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 मीडिया में सरकार की घुसपैठ का खेल

मीडिया मिरर
डॉ प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

एडिटर अटैक-डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

आजकल फेसबुक इंडिया की एक बड़ी अधिकारी सुर्खियों में हैं। नाम है अंखी दास। श्रीमती दास पर आरोप हैं कि उन्होंने फेसबुक के नियमों को हाशिए पर रखकर भाजपा नेताओं की हेट स्पीच यानी नफरत भरी पोस्ट या बयान चलने दिए। ये खुलासा चूंकि अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में हुआ तो देशभर में हो हल्ला मच गया। विपक्षी पार्टियों ने भी इस मुद्दे को काफी उछाला। और अंततः बहस चालू हो गई कि अंखी दास भाजपा की करीबी हैं। दास और भाजपा के संबंधों को जानने के लिए अतीत टटोला जाना लगा। जिसमें पाया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेबसाइट से जुड़ा एक नमो एप है। अंखी दास उस एप की कन्ट्रीब्यूटर लेखक हैं। हालांकि उस एप पर अभी भी अंखी दास का आलेख मौजूद है जिसमें वो प्रधानमंत्री, भाजपा और फेसबुक के अंतरसंबंधों  यानी की बतौर फेसबुक उपभोक्ता प्रधानमंत्री और भाजपा एडमिन की चर्चा करती हैं।

इसी बीच बहस में ये मुद्दा उठा कि नरेंद्र मोदी का फेसबुक पेज देखने वाले इस समय व्हाट्सएप इंडिया के प्रमुख हैं। ये साब कभी नरेंद्र मोदी का फेसबुक पेज मैनेज करते थे। तो ऐसे चर्चा चल निकली की सरकार की प्रत्यक्ष या परोक्ष कितनी घुसपैठ होती है मीडिया में। दखल तो हम हमेशा से सुनते रहे हैं कि सरकारें मीडिया संस्थानों को अपने इशारों पर नचाती हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी सरीखे पत्रकारों ने तो खुले मंच में ये स्वीकारा कि देश के बड़े बड़े न्यूज चैनलों को प्रधानमंत्री कार्य़ालय से ऑपरेट किया जाता है। खबर कैसे और किस लहजे में जाएगी सब पीएमओ तय करता है। और मीडिया संस्थान ऐसा करने के लिए बाध्य भी हैं। लेकिन सरकार के लोगों की घुसपैठ मीडिया में कितनी औऱ किस तरह है। ये बातें सामने कम आती हैं। लेकिन ऐसा होता है औऱ होता आया है कि सरकारें अपने लोगों को मीडिया संस्थानों में शामिल कराती हैं, जो पत्रकार के रूप में परोक्ष रूप से सरकार के एजेंट ही होते हैं। मजे की बात ये है कि ज्यादातर मामलों में तो अब मीडिया संस्थानों के मालिक व सम्पादक ऐसे एजेंटों को जानते हैं कि ये फलां पार्टी का एजेंट है लेकिन उनसे ये काम लेते रहते हैं और वो भी बड़ी खुशी से, क्योंकि ये पत्रकार रूपी एजेंट सरकार व मीडिया संस्थान के मालिकों के बीच पुल का काम करते हैं। ये पुल मालिकों की सरकारी रसूख संबधी निजी जरूरतों से लेकर मीडिया संस्थानों के लिए रीढ़ विज्ञापनों (विज्ञापन जो सरकार जारी करती है) का प्रमुख जरिया बन बैठे हैं। तो एजेंटों की भारी मांग है मीडिया संस्थानों में। हालांकि मैं दिल्ली की पत्रकारिता औऱ वर्तमान समय की बात कर रहा हूं, लेकिन ऐसा शुरू से होता आय़ा है। शायद कुछ लोगों को आश्चर्य हो जो नए लोग हैं पत्रकारिता में लेकिन मैं बता दूं कि विधायक और सांसद छोड़िए। प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, जस्टिस, बड़े बड़े प्रशासनिक औऱ पुलिस अधिकारियों की सिफारिशों पर भी अखबारों औऱ चैनलों में पत्रकारों की नियुक्ति होती आई है। बहुत संभव है कि आपके संपादक महोदय ने किसी केंन्द्रीय मंत्री से सिफारिश लगवाई हो मालिक के पास और वो इस गद्दी तक पहुंचे हों। पद के हिसाब से सिफारिश। नेशनल एडीटर, ग्रुप एडीटर, स्टेट एडीटर स्तर पर प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्री की सिफारिश अगर चली हो लाला जी के पास, तो कतई आश्चर्य़ न करें। वैसे भी एक दौर में कहा जाता था कि भारत में प्रधानमंत्री के बाद दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है टाइम्स ऑफ इंडिया का मालिक। इसलिए मीडिया संस्थानों के मालिकों के पास प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रियों की सिफारिशें कोई बड़ी बात नहीं। तो आप यहां आश्चर्य़ न करें कि अगर किसी बड़े मीडिया समूह में कोई नेशनल एडीटर बना है तो वो अपने बलबूते रिज्यूमे बढ़ाकर बना होगा। नो। बिल्कुल नहीं। और इस पर भी आश्चर्य न करें कि एक सम्पादक के लिए प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्री सिफारिश करेगा। बिल्कुल करेगा औऱ की हैं। एक मर्यादा और सीमाएं हैं एक सार्वजनिक स्तम्भ की। लेकिन मुझे पता है ये सच है। तमाम पूर्व प्रधानमंत्रियों ने, तत्कालीन प्रधानमंत्रियों ने अपनी पसंदीदा या दूसरी भाषा में कहें चापलूस, चमचे पत्रकारों को मीडिया संस्थानों में नौकरी दिलवाई। ये सब बातें जगजाहिर हैं भाई। वहीं रीजनल लेबल की बात करें तो मैं गवाह हूं मेरे कार्यालय में ही स्थानीय सांसद की सिफारिश से एक सब एडीटर की नियुक्ति हुई थी आज से दस साल पहले। अरे दादा, हालिया केंद्र सरकार के एक थुलथुले महाराष्ट्री मंत्री की सिफारिश तो मात्र एक लड़की को प्रशिक्षु में रखने के लिए आई थी, दिल्ली के एक बड़े अखबार में पिछले वर्ष। ये सब आम बातें हैं। एक घटना का जिक्र करते हैं फिर बात खत्म करेंगे।

