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सुपुर्द ए खा़क भी नहीं हुए थे राहत इंदौरी और कोसने लगे लोग

राहत इंदौरी। 1950-2020

मरने के बाद भी इंदौरी को राहत नहीं…..

मीडिया मिरर न्यूज, नई दिल्ली। 

ख्यात शायर राहत इंदौरी का मंगलवार को इंदौर में निधन हो गया। उन्हें कोरोना संक्रमित भी पाया गया था, लेकिन निधन की वजह दिल का दौरा बना। वो 70 वर्ष के थे और चिकित्सकों के अनुसार उनके फेफड़े 70 फीसदी खराब हो चुके थे। मधुमेह औऱ हाइपरटेंशन की समस्या से भी वो ग्रस्त थे। सोमवार को ही कोरोना संक्रमण की आशंका का चलते उन्हें इंदौर के अरविंदों अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को हुआ था। शायरी की दुनिया में आने से पहले राहत इंदौरी चित्रकार और उर्दू के प्रोफेसर भी रहे हैं। उन्होंने कई फिल्मों के लिए भी गीत लिखे जो पसंद किए गए। उनके बेटे सतलज राहत भी शायर हैं।

उधर देह पड़ी थी इधर लोग लगे कोसने 

देश दुनिया में एक तरफ जहां लोग राहत इंदौरी के गुजरने से ग़मगीन थे। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने, राजनाथ सिंह ने तमाम गणमान्य लोगों ने उन्हें नमन किया औऱ श्रद्धांजलि दी, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया में कुछ लोग राहत इंदौरी को टैग करके उन्हें ट्रोल करने लगे। लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में उनकी कथित शायरी को लेकर उनको आड़े हाथों लिया। लोगों का कहना था कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की घुटने की बीमारी को लेकर राहत इंदौरी ने बहुत व्यंगात्मक शेर पढ़ा था। किसी के बीमारी के बारे में किसी को व्यंग नहीं करना चाहिए लेकिन राहत इंदौरी ने ऐसा किया जो कि गलत था। इतना ही नहीं कुछ लोगों ने उनके उग्र लहजे और उग्र शब्दों से सजे शेरों को भी टारगेट किया।

इस शेर को लेकर आपत्ति जताई लोगों ने

निकाह किया ही नहीं,

तो फिर यह मर्द कैसा है

घुटने से काम लिया ही नहीं,

तो दर्द कैसा है। 

लोगों का कहना है कि अटल बिहारी की घुटनों की सर्जरी पर तंज कसते हुए यह व्यंग राहत इंदोरी ने पढ़ा था। बीमारी का मजाक बनाया था।

इस शेर पर भी विरोध दर्ज करवाया लोगों ने।

कभी गंगा बुला रही

कभी गोमती बुला रही

नालायक अहमदाबाद लौट जा

तेरी बीबी बुला रही।

इस शेर पर भी कुछ लोगों ने आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि उनका लहजा ठीक नहीं था।

सभी का खून है शामिल
यहां की मिट्टी में।
किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है।

दिल्ली की पत्रकार सर्जना शर्मा अपनी प्रतिक्रिया इस शेर के संदर्भ में फेसबुक में देती हैं औऱ लिखती हैं कि

  • जिन गद्दारों ने राहत इन्दोरी के शेर को शान से पढ़ा कि
    “सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में
    किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है “
    तो – उनको उन्ही की भाषा में मुँहतोड़ जवाब :
    ख़फ़ा होते हैं होने जाने दो, घर के मेहमान थोड़ी हैं
    जहाँ भर से लताड़े जा चुके हैं , इनका मान थोड़ी है
    ये कान्हा राम की धरती, सजदा करना ही होगा
    मेरा वतन ये मेरी माँ है, लूट का सामान थोड़ी है
    मैं जानता हूँ, घर में बन चुके हैं सैकड़ों भेदी
    जो सिक्कों में बिक जाए वो मेरा ईमान थोड़ी है
    मेरे पुरखों ने सींचा है लहू के कतरे कतरे से
    बहुत बांटा मगर अब बस, ख़ैरात थोड़ी है
    जो रहजन थे उन्हें हाकिम बना कर उम्र भर पूजा
    मगर अब हम भी सच्चाई से अनजान थोड़े हैं ?
    बहुत लूटा फिरंगी ने कभी बाबर के पूतों ने
    ये मेरा घर है मेरी जाँ, मुफ्त की सराय थोड़ी है…
    बिरले मिलते है सच्चे मुसलमान दुनिया में
    हर कोई अब्दुल हमीद और कलाम थोड़ी है ।।
    कुछ तो अपने भी शामिल है वतन तोड़ने में
    अब ये बरखा और रविश मुसलमान थोड़ी है ।
    नही शामिल है तुम्हारा खून इस मिट्टी में,
    ये तुम्हारे बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है

लेखक व अनुवादक सोनाली मिश्र का बयान

एक बार राहत इन्दौरी जी द्वारा अटल बिहारी जी के घुटनों की सर्जरी पर किया गया कथित व्यंग्य सुना था,और अटल जी को दौ कौड़ी का आदमी कहा था, तब से ही इनकी शायरियाँ नहीं पढ़ी थीं. मैं महान लेखक या लेखिका बनूं या न बनूं, पर ऐसी बनी रहूँ कि किसी के रोग का उपहास न उडाऊं!
भगवान के लिए यह कोई न कहे कि वह व्यंग्य था, वह व्यंग्य नहीं था, वह विशुद्ध नफरत वाली कोई रचना थी!
बाद में सुना कि राहत इन्दौरी जी ने अपनी कट्टरता के कारण कई प्रशंसकों को नाराज़ किया, मगर मैं चूंकि बहुत पहले सुन चुकी थी, वह महान व्यंग्य रचना, इसलिए मुझे हैरानी न हुई!
राहत जी, अब आप सारी नफरतों से परे होकर आराम करें, और आपको शान्ति मिले, यही कामना है
लखनऊ से प्रदीप श्रीवास्तव का बयान
ये शख्स अटल जी को, मोदी जी को और हिंदुओं को लगातार बार बार बुरी तरह से इंसल्ट कर रहा था। लगातार ज़हर उगल रहा था। इस कि शायरी ज़िहादी लोगो की मनपसंद लाइने हो गई थी।
अजयेश श्रीवास्वतव का बयान
शायर तो बेहतरीन थे कोई शक नहीं इसमें,
निगाहें कहीं और निशाना कहीं और , मुश्किले जज़्बात हैं इसमें।
काबिलियत आला दर्जे की थी मान लिया हमने, जेहनियत में ही कुछ कमी सी दिखाई पड़ती है !
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