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नंदन और कादम्बिनी कि विदाई में आप कितने जिम्मेदार?

नंदन पत्रिका

त्वरित टिप्पणीः डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर  

हिंदुस्तान टाइम्स समूह की दो पत्रिकाएं क्रमशः नंदन (बाल पत्रिका) व कादम्बिनी (साहित्य पत्रिका) के जैसे ही कल बंद होने की खबर आई। सोशल साइट्स में लगातार लोग इन पत्रिकाओं से जुड़ी अपनी यादें साझा करने लगे। कुछ लोग प्रकाशन बंद करने के निर्णय को कोसने लगे। कुछ कहने लगे कि ऐसा नहीं करना चाहिए था। ज्यादा लोग दुख व्यक्त कर रहे थे कि इन दोनों पत्रिकाओं को चलना था। काफी पुराना संग रहा है लोगों का इन पत्रिकाओं से। कादम्बिनी 1960 तो वहीं नंदन 1964 से अनवरत प्रकाशित हो रही है। प्रकाशन बंद होने को पाठकों ने, लेखकों, पत्रकारों आदि ने क्षति बताया।

लेकिन कल एक नई तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वो ये थी जहां एक तरफ लोग पत्रिकाओं के बंद होने का दुख व्यक्त कर रहे थे तो वहीं बहुत सारे लोग ये सवाल कर रहे थे कि नंदन व कादम्बिनी के बंद होने पर छाती क्यों पीट रहे हो? विलाप क्यों कर रहे हो? आंसू क्यों बहा रहे हो? आखिर ये पत्रिकाएं क्यों प्रकाशित होनी चाहिए? लगातार लोग पोस्ट कर रहे थे औऱ जनता से ऐसे ही कुछ सवाल कर रहे थे। ऐसी पोस्टों में दुख व्यक्त करने वाले लोगों से सवाल किया जा रहा था कि क्या आप इन दोनों पत्रिकाओं के नियमित पाठक थे? क्या आपके घर ये पत्रिकाएं नियमित आती थीं? कितने वर्षों से आपने इन पत्रिकाओं को पढ़ना तो दूर शक्ल भी नहीं देखी?  ऐसे कई सवाल उठ रहे थे। लोग ये भी कह रहे थे कि पूरा घर तो मोबाइल से चिपका रहता है, पत्र पत्रिकाएं पढ़ने का वक्त किसे है। बाकी रही सही कसर डिजिटल मीडिया ने खत्म कर दी। ऐसे में क्यों हिंदुस्तान टाइम्स समूह अपनी इन पत्रिकाओं को प्रकाशित करवाए।

इन दो तरह के विमर्श के बाद वैसे बड़ा वाजिब औऱ मौजू सवाल है कि प्रकाशित माध्यम लगातार पाठकों की उपेक्षा झेलते हुए आखिर कबतक जिंदा रह सकते हैं। हालांकि तमाम आरोपों के बाद भी ये अधिकारिक तौर पर एचटी से जानना दिलचस्प होगा कि वर्तमान में दोनों पत्रिकाओं की प्रसार संख्या क्या थी। और पत्रिकाओं के बंद होने की वास्तविक वजह क्या रही। क्या प्रसार संख्या में कमी आना प्रकाशन बंद करने का कारण रहा। मूल कारणों के बाद ही कोई फायनल कमेंट दिया जाए तो बेहतर है। लेकिन ये सच है कि साहित्य व प्रकाशित माध्यमों खासतौर पर पत्रिकाओं के लिए समय बिल्कुल अनुकूल नहीं है। कुछ महीने पहले ही खेल जगत की मशहूर पत्रिका क्रिकेट सम्राट का प्रकाशन बंद कर दिया गया था और अब इन दोनों का वही हश्र हुआ।

