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भारत औऱ रामः महाशोक की घड़ी में महाउत्सव कितना जायज ?

रामंदिर
अयोध्या राममंदिर भूमिजन के दौरान रामलला को साष्टांग प्रणाम करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

एडीटर अटैक

डॉ.प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

कोरोना की जद में आए 39 हजार से ज्यादा लोगों के शवों पर सिसकता भारत, चीन और नेपाल के अबतक के सबसे आक्रामक रुख के बीच खड़ा भारत, भयंकर बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, अस्थिरताओं से घिरा भारत, कोरोना महामारी के शीर्ष आंकड़ों से सजा भारत क्या वाकई इस योग्य है कि वो एक महा उत्सव का आयोजन करे ?

क्या दुनियी हंसेगी नहीं हमपर ? किसी भी सामान्य व्यक्ति से आप कहें कि आप ऊपर इंगित विकराल समस्याओं औऱ चुनौतियों से घिरे हुए हैं। तब आप एक महा उत्सव का उल्लास मना रहे हैं। जयघोष कर रहे हैं। शहरों को सजा रहे हैं। तोरणद्वार बना रहे हैं। दीपसज्जा करा रहे हैं। महाशोक के बीच ये राष्ट्रीय उत्सव कितना जायज है ?

भारत की नहीं अपितु समूचे विश्व की सबसे बड़ी वर्तमान चिंता कोरोना महामारी और उससे उपजे संकट व समस्याएं हैं। दुर्भाग्यवश कोरोना विपदा के मामले में अब हम सबसे ऊपर हैं। पश्चिम के विकसित देश कोरोना से अपनी तरह से लड़ रहे हैं औऱ उनकी मशीनरी और अर्थव्यस्थाएं कालांतर में नुकसान की भरपाई तेजी से करने में सक्षम हैं लेकिन दक्षिण एशिया में शामिल विकासशील राष्ट्र भारत विकसित देशों की श्रेणी में नहीं है। हमें लड़ने औऱ जीतने में और कोरोना से पूर्व जैसी स्थिति में आने में वर्षों लगेंगे।

हम अपनी तत्कालिक मुख्य समस्या को नजरअंदाज कर धर्म का उत्सव आयोजित कर रहे हैं। ये कैसी व्यवस्था का हिस्सा हैं हम। हमारे देश में 39 हजार से ज्यादा लोग कोरोना से मर चुके हैं। रोज हजारों लोग मर रहे हैं। हमने कोरोना से पार नहीं पाया है अबतक। उद्योगों की रफ्तार थमी हुई है। बेरोजगारी के चलते लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं। जिंदगी अभी पटरी पर भी नहीं लौटी। क्या ये महा उत्सव की बेला है? क्या समारोह की इस भव्यता को शोक औऱ विपदा की इस घड़ी में कोई न्यायोचित ठहरा पाएगा ?

लेकिन इन सबके पीछे की कहानी समझना होगा। भारत औऱ राम के संबंधों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। जिससे हम शोक के बीच इस उत्सव की विवेचना कर सकेंगे।

सनातन धर्म का अगुवा राष्ट्र अब दीवारों को पेशाब मुक्त बनाने के लिए देवताओं की तस्वीरें लगाने के क्रम तक आ पहुंचा है। अब इससे ज्यादा धर्म का उपयोग क्या ही होगा। भारत की तासीर में, मूल में धर्म है और उसके बाद धर्म का ही उपक्रम राष्ट्रवाद है। जो भारत की इस मूल तासीर को समझ गया वो इस महा उत्सव के आयोजन के प्रायोजन का रहस्य समझ जाएगा।

दरअसल भारत की उत्पत्ति में धर्म है। भारत के निर्माण में धर्म है। भारत के विकास और विनाश में धर्म निहित है। ये देश धर्म का पूरक राष्ट्र है। आप कितना भी कुछ भी कर लें भारत की तासीर से धर्म को अलग थलग नहीं कर सकते। यहां लोगों के जन्म में धर्म तो मरण में धर्म समाहित है। हर संस्कार में धर्म निहित है। यहां के विज्ञान में धर्म है, यहां राजनीति में धर्म है। यहां के राष्ट्रवाद में धर्म है। यहां लोगों की चेतना और आत्मा में धर्म है। यहां तक कि नदियों-समुद्रों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों, हवा, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश में धर्म है। हर जीव औऱ निर्जीव में धर्म है और सभी को देव की उपमा से अलंकृत किया गया है। हम इसी व्यवस्था में चलते आ रहे हैं युगों युगों से। इस व्यवस्था से आप किनारा करके यहां निर्वाह नहीं कर सकते। फिर वो कोई व्यक्ति हो, संस्था हो या राजनैतिक दल।

भारतीय जनता पार्टी औऱ समान रूप से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नीति निर्माता भारत की नब्ज जानते हैं। ये उसी नब्ज को आधार बनाकर राजनीति करते हैं। बीजेपी की पूरी राजनीति का मुख्य आधार ही राष्ट्रवाद है और उस राष्ट्रवाद के मूल में धर्म है। इस देश में धर्म को जिसने जितना भुनाया वो उतना सफल रहा। मोदी सरकार का एक छत्र राज्य और प्रभाव इसका पुख्ता उदाहरण है। भयावह कोरोना ग्रस्त देशों की श्रेणी में हम सबसे खतरनाक स्तर पर हैं, कई हजारों लोग रोज मर रहे हैं, देश की पूरी रफ्तार थमी हुई है, लेकिन राम हमारे ह्दय में है। हम राष्ट्रवादी लोग विकास की बलिवेदी पर, शोक के काल में भी देवों को पूजने की परम्परा का हिस्सा रहे हैं। देव हमारी चेतना औऱ आत्मा में है। औऱ इस कदर हैं कि हम यानी भारत की एक बड़ी जनसंख्या सहज ही इस उत्सव का हिस्सा है और इससे उल्लासित है। धर्म औऱ राष्ट्रवाद की अति या कहें प्रभाव आपको विवेकहीन कर देता है। इसीलिए हम देखते हैं कि धर्म, जाति, मजहब के नाम पर लोग सबसे ज्यादा एकता दिखाते हैं। क्योंकि जब जब धर्म, जाति, मजहब की बात होती है चेतना शून्य हो जाती है। ये वही समय है जब धर्म के नाम पर राजनीति हो रही है और जनता को महाशोक की घड़ी में भी महा उत्सव में बांध दिया गया है। हम भारत के लोग ऐसे ही माहौल में रहने के आदी हैं। ये वही देश है जहां के मंदिरों के कोष में इतना धन दान किया गया है कि देश की अर्थव्यवस्था सुधर सकती है लेकिन यहां बुनियादी जरूरतों के लिए कोई दानवीर मुश्किल से ही सामने आता है। अयोध्या में राममंदिर की परिकल्पना भारतीय जनमानस से ज्यादा बीजेपी और संघ का परमउद्देश्य जान पड़ता है। बीजेपी वर्षों से राममंदिर के नाम पर वोट पाती रही औऱ आज शीर्ष में आ पहुंची। बहरहाल सर्वमान्य, सर्वविदित और सबके राम-अपने राम आखिरकार अयोध्या मूलप्रांगण में जा विराजे।

इसका अंततः अभिनंदन, वंदन और स्वागत है

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