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साहित्यिक शनिवार में कवि सुभाष नीरव की कविताएं

सुभाष नीरव, कवि, कथाकार, अनुवादक

सुभाष नीरव की कुछ कविताएं सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ;बिन पानी समंदर; से… श्री नीरव जाने कवि, कथाकार और अनुवादक हैं। दिल्ली रहते हैं। उनका विस्तृत परिचय यहां कविताओं के अंत में उल्लेखित किया गया है। उनके कविता संग्रह से ये खूबसूरत कविताएं प्रस्तुत हैं। 

 

1

बरसों बाद
बरसों बाद
कोई करीब आकर बैठा
सर्दियों की गुनगुनी धूप-सा
बरसों बाद
किसी ने यूँ हल्के से छुआ
जैसे छूती है हवा हौले से
सिहरन दौड़ाती देह में
बरसों बाद
यूँ साझे किये
अपने दो बोल किसी ने
जैसे घर की मुंडेर पर
आकर करती है चिड़िया
बरसों बाद
खुशबुओं के सरोवर में उतरा हूँ
डूब जाने के लिए !
2
कमाल
मेरे अंदर कभी
एक रेगिस्तान हुआ करता था
आज वहाँ
हरा-भरा जंगल है
ये खुदा की रहमतों से ज्यादा
तेरे प्यार की
बारिशों का कमाल है !

3
समंदर
इस समंदर का क्या करूँ
जो खींचता तो है खूब अपनी ओर
पर मेरी प्यास बुझाने के लिए
चुल्लू भर पानी भी नहीं है जिसके पास
लौटता हूँ –
नदियों की तरफ ही अपनी प्यास लेकर
पर नदियों की चाहतों में भी तो
ये समंदर ही साँस लेता है !
4
सूखी नदी-सा प्रेम
जो असम्भव था
उसे सम्भव बनाने में लगा रहा
जो अप्राप्य था
उसे प्राप्त करने की जुगत में रहा
बहुत कोशिश की
सपने टूटे कांच की किरचें न बनें
पर वे टूट कर लहूलुहान करते रहे
जिन्दगी की भागमभाग में
प्रेम एक सूखी नदी की तरह मिला
जिसमे कूदकर डूबना असम्भव था

5
प्रेम की नदी में
तुम्हारे प्रेम की नदी में
भीगता तो हूँ खूब-खूब
सोखता भी हूँ
तुम्हारे प्रेम की तरलता को
खूब अपने अंदर तक
जब जब डूबना चाहता हूँ
इस नदी में बहुत गहरे
तो नटखट लहरें
मुझे उछाल कर
सतह पर पटक देती हैं
इस प्रेम की नदी में
लकड़ी के किसी टुकड़े-सा
मैं सतह पर तैरने को अभिशप्त हूँ।
6
छुअन
एक मीठी-सी सिहरन
दौड़ गई है पूरी देह में
यकायक
जैसे अभी-अभी
छुआ हो तेरी उंगलियों ने मुझे
तभी फोन पर तेरा मैसेज चमका –
मेरे हाथों में है तेरी किताब
मैं पढ़ रही हूँ तुझे
वरका-वरका !

7
बिन पानी समंदर

ख्वाहिशों का
ये कैसा समंदर था
जिसमें पानी नहीं था
और
तैर कर जाना था !
8
परीक्षा
मेरे इर्द-गिर्द
आवाज़ों का
बेइंतहा शोर था
और मुझे
तेरी आवाज़ को पहचान कर
तुझ तक पहुँचना था !

9
चाहत
इसे मेरी चाहत का
जुनून कह या पागलपन
मैं तुझमें बार बार उतरना चाहता हूँ
रहट के खाली पीपों-सा
और बाहर निकल
तुझसे लिया
तुझमें ही उलीच देना चाहता हूँ
फिर से
तुझमें उतर जाने के लिए !

