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साहित्यिक शनिवार में डॉ. नीरज सुधांशु की लघुकथाएं

डॉ. नीरज सुधांशु

डॉ. नीरज सुधांशु बिजनौर उत्तरप्रदेश की रहने वाली हैं। प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। चिकित्सकीय कार्य के साथ साहित्यकार भी हैं। उनकी कुछ लघुकथाएं यहां प्रस्तुत हैं। उनका विस्तृत परिचय भी यहां संलग्न है। 

 

  1. दबे पाँव

उनका शरीर जैसे अपनी ही धुरी पर घूम रहा था। अधमुंदी आँखों से हर तस्वीर चलती हुयी धुंधली-सी दिखायी दे रही थी।

थोड़ी देर पहले ही एन्जियोग्रापफी के बाद वर्मा जी को रूम में शिफ्ट किया गया था। वे अभी भी हल्के नशे की गिरफ्त में थे। नज़र अभी किसी एक जगह नहीं टिक पा रही थी। सामने वाली दीवार पर एक  छिपकली चल रही थी, वो उस पर नज़र जमाने की असफल कोशिश कर रहे थे।

बेटा अखिल डाक्टर से बात करने उनके केबिन में गया हुआ था।

‘आपके पिता के हार्ट में एटी पर्सेंट ब्लाकेज आया है।’ डाक्टर ने रिपोर्ट का मुआयना कर बताया।

पर इन्हें तो पहली ही बार ऐसी घबराहट का अहसास हुआ और मैं सीधे यहाँ लेकर चला आया।’ बेटे को उनकी हालत पर आश्चर्य हो रहा था।

‘यह तो हम नहीं कह सकते कि कब से है। कभी-कभी बीमारी साइलेंट रहती है और अचानक ही लक्षण पैदा होते हैं।’ डाक्टर ने समझाया।

‘मेरे पिता ठीक तो हो जायेंगे न!’

‘इनकी बायपास सर्जरी करनी होगी।’

‘बायपास…! सर्जरी करनी ज़रूरी है क्या। देख लीजिये न डाक्टर साहब, कोई और उपाय भी तो होगा। दवाइयों से काम नहीं चल सकता क्या?’

‘अब केवल दवा से काम नहीं चल पायेगा।’

उधर पिता की नज़र अब छिपकली को साफ-साफ देख पा रही थी।

‘डॉक्टर साहब, बाईपास सर्जरी में तो बहुत पैसा खर्च होगा न!’ बेटे ने सुन रखा था।

‘हमारे यहाँ सबसे कम खर्च में ट्रीटमेंट होता है।’ डाॅक्टर ने दिलासा दिया।

‘कुछ समय दीजिये, अभी तो इस इरादे से नहीं आया था।’ अखिल ने परिवार के लोगों से राय लेने व सेकेंड ओपिनियन लेने के इरादे से टालना चाहा।

‘देख लीजिये, आपके पिता के दिल की हालत बहुत नाजुक है, कभी भी, कुछ भी हो सकता है।’ डाॅक्टर ने चेताया।

वर्मा जी का ध्यान न जाने क्यों छिपकली की ओर ही लगा था। निगाह कुछ साफ हुयी तो पास ही एक पतंगा भी दीवार पर आसन जमाये दिखायी दिया। छिपकली दबे पाँव उसके नज़दीक पहुँच रही थी।

‘पैसे का इंतज़ाम भी तो करना होगा, इतने पैसे लेकर नहीं चला था मैं।’ उसने समस्या से अवगत कराया।

‘पैसे का क्या है, उन्हें भर्ती कर दीजिये व घर खबर कर दीजिये, या आॅनलाईन पेमेंट कर दीजिये, क्रेडिट कार्ड से भी चलेगा।’

‘पर…’

‘पर वर मत कीजिये, ऐसा न हो कि आप सोचते ही रह जायें, और…।’

अचानक नर्स ने आकर बताया, ‘सर…, सर, इनके पेशेंट का ब्लड प्रेशर फिर से काफी बढ़ गया है।’

‘ओह…, कंडीशन बिगड़ रही है, जल्दी सोच लीजिये।’ डाॅक्टर ने जल्द निर्णय लेने को कहा।

अखिल को कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने घबराकर उनके सामने हाथ जोड़ लिये, ‘डॉक्टर साब, कुछ भी करिये, बस, मेरे पिता जी को ठीक कर दीजिये।’