दरअसल है क्या कि प्रिंट माध्यमों की अपनी विषमताएं हैं, या कहें सबसे ज्यादा विषमताएं हैं। उसमें सबसे प्रमुख प्रसार संख्या बनाए रखना औऱ प्रसार व्यवस्था। छप रहे माध्यमों की वितरण व्यवस्था तमाम प्रयासों के बाद भी बहुत जटिल है। जिसमें काफी श्रम-धन जुटाना पड़ता है। इसके अलावा एक ऐसे दौर में जब मीडिया भी आर्थिक तंगी की मार से अछूता नहीं है तो प्रबंधन ऐसे निर्णय अगर लेता है तो कोई अचरज नहीं है। मीडिया से बाहर वालों के लिए अचानक ये सुनना कि नंदन व कादम्बिनी बंद हो गईं, थोड़ा आश्चर्य़जनक होगा, लेकिन मीडिया से जुड़े लोगों के लिए ये इस दौर में सामान्य खबर है, क्योंकि वो जानते हैं कि कोरोना काल के महीनों में ही टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के दो बड़े अखबार, टीवी टुडे नेटवर्क समूह का एक अखबार व चैनल, द हिंदू समूह के कई ब्यूरो, पत्रिका समूह के कई ब्यूरो, टेलीग्राफ समूह के कई संस्करण, पंजाब केसरी समूह के कई संस्करण पहले ही बंद किए जा चुके हैं। हाल ही में क्रिकेट सम्राट का अंत होना।

गौरतलब है कि कोरोना के दौर में इस भ्रांति या कहें सच्चाई के चलते कि किसी भी वस्तु को छूने से भी कोरोना फैल सकता है, इस बात का भी प्रिंट मीडिया पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सिर्फ इसी एक बात की वजह से दिल्ली के बड़े बड़े अखबारों की प्रसार संख्या औंधे मुंह गिर गई है। लोग अखबार और प्रिंट माध्यमों को छूने से बचते रहे, लोगों ने हॉकरों को सोसायटी में ही आने से रोक दिया। लोगों को डर था कि कहीं घर में आ रहे अखबार व पत्र पत्रिकाओं को छूने से हम कोरोना का शिकार न बन जाए। हालांकि मीडिया संस्थानों ने इसके लिए काफी जागरुकता फैलाने की कोशिश की, लेकिन अंदर की बात तो ये रही कि स्वयं मीडिया संस्थानों में जो फाइलें अखबारों की संयुक्त रूप से बनती हैं, पत्रकार अब भी उन्हें पढ़ने से कतरा रहे हैं। तो पाठकों की सावधानी को गलत कैसे ठहराया जा सकता। कुलमिलाकर कोरोना काल का भी असर प्रिंट माध्यमों में इस प्रकार देखने को मिला, जिसके चलते प्रकाशन बंद किए गए, या उनकी प्रसार संख्या में कटौती हुई। क्योंकि जब पत्रिका पाठक के पास जाएगी ही नहीं तो प्रकाशक उन्हें छापने का जोखिम क्यों लेगा। ऐसा माना जाता है कि प्रिंट माध्यमों में सबसे ज्यादा खर्च प्रोडक्शन व सर्कुलेशन पर ही होता है। किसी भी प्रिंट माध्यम में घाटे की भरपाई कर्मचारियों की तनख्वाह द्वारा या उनको बाहर का रास्ता दिखाकर करना सबसे अंतिम विकल्प माना जाता है।

शेष, साहित्य की ओर घटता रुझान व पढ़ने की आदत कम होना भी एक अन्य वजह मानी जा सकती है। बहुत संभव है कि पाठकों की दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए इन दोनों पत्रिकाओं का डिजिटल प्रकाशन शुरू किया जाए, जो आज के दौर का सस्ता औऱ सुलभ प्रकाशन है।

गत माह मशहूर खेल पत्रिका क्रिकेट सम्राट बंद हुई तो पत्रिका के प्रबंधक व सम्पादक आनंद दीवान बहुत जरूरी सवाल उठाते हैं, वो  कहते हैं, ‘नयी पीढ़ी में रीडिंग हैबिट नहीं है. मैगजीन पढ़ने की आदत अब लोगों में उतनी ज्यादा नहीं रही. वह सब चीजें मोबाइल में ही ढूढ़ते हैं. एक क्लिक करते ही उन्हें संबंधी हर सामग्री मिल मिल जाती है. वहीं, जो पुराने लोग पढ़ते थे, उन्होंने भी पढ़ना छोड़ दी है. जब पाठक ही नहीं मिलेंगे तो कब तक कोई पत्र-पत्रिका खुद को बचाए रख पाएंगे? आनंद दीवान कहते हैं, ‘प्रिंट मीडिया के लिए यह बहुत चुनौतीपूर्ण दौर है, जो आगे और भी चुनौतीपूर्ण होता जाएगा. मैगजीन पढ़ने का रिवाज बहुत ही कम हो जाएगा, मुझे तो लगता है कि डेली न्यूजपेपर को भी खुद को बचाए रखना आसान नहीं होगा.’