10

प्रेम के पंछी
प्रेम के पंछी खतरे में हैं
जंगल में
नफरतों की आग सुलगी है
हमें अपने आँसुओं को
बारिशों में बदलना है !

11
कविता
कविता खोलती है द्वार
बाहर के ही नहीं
अंदर के भी
मेरे लिए
जीवन की तीखी धूप में
छतरी-सा तन जाती है
मुझ पर कविता
बन जाती है
अँधेरों में उजाला भी
कविता मुझे
कुएं का मेंढक नहीं
आकाश में उड़ता
परिंदा बनाती है !

12
रूमाल
तुमसे बिछुड़ते हुए
मेरी आँखें डबडबा आई थीं
और मेरी जेब में रूमाल नहीं था
तुमने आगे बढ़कर
अपने दुपट्टे के पल्लू से
पौंछ दिए थे मेरे आँसू
अब तुमसे मिलते वक़्त मैं
जेब में रूमाल नहीं रखता।
13
दीवारें
फड़फड़ाता न हो जब तक
कोई कैलेंडर
समय की टिक-टिक न सुनाती हो
कोई घड़ी
न टंगी हो कोई खूबसूरत तस्वीर
या पेंटिंग उनके सीने पर
घर की दीवारें
दीवारें नहीं लगतीं…

दीवारें तब तक
दीवारें नहीं होतीं
जब तक उनकी छाती पर
कोई कील न ठुंकी हो !

14
स्मार्ट फोन

मैं सफ़र में था
हसीन लोग
हसीन  नज़ारे
कब मेरे करीब से गुज़र गए
मुझे पता ही न चला
इधर– उधर देखने की
फुर्सत ही  कहाँ थी
सारे सफ़र
मैं तो गड़ाए था उसी में नजरें
मेरे  खूबसूरत पलों का दुश्मन
आजकल मेरे हाथ में रहता है !

15
शर्मसार
चट्टान की छाती पर
पूरी ठसक के साथ मस्ती में झूमता
छोटा-सा पौधा
जिसकी फुनगी पर
मुस्कराता-इठलाता है
एक नन्हा-सा फूल
जब से देखा है
मैं खुद से शर्मसार हूँ
नाउम्मीदी की पथरीली ज़मीन को
व्यर्थ ही ढोता रहा मैं आजतक!
16
काम करता आदमी

कितना अच्छा लगता है
काम करता आदमी
बहुत अच्छा लगता है
लोहा पीटता लुहार
रंदा लगाता बढ़ाई
गोद में बच्चा लिए
पत्थर तोड़ती औरत
और
सड़क बनाता मजदूर

कितना अच्छा लगता है
मिट्टी संग मिट्टी हुआ किसान
अटेंशन की मुद्रा में
चैकसी करता जवान
अच्छा लगता है
फाइलों में खोया बाबू
पियानों की तरह
;की-बोर्ड; पर उंगलियाँ दौड़ाता टाइपिस्ट
बहुत अच्छी लगती है
धुआँते चूल्हे में फुंकनी मारती माँ
तवे के आकाश पर
चाँद-सी रोटी सेंकती बहन
धुले-गीले कपड़ों को
अलगनी पर सुखाती पत्नी
दरअसल
काम करता आदमी
प्रार्थनारत होता है
और
प्रार्थनारत आदमी
किसे अच्छा नहीं लगता!
17
पढ़ना चाहता हूँ अच्छी कविता
मैं पढ़ना चाहता हूँ
एक अच्छी कविता
कविता
कि जिसे पढ़कर
खुल जाएँ
बाहर-भीतर के किवाड़
मन का कोना-कोना
गमकने-महकने लगे
ताज़ी हवा से

