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कांग्रेस प्रवक्ता का निधनः न्यूज चैनलों की डिबेट पर उठे सवाल

राजीव त्यागी

त्वरित टिप्पणी- डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

बुधवार को आजतक चैनल की लाइव डिबेट के दौरान कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी को हार्ट अटैक आया औऱ उनका निधन हो गया। जानकारी के अनुसार शाम को वो रोहित सरदाना के शो में घर से ही लाइव थे। ऐसा बताया जा रहा है कि बहस के दौरान ही वो थोड़ा असहज दिख रहे थे औऱ इसी दौरान उनकी ह्दयगति रुक गई। स्थिति देख परिवार वालों ने कुछ प्राथमिक उपचार दिया और गाजियाबाद के यशोदा हस्पिटल ले गए। जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इस हादसे के बाद सोशल मीडिया में पत्रकारिता से जुड़े बुद्धजीवियों के बीच एक विमर्श, टीवी न्यूज चैनलों की बहसों के स्वरूप की समीक्षा औऱ बहसों को लेकर प्रतिरोध, विरोध शुरू हो गया है। पत्रकार, साहित्यकार, लेखक व बुद्धजीवी टीवी चैनलों की हिंसात्मक और कनफोड़ू बहसों के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं। खूनी बहस करार दे रहे हैं। उनका मानना है कि बहसों का हिंसात्मक स्वरूप, कनफोड़ू प्रस्तुति राजीव त्यागी के अटैक के लिए जिम्मेदार है।

इस हादसे के बाद एक बात तो तय है  कि न सिर्फ न्यूज चैनलों को बहस की रूपरेखा व स्वरूप पर मंथन करने की जरूरत है बल्कि राजनैतिक दलों व चैनलों की बहस में बतौर वक्ता-प्रवक्ता शामिल हो रहे लोगों को भी सोचना होगा कि वो आखिर इन बहसों से क्या खो रहे हैं और क्या पा रहे हैं। ऐसा तो नहीं कि अगला नंबर आपका हो। चौबीस घंटे बकबकाने वाले न्यूज चैनलों से आम जनता को कोई सरोकार नहीं है। ये बात बिल्कुल साफ है। इन मीडिया माध्यमों में स्वस्थ पत्रकारिता कितनी शेष है सबको ज्ञात है। लेकिन चैनलों पर हो रही बहस कितनी प्रासंगिक और काम की हैं। ये सोचना होगा। चूंकि हम सब उस दौर में जी रहे हैं जहां सबकुछ पानी की तरह साफ है। एक दौर में ऐसा होता था कि केवल पत्रकार जानते थे कि फलां फलां मीडिया संस्थान या बड़े पत्रकारों का किस राजनैतिक दल की ओर झुकाव है क्योंकि पत्रकारिता मुख्यधारा में थी और लायजनिंग सेकंड्री। लेकिन अब लायजनिंग प्रायमरी हो गई है औऱ पत्रकारिता सेकंड्री तो आमजनता भी जानती है सुधीर, रवीश, बरखा, सरदाना, श्वेता सिंह, रूबिका क्या गुल खिला रहे हैं औऱ किसके लिए खिला रहे हैं। तो हम सब बड़े खुशनसीब हैं कि मीडिया का चरित्र अब नकाब में नहीं है इसलिए बहुतायत में हम सुनते हैं लोगों से कि लोगों ने कई कई वर्षों से न्यूज चैनल नहीं देखे। मैंने स्वयं 2008 से कोई न्यूज चैनल नहीं देखा। राजीव त्यागी के हादसे के बाद भी मैं लगातार सोशल मीडिया में नजर बनाए हुए हूं और देख रहा हूं बड़ी संख्या में लोग कह रहे हैं कि वो न्यूज चैनल नहीं देखते।

