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मोदी राज में प्रेस स्वतंत्रता और प्रेस प्रबंधन

लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

एडीटर अटैक- डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

 

अभी हाल ही में हम भारत के लोग अपना स्वतंत्रता दिवस मनाकर रीते हैं। तो मैंने सोचा लगी ताक हम नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रेस की स्वतंत्रता का एक खाका खींचें। वैसे भी सुनने में आ रहा कि नरेंद्र मोदी पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बन चुके हैं जिसने इतना लम्बा कार्य़काल पूरा किया हो। निसंदेह वो बधाई के पात्र हैं। मोदी राज में अगर प्रेस स्वतंत्रता की बात करें तो 2019 में जारी रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर संस्था ने भारत को 140 वें नम्बर पर रखा है। पर इस तकनीकी मुद्दे पर हम बात नहीं करेंगे। हम जमीनी बात करेंगे।

हम सबसे पहले शुरूआत करेंगे कि मोदी संभवतः पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने आजतक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित नहीं की। दीपावली मिलन समारोह तो वो रखते हैं और पत्रकारों के साथ हंसते मुस्काते सेल्फियां उतरवाते हैं लेकिन अपने पूरे अबतक के कार्य़काल में उन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस में हिस्सा नहीं  लिया। ऐसा क्यों है इसकी कहानी समझना होगा। प्रेस कांफ्रेंस में प्रायोजित सवालों की संभावना घट जाती है क्योंकि प्रेस कांफ्रेंस में सभी मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों की सहभागिता होती है। प्रधानमंत्री मोदी नहीं चाहते कि वो किसी असहज करने वाले सवालों का सामना करें। जैसा कि हम आमतौर पर सबसे मजबूत राष्ट्र अमेरिका में वहां के राष्ट्रपति और प्रेस के साथ दो दो हाथ होते देखते हैं। चूंकि प्रधानमंत्री का एक प्रोटोकाल होता है। अगर आप उसमें एक सामान्य प्रेस कांफ्रेंस नहीं कर सकते तो मीडिया के कुछ हिस्से के बड़े पत्रकारों से संवाद करें। अक्सर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह टीवी सम्पादकों के साथ या प्रिंट सम्पादकों के साथ प्रेस मीट आय़ोजित करते थे जिनका प्रसारण भी  किया जाता था। वहां हर चैनल या अखबार के प्रतिनिधि पत्रकार होते थे और उन्हें प्रश्न व सप्लीमेंट्री प्रश्न पूछने का पूरा हक होता था। नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को भी खत्म कर दिया।

पूर्ववत सरकारों में विदेश दौरे के समय मीडिया डेलीगेशन ले जाने का अनिवार्य चलन था। भारतीय पत्रकारों का भारी भरकम दल हमेशा प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्राओं में साथ जाया करता था। चाहे वो किसी भी दल से संबद्ध प्रधानमंत्री हों। ताकि विदेश की वास्तविक स्थिति भारतीय मीडिया को ज्ञात हो सके। और ये परंपरा भारत में ही नहीं हर मुल्क के लिए चली आ रही है और कायम है। यहां तक की अमेरिकी राष्ट्रपति स्वयं अपने साथ मीडिया का अच्छा खासा प्रतिनिधि मंडल साथ लेकर चलते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ इस परंपरा को खत्म किया बल्कि राष्ट्रपति, उप राष्ट्पति व केंद्रीय मंत्रियों को भी संकेत दिए कि वो इस व्यवस्था से परहेज करें। इसके पीछे क्या मंशा हो सकती है, समझने की बात है। पर नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो अपने किसी भी विदेश दौरे में पत्रकारों का प्रतिनिधि मंडल लेकर नहीं गए। हालांकि बावजूद भारतीय मीडिया उनकी विदेश यात्राओं को एक उत्सव के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, ये कहानी लम्बी औऱ दिलचस्प है। ये नरेंद्र मोदी के मीडिया प्रबंधन का नायाब नमूना है।

नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री अबतक जितने भी साक्षात्कार दिए हैं उनपर शोध होना चाहिए। और शोध दो बातों को केंद्र में रखकर होना चाहिए। पहला ये कि साक्षात्कार लेने वाले मीडिया संस्थान कौन रहे और दूसरा ये कि सवाल का स्वरूप क्या था। मैं तो मानता हूं कि कालांतर पर केवल और केवल प्रधानमंत्री से किए गए साक्षात्कारों के सिर्फ सवालों की रूपरेखा पर शोध हो तो समझ आएगा कि मीडिया मैनेजमेंट का क्या नायाब उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्य़काल में प्रस्तुत करके गए हैं। ऐसा उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री न कर सके। और हो न हो इस पर शोध होगा और चर्चा होगी। छोटे व्यक्ति पर नजर हो या न हो पर बड़े आदमी पर दुनिया नजर रखती है। अभी प्रधानमंत्री का प्रभाव औऱ दबाव दोनो हो सकता है। कालांतर में सत्ताएं साथ नहीं चलतीं और कोई हमारे ही बीच का आदमी ये समझाएगा कि एक प्रधानमंत्री से कैसे कैसे सवाल मुख्यधारा की मीडिया के पत्रकारों द्वारा पूछे गए थे, जिनमें ये सवाल भी थे कि आप बटुए में क्या रखते हैं, आम कैसे चूसते हैं। आदि आदि। जरूर इस पर बात होगी। जब देश नोटबंदी, बैंक घोटालों, अस्थिरताओं से घिरा हुआ था तब मुख्यधारा की मीडिया में मोदी से कैसे सवाल पूछे जाने चाहिए थे और कैसे पूछे गए। सवालों की समीक्षा जरूर होगी। प्रधानमंत्री मोदी के काल में मीडिया का स्वरूप औऱ ताकत दोनो इतिहास जानेगा।

कैसे एक प्रधानमंत्री फिल्म अभिनेता को साक्षात्कार देते हैं औऱ कैसे सरकारी उपक्रम से जुड़े प्रसून जोशी को। अक्षय कुमार का साक्षात्कार प्रमुख न्यूज चैनलों में से एक जी न्यूज चलाता है औऱ प्रसून जोशी का साक्षात्कार पूरी भारतीय मीडिया। इन साक्षात्कारों की प्रासंगिता पर सवाल किए जाएंगे। इन साक्षात्कारों में पूछे गए सवालों पर चर्चा होगी।

मीडिया को व्यवस्थित करने के क्रम में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियां देखिए। इतिहास याद रखेगा। एक फिल्म बनती है एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और फिल्म बनती है नरेंद्र मोदी। फिल्म भी एक जनप्रचार का माध्यम ही हैं। कैसे इन माध्यमों का उपयोग नरेंद्र मोदी ने किया काबिलेगौर है। ये भी अध्ययन का विषय है कि ये फिल्में किस समय बनीं, क्यों बनीं, इन फिल्मों में मुख्य किरदार कौन थे, उनकी पृष्ठभूमि क्या थी। जैसे एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के मुख्य किरदार अनुपम खेर की पत्नी भाजपा से चंडीगढ़ की सांसद हैं किरण खेर जी। कालांतर में चर्चा होगी।

मैंने अपने पूरे विश्लेषण में सरकारी मीडिया को शामिल ही नहीं किया है। मैं मानता हूं सरकारें कोई भी हों सरकारी मीडिया उनके लिए प्रचार माध्यम ही है। पूर्व की सरकारें भी ऐसा करती रही हैं। एक और बात जमाना याद करेगा मोदी राज में 2019 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी जी के नाम से एक चैनल ही लांच कर दिया गया। नमो टीवी। ऐसा भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ। नमो टीवी पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे वो इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।

https://www.livehindustan.com/national/story-delhi-ceo-sent-notice-to-bjp-for-violation-of-election-rules-on-namo-tv-2526199.html

ये चैनल भाजपा द्वारा प्रायोजित था जहां प्रधानमंत्री की रैलियों की कवरेज व रिकार्डेड भाषण चलाए जा रहे थे। चुनाव प्रचार खत्म होते ही ये चैनल खत्म हो गया। आप सोचिए कि मीडिया के पैरलल मीडिया खड़ा कर दिया गया। चुनावों के लिए चैनल खोल दिए गए। ये भी कारनामा किसी भी प्रधानमंत्री के काल में नहीं हुआ। और ऐसा भी किसी राजनैतिक दल द्वारा नहीं किया गया कि किसी चैनल को सिर्फ चुनाव प्रचार के उद्देश्य से खोल दिया जाए औऱ वो लगातार चुनाव आयोग व आचार संहिता की अनदेखी करे। इस चैनल ने चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी प्रचार सामग्री जारी रखी और चुनाव आयोग ने नोटिस दिया।