छिपकली ने आखिरकार फुर्ती से शिकार को दबोच ही लिया।

 

  1. क्षम

        

पारुल बहुत बैचेनी महसूस कर रही थी। किसी काम में मन भी नहीं लग रहा था। प्रसव के बाद ऑफिस में पहला दिन था उसका ।

वहीं  मातृत्व की  छाया से दूर  अपनी सात माह की बिटिया को डेकेयर में पहली बार छोड़कर आई थी।

डेकेयर उसके ऑफिस की बिल्डिंग में ही प्रथम तल पर था व ऑफिस दसवीं मंज़िल पर।

वह  बार बार  बिटिया  के बारे में सोच  कर हलकान हुई जा रही थी — ‘पता नहीं अनजान लोगों के बीच कैसे रहेगी ! रो तो नहीं रही होगी?  मुझे न पाकर दूध भी पिया होगा कि नहीं?’

कनखियों से उसे  निहार रही , पास बैठी कलीग से, उसका यह हाल देखा नहीं गया , आखिर उसने कह ही दिया-” नीचे जाकर देख क्यों नहीं आती ? दिल को तसल्ली हो जाएगी।”

चाह तो वह भी यही रही थी, बस, ज़रा सा इशारा मिला सहेली का, तो भागी चली गई, बिटिया की टोह लेने।

कहीं बच्ची उसे देखकर परेशान न हो जाए ,यह सोचकर वह दरवाज़े की ओट से ही उसके क्रिया-कलाप को निहारने लगी।

अभी कुछ दिनों पहले ही थोड़ा सरकना  सीखी थी वह।

उसने देखा-

वह खिलौना हाथ में लिए खेल रही थी कि तभी उससे दो – तीन माह बड़ा बच्चा आया व खिलौना छीन कर ले गया। पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

मैम ने दूसरा खिलौना दे दिया, वह भी वही बच्चा फिर छीन कर ले गया, उसने फिर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

यही क्रम तिबारा दोहराया गया।

चौथी बार जब वह खिलौना छीनने आया तो बच्ची ने कस कर मुठ्ठी भींचकर, हाथों को कड़ाकर ज़ोर से  हूंहूं……..हूंहूं …किया तो वह बालक डर के खिलौना छोड़ कर भाग गया फिर दोबारा तंग करने नहीं आया।

यह देखकर पारुल के चेहरे पर आश्वस्ति के साथ मुस्कुराहट तैर गई।

  1. खरीदी हुई औरत

रशीद की पत्नि मीना की हालत बिगड़ती जा रही थी। घर पर बच्चा होने के बाद, रक्तस्त्राव नहीं रुक रहा था। अस्पताल लाने पर, डॉक्टर भी आखिरी इलाज के तौर पर ऑपरेशन की हिदायत दे चुके थे।

घर के लोग व अन्य सगे संबंधियों की भीड़ इकठ्ठी हो चुकी थी। सब अपनी-अपनी राय दे रहे थे।

“भई सोच समझ लो, भोत पैसा खरच होगा।” – चचा ने चिंता  जताई।

“इसका हाथ तो वैसेई तंग रहवे है, कां से करेगा इंतज़ाम?” – चाची बोली।

” जे ऑपरेसन  के बाद भी ठीक ना होई तो?” पीछे से आवाज़ आई।

“खून के इंतजाम  को भी तो कह्या है दाग्दर साब ने, हम तो खुदई हारे-माड़े हैं , अपना खून तो दे ना पावेंगे। वो भी बज़ार से ही खरीदना पड़ेगा, तीन साल पेले तो खरीद कर लायाई था इस बहु को,  तब भी पैसा खरच होया था” बुआ ने याद दिलाया।

“पता होत्ता कि बात इत्ती बिगड़ जावेगी, तो पेल्लेई ना दिखा लेत्ता डोंक्टर को”- सिर पकड़कर बैठे पति ने कहा।

“दवा में भी भोत लगेगा, किस-किस के आग्गे हाथ फैलावेगा, निरी कमजोर तो वैसेई है यो, सारी उमर दवा ही खिलाता रहवेगा” जीजा ने प्रश्न किया।

कहीं खून न देना पड जाए  या कहीं  पैसे ही न मांग ले इस डर से एकत्रित भीड़ धीरे-धीरे खिसकने लगी।