तो एक तरह से सबक है न्यूज चैनलों के लिए, लेकिन चूंकि सबक चाहिए किसे। एक बड़ी आबादी जड़ है इस दुनिया जहान की,  उसे राम, रहीम, झंडा, ताबूत, मंदिर, मस्जिद, राफेल, सुशांत में उलझाकर आप टीआरपी पा सकते हैं औऱ पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि टीवी मीडिया के लोग अपनी कमियो को जानते नहीं लेकिन चूंकि राममंदिर सबसे बिकाऊ कंटेंट है, और टीआऱपी की होड़ है तो बेचना जरूरी है। ये पत्रकारिता नहीं दुकानदारी का मामला है। ये अरुणपुरी, सुभाष चंद्रा, रजत शर्मा की आत्मा जानती है। खैर मुद्दे पर लौटते हैं। राजीव त्यागी की टीवी डिबेट के दौरान मौत के बाद टीवी डिबेट का विरोध शुरू हो गया। लोग बहिष्कार की अपील करने लगे। इस अपील को औऱ तेज करिए। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आपके विरोध या समर्थन की आवाज उनतक नहीं पहुंचेगी। जनता की आवाज पर तो सरकारें हिल गई हैं ये इतिहास है। ये तो करकट टाइप चैनल हैं। जो गलत लगे, विरोध दर्ज करिए। एक प्रतिशत भी इन्होंने डिबेट के स्वरूप में सकारात्मक परिवर्तन किया तो अपनी जीत समझना। इस घटना के बाद जरूरत है कि एडिटर गिल्डस, भारतीय प्रेस परिषद, ब्राडकॉस्ट एसोसिएशन सरीखी शीर्ष संस्थाएं खुलकर सामने आएं औऱ सरकार को एक मसौदा दें और सिर्फ दें न बल्कि उसके लिए अपने स्तर पर लड़ें भीं।

हार्ट अटैक किसी भी व्यक्ति को आना सामान्य बात है। और बिल्कुल जरूरी नहीं कि राजीव त्यागी के हार्ट अटैक के लिए भारतीय न्यूज चैनलों के बहस का स्वरूप जिम्मेदार हो, लेकिन चूंकि इस हादसे के केंद्र में डिबेट है तो डिबेट के स्वरूप पर मंथन का इससे बेहतर कोई वक्त नहीं हो सकता। इससे पूर्व में हमारे देश के चैनलों की बहसों में क्या नही हुआ। जूते चले, चप्पल चलीं, गिरेबान पकड़ी गई। अभी हाल ही में जनरल जीडी बख्शी ने डिबेट के दौरान मां की गाली दी। उसका लोगों ने विरोध किया। हाल ही में दीपक चौरसिया के शो में गाली गलौज हुआ। और कल ये हादसा।

बिल्कुल जरूरत है कि स्वयं टीवी न्यूज चैनलों के मालिक, सम्पादक, कार्य़क्रम निर्माता बैठकर डिबेट शो के लिए एक आदर्श नियमावली बनाएं औऱ साथ ही तकनीकी तौर पर भी बहसों को एक नया रूप देने की जरूरत है। बहस के दौरान कई चैनलों में आग जलती रहती है, ऐसे ग्राफिक हैं, साउंड बहुत तेज होता है। हालांकि ये सब प्री प्लान्ड है। प्रोड्यूसर चाहे तो ऐसा कुछ न हो, जो भी अपशब्द बोले उसे तुरंत म्यूट करने की व्यवस्था है। लेकिन चूंकि सबकुछ तयशुदा तरीके से हो रहा है क्योंकि उग्र लहजे की बहसों की टीआरपी आमतौर पर ज्यादा होती है। लेकिन टीआरपी किसी की जान ले ले या स्टूडियो में हिंसात्मक माहौल खड़ा कर दे। तो ऐसी टीआरपी का क्या मतलब। एक बार तो मुझे याद है कि स्टूडियो में आए अतिथि एक दूसरे पर झपट पड़े तो एंकर महोदय बचते नजर आए, शायद सुमित अवस्थी थे। राहुल कंवल को तो एक बार गेस्ट को भगाना ही पड़ा ऑनएयर। सवाल ये भी है कि आप यानी कि चैनल कैसे लोगों को बहस के लिए आमंत्रित करते हैं जिन्हें सार्वजनिक संभाषण की मर्यादा नहीं पता। आप खुद कहते हैं कि देश देख रहा है तो आप फिर देश के सामने इतने जाहिल लोगों को क्यों लाते हैं। इस पर विचार करने की जरूरत है। और अंत में बड़े राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिनकी भूमिका ही महज इतनी है कि वो मीडिया में आकर अपने पार्टी को डिफेंस करें तो वो सोचें जरूर कि आखिर डिफेंस करने का सबसे शालीन तरीका क्या हो सकता है। क्योंकि मुख्य राजनैतिक दलों के शिक्षित प्रवक्ताओं को अक्सर हमलोग मूर्खों की तरह विचार व्यक्त करते पाते हैं। कल राजीव त्यागी के साथ बहस में उतरे संबित पात्रा को ही कल के रिकार्ड में सुन लीजिए। योगेन्द्र यादव एक अच्छा उदाहरण हैं, कुछ हद तक सुधांशु त्रिवेदी बहुत संयमित बोलते हैं। तो प्रवक्ताओं के लिए भी गाइडलाइन बन सकती है पार्टियों या चैनलों में कि उन्हें किस लहजे में और किस तरह से बात करनी है मीडिया में।

शेष बेहतरी की कामनाओं के साथ राजीव त्यागी को श्रद्धांजलि।

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