कविता
कि जिसे पढ़कर
मन के अँधेरों में उतर आए
रौशनी की लकीर
पढ़ना चाहता हूँ मैं
एक अच्छी कविता
एक ऐसी कविता
जो उतरे मेरे भीतर
जैसे उतरते हैं पहाड़ों पर से
घाटियों में जल-प्रपात
अपने मधुर संगीत के साथ
कविता
तुम आओ तो इसी तरह आना
मेरे पास!
18
बेहतर दुनिया का सपना देखते लोग
बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग इस दुनिया में

जो चढ़ते सूरज को करते हैं नमस्कार
जुटाते हैं सुख-सुविधाएँ और पाते हैं पुरस्कार
बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग
जो देखकर हवा का रुख चलते हैं
जिधर बहे पानी, उधर ही बहते हैं
बहुत अधिक गिनती में हैं ऐसे लोग
जो कष्टों-संघर्षों से कतराते हैं
करके समझौते बहुत कुछ पाते हैं
कम नहीं हैं ऐसे लोगों की गिनती
जो पाने को प्रवेश दरबारों में
अपनी रीढ़ तक गिरवी रख देते हैं
रीढ़हीन लोगों की इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत कम गिनती में हैं ऐसे लोग जो
धारा के विरुद्ध चलते हैं
कष्टों-संघर्षों से जूझते हैं
समझौतों को नकारते हैं
अपना सूरज खुद उगाते हैं
भले ही कम हैं
पर हैं अभी भी ऐसे लोग
जो बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं
और बचाए रखते हैं अपनी रीढ़
रीढ़हीन लोगों की भीड़ में!
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लेखक परिचयः

सुभाष नीरव (वास्तविक नाम : सुभाष चन्द्र), उम्र : 67 साल। 40 वर्ष का साहित्यिक सफ़र।
अस्सी के दशक से व्यवस्थित और नियमित रूप में छपना-छपाना प्रारंभ हुआ और पहचान
मिलनी शुरु हुई। कहानी, लघुकथा, कविता ही प्रमुखत: केन्द्र में रहे लेकिन बाल कहानियाँ,
संस्मरण, समीक्षाएँ भी संग-संग चलती रहीं। मौलिक लेखन के समानांतर अपनी माँ बोली पंजाबी
के साहित्य के अनुवाद की यात्रा भी चलती रही जो अभी तक जारी है। देश की हर बड़ी-छोटी

हिन्दी में छह कहानी संग्रह
हिंदी में (‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’, ‘आख़िरी पड़ाव का दुःख’, ‘लड़कियों
वाला घर’, ‘रंग बदलता मौसम’ और ‘गौरतलब कहानियाँ’), एक कहानी संग्रह पंजाबी में – ‘सुभाष
नीरव दीआं चैणवियां कहाणियाँ’। तीन लघुकथा संग्रह (‘कथा बिन्दु’, ‘सफ़र में आदमी’ और ‘बारिश
तथा अन्य लघुकथाएँ)। इसके अतिरिक्त तीन कविता संग्रह, दो बाल कहानी संग्रह तथा हिन्दी
कहानियों की पाँच संपादित पुस्तकें। पंजाबी से 600 से अधिक कहानियों और 50 साहित्यिक
पुस्तकों (कहानी, उपन्यास, आत्मकथा और लघुकथा) का हिंदी में अनुवाद प्रकाशित जिनमें आ
पुस्तकें राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत से प्रकाशित। कुछ लघुकथाएँ, कहानियाँ, बाल कथाएँ प्राइमरी
और स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में समय-समय पर शामिल होती रहीं।
अनुवाद के लिए ;भारतीय अनुवाद परिषद; का;डॉ गार्गी गुप्त द्विवागीश पुरस्कार;(2016),
;माता शरबती पुरस्कार(1992), ;मंच पुरस्कार;(2000), कहानी ;रंग बदलता मौसम; के लिए
राजस्थान पत्रिका का ;साहित्य सृजन पुरस्कार;(2011)

संपर्क : 9810534373(मोबाइल), ई मेल : subhashneerav@gmail.com

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