“छोड़ परे कू, जित्ते पैसे इस पर लगावेगा , उत्ते में तो नई बीवी आ जावेगी ।” छोटे भाई ने बेबाक सलाह दे ही डाली।

बुत बनी अब तक चुप मां ने एक नज़र सलाहकारों पर डाली व अगले ही पल उसके बच्चों की ओर देख कर अचानक फट पड़ी—“ पैसा… पैसा… पैसा…क्या लगा रख्खा है  यो ? तेरे पैसे बीवी दिला सकते होवेंगे पर मां किसी बज़ार में ना मिलती ………….।”

 

  1. अपेक्षा

“रीमा, तुमने नीलेश को फोन कर दिया था न तत्काल में रिज़र्वेशन कराने के लिए?” सुमित ने नाश्ते की प्लेट अपनी ओर सरकाते हुए पूछा।
“जी, उसी के फोन का इंतज़ार कर रही हूं। रिज़र्वेशन मिल जाए तो अच्छा है, आशा मेरे बचपन की सहेली है, उसके बेटे की शादी में जाने का बहुत मन है मेरा , उसने भी बहुत ज़ोर देकर आग्रह किया था।” चाय का सिप भरते हुए रीमा ने कहा।
ट्रीन ट्रीन कर फोन बज उठा। बड़े उत्साह से रीमा ने फोन उठाया , हां बेटा , क्या रहा रिज़र्वेशन का?”
” सॉरी मां, नहीं मिल पाया।”
“ठीक है बेटा, कोई बात नहीं। कोई जाना ऐसा जरूरी भी नहीं था।” कहकर उसने फोन काट दिया।
पर सुमित से उसके मनोभाव छिप न सके। मुंह नीचे करके वह नाश्ता करने लगी।
” ट्रेन में नहीं मिला टिकट तो प्लेन से कराने को कह देतीं।”
” नहीं , क्यों कहती ?”
“आखिर बेटा है हमारा वह। हमारा अधिकार है उस पर।”
“तो , उसका भी तो फर्ज़ बनता था, वह भी तो कह सकता था न !” कहते हुए रीमा की आवाज़ भर्रा गई।
“लाओ फोन दो मैं ही कह देता हूं।” उसे सुबकते हुए देखकर सुमित से रहा नहीं गया।
” नहीं कसम है मेरी आपको , आप भी नहीं कहेंगे कुछ” रीमा रुंआसी-सी लगभग फोन उठा कर पटकने को ही थी कि फोन फिर घनघना उठा।
“मां , मैंने आपका प्लेन का टिकट करा दिया है, आप प्रिन्ट आउट निकाल लेना और ध्यान से जाना।” उधर से आवाज़ आई।
आंखों में आंसू व होठों पर मुस्कान का मिलन देख सुमित ने मुस्कुराते हुए मिठाई उसकी ओर बढ़ा दी।

  1. हॉकर

 

रोज़ की तरह आज भी वह सुबह चार बजे उठ गया, उसे अखबार बांटने जो जाना था।

“उठ मुन्ना की मां, इसकी दवा का भी टैम हो गया है। डॉक्टर ने हर चार घंटे में पिलाने को कहा था न” रशीद ने आंखें मलते हुए  सायरा को भी उठाया।

“हां,   मैं तो सोई ही कां थी, बस अभी ज़रा देर के लिए झपकी लग गी थी। ” आंखें मलते हुए उठ बैठी सायरा। ” देखियो ,  सरीर तो ठंडा बर्फ-सा  है,  बुखार उतर गया सा लगे है। पर कुछ हरकत क्यों ना दिख री?  ” उसने हड़बड़ाकर मुन्ना को टटोला  और अनहोनी की आशंका से घबरा गई।

बड़ा बल्ब जलाकर रशीद ने बच्चे को ध्यान से देखा तो सन्न रह गया व फिर पत्नी की ओर देखकर सुबक पड़ा, “मु…न्ना… तो गया…. सायरा ।”

“ऐसे… कैसे…, तनक  ठीक से देख्खो, मुन्ना के अ..अ..अब्बू!” उसने रशीद को लगभग झिंझोड़ते हुए कहा। और फिर  बदहवास सी  मुन्ने को छाती से चिपटाकर  रोने लगी।

