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टीवी डिबेट्स का बहिष्कार कोई समाधान नहींः गौरव वल्लभ

गौरव बल्लभ
गौरव वल्लभ, कांग्रेस प्रवक्ता

12 अगस्त को आजतक चैनल में हो रही लाइव डिबेट के दौरान कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की ह्दयगति रुकी और अस्पताल पहुंचते ही उनका निधन हो गया। इस घटना के बाद से भारत में ही नहीं अपति विश्व मीडिया में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया कि टीवी डिबेट्स का स्वरूप कैसा हो, साथ ही टीवी बहसों के वर्तमान चलन पर लोग विरोध जताने लगे, सोशल मीडिया में जमकर ये आपत्ति दर्ज की गई। ये मामला अब भी सुर्खियों में है। लोगों को लग रहा है कि कहीं न कहीं बहसों के हिंसात्मक स्वरूप के कारण ही राजीव त्यागी की मौत हुई। राजीव त्यागी की पत्नी ने भी बयान दर्ज कराके खलबली मचा दी जिसमें उन्होंने कहा कि राजीव त्यागी के अंतिम शब्द थे कि इन लोगों ने मुझे मार डाला। पूरे मामले में चैनल और पैनलिस्ट बराबर के दोषी कहे जा रहे हैं। इसी मुद्दे पर कांग्रेस के युवा प्रवक्ता गौरव वल्लभ का ये विशेष साक्षात्कार। साक्षात्का रेडिफमेल से साभार हम अनुदित करके अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। 

साक्षात्कार कर्ताः सैयद फिरदौस असरफ, रेडिफमेल 

हिंदी में अनुवादः डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

 

राजीव त्यागी की मौत बहुत आश्चर्य़जनक है क्योंकि उनकी मौत टीवी डिबेट में सहभागिता के ठीक बाद हुई। क्या आपने कभी महसूसा कि टीवी डिबेट में सहभागिता के दौरान भयानक दबाव रहता है?

 बुधवार को जो बहस आजतक में हुई थी, जाहिरतौर पर उसमें राजीव जी प्रेशर में दिख रहे थे। मैं अच्छी तरह से समझ सकता हूं क्योंकि कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर मैं भी टीवी डिबेट्स में जाता रहता हूं। हम प्रेशर में रहते हैं डिबेट्स के दौरान पूरे समय तक। हमें काबू करके रखना पड़ता है अपने आवेश को टीवी पर।

अगर आप डिबेट्स के टाइटल देखें तो पाएंगे कि केवल वो एक एजेंडे पर केंद्रित हैं। जिससे लगता है कि कैसे समाज को एक मुद्दे को लेकर बांटा जाए। इसके अलावा डिबेट्स में दूसरा विषय उठाया जाता है  जिसमें सरकार को जिताना है और विपक्ष को नीचा दिखाना है। इतना ही नहीं डिबेट शुरू होने से पहले ही जो टाइटल दिखाए जाते हैं उनको देखकर आप समझ जाएंगे कि इनका झुकाव रूलिंग पार्टी के एजेंडे की ओर है। बीजेपी के प्रवक्ता हमपर हावी हो जाते हैं पर्सनल फ्रंट पर। और वो वहां चुप नहीं होते, वो हमारे परिवार को भी टारगेट करने लगते हैं। वो हमारे नेताओं को, कपड़ों को, धर्म को कोसने लगते हैं। यहां तक कि अगर हमने अपने माथे पर तिलक लगाया है तो वो उस पर भी कमेंट करेंगे। ये उनकी हमेशा की आदत है। एक बार मैंने कलर्ड जैकेट पहन रखा था, तो बीजेपी के प्रवक्ता महोदय कलर के आधार पर सांप्रदायिक रंग देने में लग गए। मजे की बात ये है कि किसी एक की बेइज्जती होती है तो शेष पैनलिस्ट देखते रहते हैं। इसके अलावा हम देखते हैं कि जब हमें बोलना होता है तो चैनल वाले या तो म्यूट कर देते हैं, या पर्याप्त समय ही नहीं देते बोलने के लिए, अपना पक्ष रखने के लिए या फिर ब्रेक ही घोषित कर देते हैं। या फिर अगर लाइव हैं कहीं और से तो कह देंगे कि नेटवर्क सही नहीं है। बातचीत बाधित हो रही है। औऱ मजे की बात जानिए। आज टीवी डिबेट में हो क्या रहा है। हमारे खिलाफ चैनल वाले अधिकांश तीन बीजेपी प्रवक्ताओं को उतारते हैं। जिसमें से एक बीजेपी का प्रवक्ता होगा। एक आरएसएस का प्रवक्ता होगा और तीसरा जो है वो बीजेपी का ही समर्थक होगा, लेकिन वो सीधे तौर पर बीजेपी या आरएसएस से संबद्ध नहीं दिखाई पड़ेगा। ज्यादातर एंकर बीजेपी के सपोर्ट में रहते हैं। अब सोच लीजिए विपक्ष के लिए मीडिया में कितनी जगह है।

