्या अहमियत है ये विदेश मामलों के जानकार और दक्षिण एशियाई विशेषज्ञ बेहतर जानते होंगे। इसलिए भारत नेपाल को नजरअंदाज नहीं कर सकता। ऐसे नाजुक क्षणों में मीडिया की भूमिका बहुत प्रभावी हो जाती है। लेकिन भारतीय मीडिया ने सदैव विश्वास खोया है ऐसे मौकों पर। नेपाल के प्रधानमंत्री ओली और चीनी महिला राजदूत के संबंधों को लेकर गॉसिप टाइप की खबरें चलाने का ये कोई वक्त नहीं है। दूसरी बात ये कि आप किसी राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व को ही हनीट्रैप जैसे मसले पर आड़े हाथों ले रहे हैं वो भी बगैर किसी तथ्य के साथ। ये दुखद है। ये सास, बहू औऱ साजिश का शो नहीं है। किसी देश के प्रधानमंत्री को आपकी मीडिया हल्के में ले रही है। आपने चीनी राजदूत और उनके मेल मुलाकात को हनीट्रेप जैसे घटिया हरकत से जोड़ दिया और आप ऊपर से चाहते हैं कि कार्रवाई न हो और जब कार्रवाई हुई तो शर्म आने की जगह कह रहे हैं कि नेपाल भारतीय चैनलों से डर गया। उफ़। नेपाल हमारा परम्परागत मित्र राष्ट्र है, हिंदू राष्ट्र है। सरकारें बदलती हैं तो संबंधों में फर्क पड़ता है। बराक ओबामा चले गए तो ट्रम्प के दौर में मोदी जी कहां ट्रम्प से तूतू करके बात कर पाते हैं। ओली भारत को लेकर उतने सकारात्मक नहीं है, ये होता है। लेकिन परम्परागत मैत्री को हम भुला नहीं सकते। सामरिक, भौगोलिक, राजनैतिक आदि दृष्टियों से नेपाल से बेहतर संबंध जरूरत है हमारी। सार्क में भी नेपाल हमारा प्रमुख सहयोगी राष्ट्र है। मीडिया को समझना होगा।

भारत नेपाल के संबंध निचले स्तर पर हैं। ऐसे में भारतीय मीडिया की स्तरहीन भूमिका। जिसको लेकर नेपाल विदेशमंत्री प्रदीप ज्ञावली ने सख्त आपत्ति जताई और भारत में नेपाल के राजदूत नीलांबर आचार्य को कहा कि वो भारत सरकार के समक्ष इस मामले पर सख्त आपत्ति रखें। नीलांबर आचार्य का इस मामले पर कहना है कि भारतीय मीडिया ने भारत और नेपाल के द्विपक्षीय संबंधों को खराब करने की कोशिश की है।

भारतीय जन संचार संस्थान के प्रोफेसर आनंद प्रधान कहते हैं कि 

”इसमें कोई शक नहीं है. भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग में पत्रकारिता की जो बुनियादी चीज़ होती है उसका भी पालन नहीं किया गया है. आपकी रिपोर्टिंग तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. आप गल्प नहीं गढ़ सकते. आप अपने शो की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए किसी राजनयिक को प्रधानमंत्री के साथ हनी ट्रैप की बात कैसे चला सकते हैं? ये तो बहुत ही आपत्तिजनक है.”

आनंद प्रधान कहते हैं, ”दरअसल, दिक़्क़त यह है कि भारतीय मीडिया को लगता है कि नेपाल भारत का एक्स्टेंशन है. ये आज तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि वो एक संप्रभु राष्ट्र है और ख़ुद फ़ैसले ले सकता है. नेपाल अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से चला सकता है. भारतीय मीडिया को उपनिवेशवादी मानसिकता से बाज़ आने की ज़रूरत है. अगर इनकी रिपोर्टिंग ऐसी ही जारी रही तो दोनों देशों के संबंधों में लोगों के बीच जो गर्मजोशी है उसे भी नुक़सान होगा.”

विदेश मामलों के जानकार और भारतीय विदेश परिषद के प्रमुख वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक कहते हैं कि भारतीय टीवी न्यूज एंकरों की छवि भारत में ही गंभीरता की नहीं है। लोग एक कान से सुनते हैं दूसरे से उड़ा देते है टीवी न्यूज चैनलों की खबरें। इसलिए नेपाल को मीडिया की वजह से बहुत गंभीर होने की जरूरत नहीं है। वो कहते हैं कि भारत के सरकारी चैनल डीडी न्यूज को नेपाल ने बैन नही किया क्योंकि डीडी न्यूज बगैर आधार कोई खबर चलाता नहीं।

24 घंटें की अनिवार्यता बांधे भारतीय टीवी चैनल इतने गैर जिम्मेदार और निरंकुश न हो जाएं कि भारत की कूटनीति को पलीता लगा डालें और भारत के द्विपक्षीय संबंधों को सीधा सीधा प्रभावित करें इसके लिए टीवी मीडिया को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं को खुले दिमाग से सोचने की जरूरत है।

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