रशीद ने अपने आप को संभाला व सायरा के मुंह पर हाथ रखकर नम आंखों से न रोने का इशारा किया।

“कैसे… संभा…ल्लूं मैं अपने… को?  इतना सखत दिल ना  है मेरा” उसने मुंह से रशीद का हाथ हटाते हुए कहा, व बुक्का मारकर रोने को हुई कि फिर रशीद ने उसे रोका, ” जानूं हूं,  इतना भी असान ना है,  देख, मैं भी बाप हूं इसका, इन बाकी तीन बालकों  के बारे में भी सोच।  खुदा के लिए मेरी बात मान ले, बस, थोड़ी देर काबू रख ले खुद पै, बस मैं फटाफट अखबार बांट आऊं… तब… । एक भी दिन के नागे का मतलब जाने है न तू?

 

  1. चाल

 

“राम राम जी बाऊजी”

“राम राम भई, रामप्रसाद! आज सुबा-सुबा कैसे?  सब खैरियत तो है ?  बाल्लक-उल्लक तो ठीक हैं ?” हलक में भरे पानी को गुड़गुड़ाकर पिचकारी मार कर बाऊजी ने पूछा।

” यो बालादत्त्त ठीक रहेन देगा तब न ।”

” क्या कर दिया बालादत्त ने?”  बाऊजी ने मूढा सरकाकर उस पर पसरते हुए पूछा।

” अजी वोई, दीवार का मसला , आज तो दिन निकले ई तू-तू, मैं-मैं करन लगा।”

“तुम आपस में बात करके ना सुलझा सकते हो मामला।” झगड़े की गहराई तोलते हुए बाऊजी ने जानना चाहा।

“ना जी, अब तो मैं परसान हो गया हूं रोज-रोज की किच-किच से।” रामप्रसाद ने दुखी मन से कहा।

“तो एक काम कर, थाने चला जा, वो ई अकल ठिकाने लगावेंगे उसकी।”

” चला जाऊं…? पर थानेदार लिख लेगा ना रपट?”

“हां, हां,  मेरा नाम ले दियो, हो जागा तेरा काम ।”

गांव में किसी को कोई समस्या होती या आपस में झगड़ा होता तो सलाह लेने बाऊजी के दर पर पहुंचता हर कोई। बाऊजी का असली नाम था रघुनन्दन चौधरी। एक कत्ल की सज़ा अधूरी ही भुगत कर वापस शान से लौट आए थे। अधूरी इसलिए  क्योंकि देश की आज़ादी की पचासवीं वर्षगांठ की खुशी में कई कैदियों की सज़ा माफ कर दी गई थी।

” राम-राम बाऊजी।” रामप्रसाद के जाते ही बालादत्त ने प्रवेश किया।

” क्या बात, आज खेत पर ना गया?” बाऊजी ने अनजान बनते हुए पूछा।

“दिमाग चल गया है मेरा तो इस रामपरसाद की हरकतों से, रोज-रोज झगड़ा लेकर बैठ जावै है दीवार का। क्या करूं आप ही सलाह दो। ”

” एक काम कर , थाने चला जा, रामप्रसाद भी ना माना, थाने गया है, जो पहले पहुंचेगा उसका केस भारी रहेगा।”

दोनों को लाईन से लगा कर बाऊजी ने फोन उठाया, “हेलो  इंसपेक्टर, दो मुर्गे भेजे हैं अभी-अभी।”

  1. रिश्ते

दौड़ते-भागते, हांफते हुए वो तीनों मॉल में स्थित पिक्चर हॉल में पहुंचे, फिल्म शुरू हो चुकी थी। उधर वो फिल्म देखने में मशगूल थे इधर ये हमेशा की तरह बाहर आने को कुलबुलाने लगे। एक दूसरे को कोहनी मारकर पीछे ठेलते हुए लाईन में सबसे आगे खड़े रहने की जुगत में लगे थे। जब–जब वो कहीं बाहर घूमने जाते इनका यही हाल होता। फिर आज तो पत्नी व बेटी भी साथ में थीं। पहले मैं, पहले मैं करते उचक-उचक कर बाहर आने को आतुर थे सब।