अब अंतिम बात की ओर आते हैं। भारत में कुल 890 के आसपास न्यूज चैनल हैं, जिनमें से 30 राष्ट्रीय चैनल हैं, जो हर राज्य में प्रसारित होते हैं। जबकि सूचना प्रसारण मंत्रालय की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक 44 हजार से ज्यादा पत्र पत्रिकाएं केवल हिंदी में प्रकाशित हो रहे हैं। मतलब भारतीय मीडिया का एक बहुत बड़ा साम्राज्य है। लेकिन इस साम्राज्य में से मुख्यधारा में आ जाएं और वहां जो भीड़ है उसमें अगर उन संस्थानों की बात करें जो एंटी मोदी या एंटी नेशनल के तमगे के साथ निकल रहे हैं तो वो उंगलियों में हैं। चैनलों में सिर्फ एनडीटीवी और शेष पूरी मीडिया में टेलीग्राफ, द हिंदू, कारवां पत्रिका औऱ डिजिटल की भीड़ में बीबीसी और अदना सा द वायर। भारतीय मीडिया के इस विशाल समुद्र में सिर्फ एक चैनल, सिर्फ 2 अखबार, सिर्फ एक पत्रिका और कमोवेश सिर्फ एक डिजिटल मीडिया संस्थान ऐसा है जो सरकार के कामकाज में सवाल कर सकने में सक्षम है। ये इतने बड़े विशाल, ताकतवर भारतीय मीडिया की वर्तमान स्थिति है। जितनी कई देशों की जनसंख्या नहीं है उतना यहां कई अखबारों की प्रसार संख्या है। लेकिन उनमें सरकार से सवाल पूछने का साहस नहीं है। और आज एक तरह से मीडिया में सरकार के विपक्ष की भूमिका के रूप में ये चुनिंदा लोग खड़े हैं। क्या दृश्य है। आप कल्पना करिए। लाखों की पत्रकारों की भीड़ में रवीश कुमार, एन राम, सिद्धार्थ वरदराजन खड़े दिख रहे हैं। ये भारतीय मीडिया की स्थिति है। और इन उंगलियों में खड़ें लोगों को भी सरकार अपने नुकीले दांत दिखाती रहती है। दबाने कुचलने का प्रयास करती रहती है। रवीश कुमार का भाजपा पार्टी ने ही बहिष्कार कर रखा था और शायद है, एन राम और सिद्धार्थ वरदराजन को लगातार बीजेपी की ओर से कानूनी नोटिसों का सामना करना पड़ रहा है। शेष मीडिया सरकार के प्रचारतंत्र का हिस्सा है। और इतना ही नहीं शेष मीडिया ने ऐसी कहानी गढ़ी है कि सरकार से सवाल पूछने वाले लोग व मीडिया संस्थान देशद्रोही हैं। जमाना ये भी याद रखेगा कि कैसे चोटी के पत्रकारों को मोदी राज में किसी भी मीडिया संस्थान ने हाशिए पर रखा। उनमें से एक पुण्य प्रसून वाजपेयी इसका पुख्ता उदाहरण हैं। भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया के काबिल पत्रकारों में से एक पुण्य प्रसून वाजपेयी को आज कोई भी छोटा या बड़ा चैनल काम देने से किनारा किए हुए है। क्यों। इसके पीछे की कहानी भी कालांतर में कही जाएंगी औऱ जमाना याद करेगा। देश के प्रमुख चैनलों में प्राइम टाइम का संचालन करने वाले पुण्य प्रसून आज सिटीजन जर्नलिज्म के लिए विवश हुए हैं। इस पूरे घटनाक्रम को मोदी राज की प्रेस स्वतंत्रता औऱ प्रेस प्रबंधन से जोड़कर बताया जाया करेगा।

एक दम नए कारनामे पर एकदृष्टि डालते हैं फिर खत्म करते हैं। चूंकि भारतीय मीडिया का कुशल प्रबंधन मोदी राज में किया गया है इसलिए यहां से नहीं अब भारत की सरकार की पोल खोल खबरें विदेशी मीडिया पेश करता है। समय देखिए। अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जर्नल ने आज एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि फेसबुक में जो भाजपा नेताओं की हेटस्पीट हैं या सरकार के सहयोगी संगठनों की नफरत भरी पोस्टें, उनको फेसबुक ने निजी लाभ के चलते नजरअंदाज किया है। हेटस्पीच के विरोध में लम्बे तगड़े भाषण देने वाले और इसी मुद्दे पर खालिद उमर, कन्हैय्या को घेरने वाले किस तरह से अपनी हेट स्पीच को भी सुरक्षित संचालित करने के उपाय कर रहे थे, वाल स्ट्रीट जर्नल ने खुलासा किया है। ये भी मोदी राज में सोशल मीडिया प्रबंधन की एक नजीर ही कही जाएगी। पुण्य प्रसून ने खुले मंच पर ये स्वीकारा है कि मीडिया संस्थानों को प्रधानमंत्री कार्यालय संचालित कर रहा है। सरकार से संबंधित खबरों का स्वरूप क्या होगा पीएमओ तय करता है। ये एक पत्रकार के खुलेमंच पर बयान हैं। साथ ही एकदम हाल के दिनों में देश के प्रमुख अखबार के पॉलिटिकल एडीटर को संस्थान ने साहब के कहने पर नमस्ते कह दिया। ऐसी भी खबरें हैं क्योंकि एडीटर साहब खबरों में 56 इंच का सीना लिखते और सीने की चौड़ाई का उनके कामकाज से विश्लेषण करते। कहा ये भी जा रहा है कि साहब ने स्वयं फोन करके एडीटर साहब की नौकरी खा ली।

नरेंद्र मोदी जिंदाबाद। आखिर हमारे प्रधानमंत्री हैं।

शेष शुभ

( एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है)

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