 

नीचे कुछ प्रतिक्रियाएं, जो भारत में प्रिंट माध्यमों के गिरते अस्तित्व की कहानी कहती हैं

नंदन और कादम्बिनी जैसी अच्छी पत्रिकाओं का बंद होना दुर्भाग्यपूर्ण.मोबाइल, टीवी के आदी लोग पत्रिकाएं या किताबें पढ़ना ही नही चाहते

डॉ प्रेम स्वर्णकार


नंदन और कादंबिनी की हाय-तौबा में सभी साहित्यकार बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इससे पहले कभी किसी ने इनके गिरते हुए स्तर की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। जिस नंदन और कादम्बिनी को पढ़कर हमारी पूरी पीढ़ी बड़ी हुई है, उस के लिए कथा या कथेतर साहित्य रचने का ध्यान भी किसी को नहीं रहा। बेतहाशा मूल्यवृद्धि और बेईमानी ने इन पुस्तकों का कितना नुकसान किया है, इस पर कोई चर्चा नहीं कर रहा। अभी दस दिन हुए, चंपक की पांच प्रतियों का एक सेट छुटकी के लिए मंगवाया था, एक प्रति का मूल्य था ₹45. दो सौ चालीस रुपए का पूरा सेट जब घर पहुंचा, एक भी ताज़ा प्रति नहीं थी। दो साल पहले की प्रकाशित प्रतियां भेज कर, अपने गोदाम का बोझ, प्रकाशक ने हल्का किया। (सनद के लिए फ़ोटो लगा दी है) यदि आप नंदन और कादंबिनी के बंद होने का सोग मना रहे हैं, तो इस हरक़त पर भी लानत भेजनी चाहिए। अखबार भी बच्चों के नाम पर एक कोना समर्पित करके, अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। क्या उसके कंटेंट पर कभी ध्यान दिया गया? सोचने वाली बात है, लेकिन हम सब सोचने से बचना चाहते हैं। पत्रिकाओं के बंद होने पर, क्या हम सब की ज़िम्मेदारियां तय नहीं होनी चाहिए?