तकरीबन दो वर्ष पहले राज्य सरकार कवर करने वाले एक पत्रकार को नौकरी बदलनी थी, उसने राज्य सरकार के किसी बड़े आदमी से सिफारिश लगवाई और अपने पसंदीदा संस्थान में ज्यादा पैसे और अच्छे ओहदे पर पहुंच गया। ऐसी जानकारी मिली कि सरकार के उस बड़े आदमी ने फोन करके प्रबंधन को कहा कि देख लेना अपना आदमी है। अब जो सरकार करोड़ों के विज्ञापन दे रही है और सरकार तो है ही, ऐसे में उसके आदमी को न रखने की हिम्मत कैसी। तो ये सब ऐसे खेल चल रहा है। सब खुला खेल फरुख्खाबादी है। जिस स्तर का जो पत्रकार है उसके उस स्तर पर संबंध होते हैं। जो दिल्ली में बैठा संपादक है उसे केंद्रीय मंत्री, जो स्टेट राजधानी के एडीटर हैं उन्हें मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि मित्रवत जानते हैं। तो ये अपनी नियुक्तियों में उनका लाभ लेते हैं। क्योंकि नेताओं के संबंध मीडिया मालिकों से हमेशा से रहते हैं। आपको क्या लगता है कि राजनाथ सिंह किसी भी मीडिया मालिक को फोन करें और कहें कि ये अपना आदमी है देख लीजिए कहीं सम्पादक लेबल पर। क्या मजाल है कि मालिक बाबू जी की बात काट जाए। लुटियन्स में राजनाथ बाबू जी के नाम से लोकप्रिय हैं। अटल जी, चंद्रशेखर, गुजराल साब ने खूब नियुक्तियां करवाई हैं। बीपी सिंह के भी काफी अच्छे संबंध थे मीडिया मालिकों से। खासतौर पर अरुण पुरी से। दिल्ली में बड़े संस्थानों के जो पॉलिटिकल एडीटर हैं वो काफी शक्तिशाली माने जाते हैं, संपादक से भी ज्यादा। वो भी अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार या किसी राजनीतिक दल के एजेंट की भूमिका में ही होते हैं। औऱ वो सरकार, राजनैतिक दल व मालिकों के बीच खुलेआम मध्यस्थता करते हैं। दुनिया गवाह है।

तो कहानी बस इतनी है कि सरकार व राजनीतिक दलों या यहां तक कहें कि बड़े बड़े नेताओं के एजेंट हर अखबार व संस्थान में मौजूद रहते हैं। बकायदे उनकी नियुक्तियां करवाई जाती हैं। सम्पादक और मालिक सब जानते हैं। इसलिए अगर व्हाट्स एप इंडिया का प्रमुख बीजेपी आदमी को बनवाया गया है तो ब़ड़ी सामान्य बात है। अरे भाई भारत के किसी भी शासकीय संस्थान में, विश्वविद्यालयों को ले लीजिए, कुलपतियों की सूची देख लीजिए। सभी सिफारिशी लोग हैं। एक सिंगल कुलपति ऐसा नहीं है जो किसी नेता, मंत्री, सांसद, सरकार या पार्टी का एजेंट न हो। उस कुलपति का इतिहास देख लीजिए। फिलहाल खाकी निक्कर कुलपति पद की प्रथम व प्रारम्भिक योग्यता घोषित ही है। बड़े बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी किसी एक नेता को पकड़ के चलते हैं। अप्रत्यक्ष तौर पर किसी दल के साथ जुड़े होते हैं। तो सरकार के लोगों की घुसपैठ हर जगह है।

तो भैय्या किसी मंत्री को पकड़िए, उसको जमके छापिए, अगर जनसंपर्क में वो सौ से मिला तो पांच सौ लिखिए औऱ पांच सौ मिला तो पन्द्रह सौ और उसके पीए को तत्काल खबर का लिंक भेजिए। माहौल बनाते चलिए। कृपा एक दिन जरूर बरसेगी।  कहीं पत्रकारिता के प्रोफेसर, कुलपति या मीडिया संस्थान में ही कृपा से बड़े पद पर पहुंच जाएंगे। या कालांतर में सूचना आय़ुक्त या पार्टी से टिकट या राज्यसभा में भी भेजा जा सकता है। राज्यसभा से लेकर, कुलपति या सूचना आयुक्त या अन्य बड़े बड़े पदों पर बैठे जो पत्रकार साथी हैं ये गणेशशंकर विद्यार्थी बनकर यहां तक नहीं पहुंचे। कलम बेची है। कलम…..

जय हो।

( एडिटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है, शिकवा, शिकायत, सुझाव हो तो संपर्क करें mediamirror.in@gmail.com)

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