“तू क्यों कूद रहा है, पड़ा रह चुपचाप।” पर्स की शोभा बढ़ा रहे ढेरों प्लास्टिक कार्ड्स के बीच दबा दो सौ का नोट यह सुनकर उदास हो गया। कार्ड्स अकसर उसका मज़ाक उड़ा दिया करते थे, “तू पड़ा रह ऐसे ही, अब कोई नहीं पूछेगा तुझे।” वो मन मसोस कर रह जाता।

“अब कैशलैस का ज़माना है, नकदी का कोई काम नहीं रहा और यहां बड़े शहर में तो बिलकुल भी नहीं।” डेबिट कार्ड ने मुस्कुराकर क्रेडिट कार्ड से हाथ मिलाया।

“तुम सब कुछ भी कहो, नकद का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।” दो सौ के नोट ने गरदन उठाने की कोशिश की।

“हमने तो नहीं देखा, तू कितने महीने से पड़ा है यहां बेकार सा। एक भी पेमेंट किया इस पर्स के मालिक ने नकद? नहीं न! देख ले, हाथ कंगन को आरसी क्या!” डेबिट कार्ड ने उसके सिर पर हथेली रख नीचे दबा दिया।

“न किया हो, पर इससे मेरी अहमियत कम तो नहीं हो जाती न! तुम तो वैसे भी मशीनों के गुलाम हो और मैं एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले में माहिर हूं।” नोट ने फिर सिर उठाने की कोशिश की।

“कीमत होती है उपयोग करने से, समझा न! अब चुप होकर बैठ जा, इसी में भलाई है।” क्रेडिट कार्ड ने घुड़की दी। नोट की आंखें भर आईं।

बहस बढ़ने के लिए ही होती है सो बढ़ती रही। कोई हार मानने को तैयार नहीं था।

तभी फिल्म में इंटर्वल हुआ। इधर इनकी बांछें खिल गईं।

वो बच्ची को लेकर फूड कोर्ट पहुंचा। इनमें आपस में धक्कामुक्की शुरू हो गई।

उसने बच्ची से पूछा, “क्या लेगी मेरी बिटिया?”

बच्ची ने हमेशा की तरह उंगली से पॉपकॉर्न की ओर इशारा किया। उसने एक पॉपकॉर्न बकेट और अपने लिए एक थम्स अप का ऑर्डर दिया। और फिर पेमेंट करने के लिए उसने क्रेडिट कार्ड आगे बढ़ाया।

“सर, आज तो मशीन खराब है, कार्ड नहीं चलेगा।” दुकानदार ने असमर्थता जताई।

मायूस हो उसने मॉल में सामने ही बने एटीएम का रुख किया। वहां भी मशीन खराब है का बोर्ड देखकर वह परेशान सा हो गया। बेसमेंट के एटीएम तक का चक्कर लगा आया पर काम नहीं बना। ‘ सारे एटीएम आज ही खराब होने थे! गलती भी मेरी ही है, चलते समय रमा ने तो कहा था एटीएम से पैसे निकाल लो पर जल्दी के कारण नहीं निकाल पाया। कार्ड के भरोसे था मैं, ज़रूरत पड़ी तो मॉल के एटीएम से निकाल लेंगे सोचकर निश्चिंत भी था।’ वो बड़बड़ाने लगा।

अब करे तो क्या करे। उसने सब तरफ से हारकर बिटिया से कहा, “बेटा, आज रहने देते हैं, अगली बार दिला देंगे।”

“ऊं…ऊं…ऊं” बेटी पांव पटककर ठुनकने लगी।

मजबूरन उसने कोल्ड्रिन्क वापस कर केवल पॉपकॉर्न बकेट खरीद लिया। जेब में कुम्हला रहा दो सौ का नोट सबको अंगूठा दिखाता और मुंह चिढ़ाता हुआ उन्हें कोहनी मारकर बाहर निकल आया।

अब उसका पर्स कार्ड के साथ नकदी से भी भरा रहने लगा।

 

 

 

 परिचय

 

नामः                            डॉ.(श्रीमती) नीरज शर्मा

साहित्यिक नामः           डॉ. नीरज सुधांशु

जन्मः                             17 सितंबर 1961, लखनऊ

शिक्षाः                          बी.ए.एम.एस (गुजरात आयु.युनि.जामनगर), डिप्लोमा इन                                    एक्स्पोर्ट मेनेजमेंट (मेडिसिनल एन्ड एरोमेटिक                                                     प्लान्ट्स) पी.जी.डिप्लोमा इन जर्नलिज़्म एंड मास कॉम्युनिकेशन्स