क्या आपने कभी टीवी एंकर्स या चैनलों के मालिकों से कहा नहीं कि वे बहस के दौरान खुलेतौर पर सरकार के साथ दिखाई पड़ते हैं?

हम बात करें भी कौन करता है हमसे बात। आप पिछले एक महीने के टीवी डिबेट्स चेक कर लीजिए। मैं जहां तक समझता हूं इस समय देश में तीन प्रमुख मुद्दे हैं जिनपर बात होनी चाहिए थी। पहला कोविड-19, दूसरा राष्ट्रीय शिक्षा नीति और तीसरा पर्यावरण नीति। देखिए चैनल वाले कोविड 19 को लेकर ब्रेकिंग तो देते हैं पर बहस नहीं करवाते। शिक्षा नीति पर कितनी प्राइम टाइम बहसें हुई बताइए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आने वाली पीढियों तक प्रभाव पड़ेगा लेकिन इस पर डिबेट्स नहीं होगी। तीसरा मोदी सरकार की पर्यावरण नीति। जिसका सीधे तौर पर लोगों पर असर होगा। उस पर कोई चर्चा नहीं। कहने का मतलब जरूरी विषय नहीं रखे जाएंगे। हां बहस का प्रमुख मुद्दा है हिंदू, हिंदुत्व। कौन असली हिंदू, कौन नकली हिंदू। अब न्यूज चैनल तय करेंगे कि कौन सच्चा हिंदू है। मैंने शास्त्रों में पढ़ा है कि केवल शंकराचार्य़ ही तय कर सकते हैं कि कौन सच्चा हिंदू है। इसलिए अगर वाकई चैनल वालों को जानना है कि कौन सच्चा हिंदू है तो शंकराचार्य को बुलाएं और पूछे उनसे। और ऐसी बहस करें, मैं भी जाऊंगा, बीजेपी वाले भी आएं। फिर पता लगेगा कि हिंदू और हिंदुत्व क्या है। लेकिन ऐसा ये करेंगे नहीं। मुझे आश्चर्य है कि टीवी डिबेट्स किस ओऱ भारत को लेकर जा रही हैं।

आप टीवी चैनल की बहसों का बहिष्कार क्यों नहीं करते?

मैं चाहता हूं तरीके से डिबेट्स हों। बहिष्कार करना कोई समाधान नहीं है। हम लड़ रहे हैं कि टीवी बहसों का स्वरूप बदले। क्या हम एक बड़ी श्रद्धांजलि राजीव त्यागी जी को इस रूप में नहीं दे सकते कि हम जरूरी विषयों पर शालीनता के साथ अबसे बहस करें। जैसे मैंने पहले कहा कि अगर धर्म पर बात करना है तो शंकराचार्य सबसे उपयुक्त हैं। न कि कुछ एंकर्स तय करेंगे इस मुद्दे को। जो मुद्दे देश को प्रभावित करें ऐसे विषयों पर बहस होनी चाहिए, पर नहीं हो रही है।

आप कहते हैं कि कांग्रेस प्रवक्ताओं को बहुत ज्यादा समय नहीं मिलता बोलने का., लेकिन आपने एक मिनट में ही बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा को क्लीन बोल्ड कर दिया था। जब आपने पूछा था कि खरब में कितने जीरो होते हैं। औऱ वो जवाब नहीं दे सके थे।

हां मैंने ये किया था। दरअसल मैंने पहले भी आपको बताया कि कि ये पर्सनल कमेंट करते हैं। जनता का ध्यान महत्वपूर्ण मुद्दों से भटकाने के लिए ये इनकी नीति है कि विपक्षी प्रवक्ता पर निजी अटैक करो। ये करने लगे। तभी मैंने पूछा था जीरो वाला सवाल।

लोकतंत्र में बहुत संभव है कि हर एक की अलग अलग विचारधारा हो लेकिन टीवी डिबेट्स में बहुत निजी जीवन में हमले किए जाते हैं। जैसे आपने भी बताया कपड़े, माथे के चंदन पर, परिवार पर। क्यों टीवी डिबेट्स का स्तर इतना नीचे गिर रहा है?