तुलिका शर्मा


बहुत सारे कथित या वास्तविक बुद्धिजीवी लोग कादम्बिनी और नंदन के बंद होने पर फ़ेसबुकिया छाती पीट रहे।
जो लोग इन पत्रिकाओं के बंद होने पर श्यापा कर रहे, उन्होंने अंतिम बार कब इन पत्रिकाओं को खरीदा था, उन्हें भी याद नहीं होगा। हमारे बच्चे नंदन जानते भी नहीं होंगे और हमने कभी भूले से भी उन्हें इसे खरीद कर दिया भी नहीं होगा।
पत्रिकाओं के कालकवलित होने के लिये सबसे अधिक जिम्मेदार हम हैं। छाती पीटने वाले। अब अखबारों की बारी है। फ़ेकबुक, यूट्यूब और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का कमाल। लगे रहिये मोबाइल पर।
संजय सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
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“कादम्बिनी” और “नंदन” पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद होने जा रहा है। इसे पठनीयता में कमी होने की संज्ञा मैं नहीं देना चाहता। पिछले कुछ समय से डिजिटल दुनिया का सर्वेक्षण करने में लगा हुआ हूँ और बिलकुल साफ दिख रहा है कि किस तरह वहाँ उपलब्ध कंटेंट ने “गृहशोभा”, “मेरी सहेली”, “सरिता” और “सुमन सौरभ” जैसी पत्रिकाओं अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिये हैं।
यह पठनीयता का संक्रमण काल है जो प्रिंट से धीरे धीरे डिजिटल की ओर खिसक रहा है। पर अब इन पत्रिकाओं के डिजिटल पदार्पण का समय भी अब निकल चुका है क्योंकि डिजिटल दुनिया भी तेजी से पढ़ने के बजाय देखने की ओर बढ़ती जा रही है। यूट्यूब इस कनवर्जेंस क्रांति का अगुवा बना हुआ है और अब फेसबुक भी टेक्स्ट के बजाय वीडियो को ही प्रमोट करता है। मार्क ज़ुकरबर्ग तो ये ऐलान कर ही चुके हैं।
सूर्यन मौर्या
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कादम्बिनी एवं नंदन पत्रिकाओं का बंद होना बेहद दुखद है। कभी हम भी छपे थे। परन्तु इसे समझने की आवश्कता है कि बाजार उपयोगिता एवं विपणन के सिद्धांत पर कार्य करता है। इन पत्रिकाओं की उपयोगिता शिथिल पड़ने लगी थी इस हेतु इनके मालिक के साथ ही पाठक ज्यादा जिममेदार है। कोरोना का भी बहाना मिल गया। हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के साथ यह दुर्भाग्य है कि हम कल्पनाओं में ज्यादा जीते है। पत्रिकाएं पाठको के साथ ही कारोबार पर भी चलती है कादम्बिनी, नंदन के पाठक आज भी है कल भी रहेंगे परन्तु बाजार उन पाठको तक पहुंचना ही नहीं चाहता । हिंदी से जुड़े पत्रकारों एवं बाजार को यह समझना होगा कि उन्हें अपने लक्ष्य को पुन: निर्धारित करने की आवशयकता है और हिंदी को बतौर राष्ट्रभाषा पूरे राष्ट्र में फैले अपने पाठको एवं प्रेमियों तक पहुंचना होगा तभी मूल अर्थ में यह राष्ट्रभाषा बनेगी। बाजार की हिंदी को बोली से ऊपर उठकर अपने को भाषा में परिवर्तित करना होगा। और इन उद्यमों में ये पत्रिकाएं सहायक बनती परन्तु इनके मालिक समझेंगे तब । साथ ही हिंदी के लोगो को पाठक धर्म का भी पालन करना होगा अन्यथा बहुत देर हो जाएगी। इनका बंद होना मुद्रण उद्योग के लिए भी चिंतन का विषय है।
@ डॉ साकेत सहाय
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साहित्यिक पत्रिका कादम्बिनी और बाल पत्रिका नंदन के बंद होने की जानकारी सामने आने के बाद आज सुबह से सोशल मीडिया पर क्रंदन हो रहा है। क्यों एक प्रतिष्ठित पत्रिका बंद हो गई इस पर हर जगह आंसू और आक्रोश देखने को मिल रहे।
पर क्या आपने ये सोचा कि जब पत्रिकायें लोग खरीदेंगे नहीं, खरीद कर पढ़ेंगे नहीं फिर कैसे ये जीवित रहेंगी। जो लोग कादम्बिनी और नंदन के बंद होने पर आंसू बहा रहे हैं उनमें से कितने लोग इन पत्रिकाओं को अपने घर मंगवाते थे! अगर इन पत्रिकाओं की ठीक-ठाक बिक्री हो रही होती तो आज इन्हें क्यों बंद किया जाता।