व्यवसायः                    35- वर्षों से चिकित्साकार्य (प्रसूति एवं स्त्री रोग)

निदेशक– वनिका पब्लिकेशन्स ( पुस्तक प्रकाशन का कार्य)

लेखन विधाएः                कविता, गीत, दोहे, ग़ज़ल, लघुकथा, कहानी,                                                              निबन्ध, व्यंग्य, मेडिकल  लेखन

प्रकाशित कृतियाः     ‘आँसू लावनी‘- ताटंक छंद पर आधारित  -111  सचित्र                                                   मुक्तक।

                                  * निःशब्द नहीं मैं- लघुकथा संग्रह

विभिन्न राष्ट्रीय पत्रों ( नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका, नवभारत टाईम्स, पंजाब केसरी, टाईम्स ऑफ इंडिया, साहित्य अमृत, विश्वगाथा, अट्टहास, अविराम साहित्यिकि इत्यादि)  व अनेक  क्षेत्रीय पत्र -पत्रिकाओं में अनेक बार  कविता, व्यंग्य, लघुकथा, लेख, निबंध , गीत, ग़ज़ल, स्वास्थ्य संबंधित आलेख इत्यादि का अनेक वर्षों से  प्रकाशन।

कई लघुकथाओं का पंजाबी व गुजराती में अनुवाद

40 -से अधिक संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन।

व्यंग्य संग्रह (आदमी कहीं का),  एवं एक कविता संग्रह                      प्रकाशनाधीन

संपादित कृतियाः         ललित काव्य (कविताएँ), बूँद-बूँद सागर, अपने-अपने क्षितिज, सफर संवेदनाओं का, स्वाभिमान, लघुकथा में किसान (लघुकथा-संग्रह), व्यंग्य बत्तीसी, व्यंग्य के पांच स्वर, व्यंग्यकारों का बचपन (व्यंग्य संकलन), चंद कदम, कितने गुलमोहर , कहानी है कि खत्म नहीं होती, खुसरो दरिया प्रेम का, मृगतृष्णा, गूंगे नहीं शब्द हमारे, अंधेरे में उजास (कहानी संकलन), बाल कहानियां

प्रसारणः                       आकाशवाणी नजीबाबाद से नियमित रूप से  महिला जगत एवं स्वास्थ्य चर्चा कार्यक्रमों में वार्ताओं का प्रसारण।

सम्मानः                                  अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, चाँदपुर द्वारा ‘साहित्यश्री‘ सम्मान,

जैमिनी अकादमी पानीपत द्वारा ‘रामवृक्ष बेनीपुरी जन्मशताब्दि सम्मान‘

बज़्मेसईद झाबुआ (म.प्र) द्वारा ‘शाईरेवतन‘ सम्मान

स्व.श्री हरि ठाकुर स्मृति  सम्मान।

साहित्यश्री-भारतेंदु समिति कोटा द्वारा

अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच पटना द्वारा ‘लघुकथा मंच सम्मान’

आचार्य रत्नलाल विद्यानुग स्मृति अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता सम्मान-2017

नारी अभिव्यक्ति मंच द्वारा-शोभा कुक्कल स्मृति सम्मान- 2019

हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच द्वारा लघुकथा सेवी सम्मान- 2019

ब्राह्मण अंतर्राष्ट्रीय समाचार द्वारा स्व. महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान- 2020

विश्व मैत्री मंच द्वारा सम्मानित- 2019

सदस्यः                                  १. रेड क्रॉस सोसायटी (सदस्य-आजीवन)

२. आकांक्षा परामर्श दात्री समिति- बिजनौर

३. नीमा वुमन फोरम- सेक्रेटरी उत्तर प्रदेश  (नेशनल इंटिग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन)

४. नेशनल इंटिग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन –नीमा (सदस्य आजीवन)

५. जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति “दिशा”  (बिजनौर) जिलाधिकारी द्वारा नामित पूर्व सदस्य

संपर्कः                          सरल कुटीर , आर्य नगर, नई बस्ती, बिजनौर-246701

दूरभाषः                                   मो-09837244343

ई मेलः                                  drniraj.s.sharma@gmail.com

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