देखिए मैंने पहले ही कहा कि जनता का ध्यान मुद्दों से भटकाने के लिए ये पर्सनल अटैक करते हैं। रूलिंग पार्टी का उद्देश्य ही यही है कि जनता की आवाज दबाई जाए। ताकि सरकारी लेखा जोखा की ओर लोगों का ध्यान न जाए। देखिए बड़ी सीधी सी बात है आपकी विषयों को लेकर समझ होगी तो आप निजी हमले नहीं करेंगे। लेकिन जब आप व्यक्ति के कपड़ों, उसके माथे पर लगे चंदन पर टिप्पणी करने लगें तो आप समझ जाइए कि उसके पास बहस की तैयारी नहीं है।

राजीव त्यागी जिस बहस में थे उसमे संबित पात्रा ने उन्हें जयचंद कहा था और आपकी पार्टी को गद्दार। किस तरह लेते हैं इसको?

आप बुरा महसूस कर रहे हैं तो निश्चित ही यह बुरा है। नैतिक स्तर पर भी यह बुरा है। लेकिन मैं उनको उनकी भाषा में जवाब नहीं दे सकता। क्योंकि मैंने गांधी जी को पढ़ा है। अगर कोई बुरा बोले तो आवश्यक नहीं आप भी उसी भाषा में जवाब दें। दरअसल उनके पास जवाब नहीं होता है इसलिए वो व्यक्तिगत हमलों पर उतारू हो जाते हैं। एक बार मैंने पूछा था कि जयचंद कौन है। कोई पैनलिस्ट नहीं बता पाया था। किसी के पास जवाब नहीं था। क्योंकि ये भारत का इतिहास नहीं पढ़ते। यहां तक कि इन्हें अपने पार्टी का इतिहास नहीं पता। मैं चुनौती देता हूं भाजपा प्रवक्ता को उन्हें नहीं पता है कि उनकी अपनी ही पार्टी की क्या विचारधारा है। क्योंकि उनकी पूरी श्रद्धा केवल मोदी पार्टी में है।

क्या आपकी संबित पात्रा से मित्रता है?

मैं न तो दोस्त हूं और न ही दुश्मन उनका। डिबेट्स के बाद वो नमस्ते करते हैं तो मैं भी नमस्ते करता हूं। मैं उनके खिलाफ नहीं हूं। मैं तो यही मानता हूं जैसे मैं एक हिंदूस्तानी हूं वैसे ही वो भी एक मेरी तरह ही हिंदुस्तानी हैं। मेरे मन में उनके प्रति कोई द्वेष नहीं है। हालांकि वो हमेशा ये सिद्ध करना चाहते हैं कि वो मुझसे ज्यादा हिंदुस्तानी और हिंदू हैं। लेकिन अगर इस बात का भी कोई परीक्षण हो तो वो पिछड़ जाएंगे क्योंकि हिंदू धर्म सिखाता है कि सभी धर्म समान हैं, हिंदू धर्म कहता है कि सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। अगर कोई ऐसा नहीं करता तो वो कैसा हिंदू है।

कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस राजीव त्यागी मामले को भुना रही है?

इस तरह की बातें सुनकर दुख हुआ। राजीव त्यागी देशभक्त थे। पूरी ईमानदारी और गंभीरता से वो विचारधारा के स्तर पर बहस करते थे। अगर आप उनकी लास्ट डिबेट भी देखें तो पाएंगे कि उनके धर्म को और जो उन्होंने तिलक लगाया था उस पर भी हमले हो रहे थे। लेकिन वो शालीनता से जवाब दे रहे थे।

क्या आपको लगता है कि राजीव त्यागी मौत मामले में संबित पात्रा को गिरफ्तार किया जाना चाहिए?

मैं नहीं जानता कि सोशल मीडिया में क्या ट्रेंड हो रहा है। लेकिन सच जो भी है प्रत्येक भारतीय जानता है। मैं इस सवाल पर इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता।

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