जो मेरे दशकों पुराने मित्र हैं उन्हें पता है कि नौकरी के शुरुआती दिनों में जब कम सैलरी थी तब भी मैं रेगुलर तीन-चार अखबार घर मंगवाता था, क्योंकि मुझे पता था कि अखबार, पत्रिकायें, कलम और किताबों के खरीदने का संबंध इंसान की मानसिकता से है उसके माइंडसेट से है। मुझे हमेशा लगता था कि मैं मैं तीन-चार रुपये की कई सिगरेट दिनभर में पी जाता हूं पर क्या ढ़ाई-तीन रुपये के अखबार मैं घर पर नहीं मंगवा सकता। अखबार खरीदते से समय दो और बातें जेहन में रहती थीं। एक तो ये कि जो अखबार मैं लेता हूं वो अच्छा है और लोकतंत्र की मजबूती के लिए इसका होना जरूरी है, और दूसरी बात ये रहती थी कि अगर हम अखबार खरीद कर पढ़ रहे हैं तो इससे कहीं न कहीं हम अपनी पत्रकार बिरादरी के मित्रों की एक हद तक आर्थिक मदद कर रहे हैं।
इंटरनेट पर इन दिनों तमाम अखबारों के अनुरोध देखने पढ़ने को मिल रहे हैं। बार-बार ये ये पत्रिकायें और अखबार सब्सक्रिप्शन लेने का आग्रह कर रहे हैं। एक तो न खरीदने की मानसिकात और ऊपर से कोरोनाकाल, ऐसे माहौल में अखबारों और पत्रिकाओं के सामने उनके अस्तित्व का संकट है। 99 और 100 सौ रुपये महीने के हिसाब से अखबार सब्सक्रिप्शन दे रहे हैं लेकिन इसके लिए भी संपादकों और प्रकाशकों को बार-बार आग्रह करना पड़ता है। अगर हम अखबारों का सब्सक्रिप्शन नहीं खरीदेंगे तो फिर प्रकाशन की ये व्यवस्था फिर कैसे चलेगी। इनका हश्र भी कादम्बिनी और नंदन के जैसा होगा।
एक बार रिपोर्टिंग के दौरान राइटिंग इंस्ट्रूमेंट कंपनी लग्जर के मालिक मिस्टर जैन से मुलाकात हुई। जैन साहब ने कहा कि कलम और पुस्तक खरीदने को लेकर हम भारतीयों की एक अजीब मानसिकता है। उन्होंने कहा कि अगर कोई बच्चा किसी अच्छी कलम या पेंसिल खरीदने की जिद कर दे तो उसके माता-पिता उसे ये कहकर मना कर देंगे कि तू अभी छोटा है 50-100 रुपये की महंगी कलम तुम्हारे लिए ठीक नहीं…जबकि कलम एक छात्र की सबसे प्रिय वस्तु है जो सबसे ज्यादा समय तक छात्र के साथ रहती है….दिलचस्प है कि वही माता-पिता रेस्टोरेंट में डिनर के बाद अपने बच्चों की आइसक्रिम पर कुछ सौ रुपये खर्च कर देते हैं।
हिन्दी और अंग्रेजी की बड़ी-बड़ी पत्रिकायें बंद हो चुकी हैं। कई अखबार बंद हो चुके हैं।कई अखबार और पत्रिकायें बंद होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। अगर हमने अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं लाया फिर हमारी नई पीढ़ी मुफ्त के कचरा न्यूज चैनलों को देख कर किस दुनिया का निर्माण करेगी इसका आप अनुमान लगा सकते हैं।
मनोज मनयानिल
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नंदन और कादम्बिनी के बंद होने पर दुखी क्यों हो रहे हैं? अपने आप से पूछिए कि आपने आखिरी बार नंदन और कादम्बिनी कब खरीदा था? परिवार तो मोबाइल में घुसा रहता है। सब कुछ ऑनलाइन हो गया है तो उसकी कीमत किस न किसी तरह से तो चुकानी ही होगी। जब बिक्री ही नहीं होगी तो छापकर क्या होगा।
मिथिलेश धर
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“क्रिकेट सम्राट” के बाद “नंदन” और “कादम्बिनी” बंद होने की भी दुखद ख़बर आ रही है. यक़ीनन ऐसा नहीं होना चाहिए, ये अच्छा नहीं है.
लेकिन इस ख़बर ने मुझे अपने आप से ये सवाल भी पूछने पर मजबूर किया है कि मैंने आखि़री बार ये पत्रिकाएं कब ख़रीदी थीं या मैंने ये पत्रिकाएं अपने जानने वालों के घर कब देखी थी या उन्होंने कब ख़रीदी थी?
ये बातें/सवालात अजीब लग सकते हैं लेकिन हमको अपने अपने आप से ये तो पूछना ही होगा कि जिस चीज़ से हम मोहब्बत का दम भरते हैं या जिसको लेकर nostalgic हो रहे हैं, कालांतर में उसको लेकर हमारा रवैया क्या रहा है. मने कह रहे हैं..
मेहताब आलम
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कादम्बिनी और नंदन बंद होने की खबर सुखद तो नहीं हैं। लेकिन हमें भी तो याद नहीं कि आखिरी बार इन पत्रिकाओं को कब खरीदा या पढ़ा था। हालांकि बचपन के कुछ 15 साल की यादों में ये दोनों समाहित हैं। हम भाई बहन नंदन को पहले से पहले पढ़ने के लिये उतावले रहते थे तो पापा के संग्रह में हर महीने कादम्बिनी के अंक बढ़ते जाते थे। आज भी तंत्र मंत्र के अनूठे विशेषांकों का संग्रह घर पर रखा है
वैभव माहेश्वरी
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