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इज्जत के नाम पर

मुख़्तार माई
किताब चर्चा: इज्जत के नाम पर लेखक: मुख़्तार माई अनुवादक: नीलाभ अश्क

किताब चर्चा: इज्जत के नाम पर
लेखक: मुख़्तार माई
अनुवादक: नीलाभ अश्क

कबीर संजय बता रहे किताब के बारे में:-
इज्जत के नाम पर। यह किताब आज ही खतम की है। पूरे समाज ने औरतों के साथ कैसी साजिशें रच रखी हैं। कैसे उन्हें बचपन से ही सवाल नहीं करने और जो कुछ हो रहा है, उसे बस स्वीकार कर लेने की ट्रेनिंग दी जाती है। सब कुछ बस बरदाश्त कर लो।
कई बार तो यह भी लगेगा कि जैसे यह कोई दो अलग-अलग नसलों का मामला हो। जहां पर एक नसल, दूसरी को अपनी मनमर्जी से इस्तेमाल करती है। जाहिर है, इस्तेमाल करने वाले के ही अधिकार होते हैं। इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु का कोई अधिकार नहीं होता। उसे तो बस बरदाश्त करना होता है। कोई जुल्म भी हो तो बस उसे अपने शरीर पर झेल लो। उफ न करो।
लेकिन, जब कोई उसका विरोध करने के लिए खड़ा हो जाता है। जब कोई उसका बदला लेने पर उतारू हो जाता है, तब वह मुख्तार माई बन जाता है। पाकिस्तान की इस महिला के संघर्ष की कहानी हमारे देश की लाखों औरतों से मिलती-जुलती है। इज्जत के नाम पर हमारे यहां भी कम खूनी कार्रवाइयां अंजाम नहीं दी जाती। किताब से एक और बात पर अचानक ही ध्यान गया कि आखिर इन खाप-पंचायतों में औरतों को जगह क्यों नहीं दी जाती। वे भी तो बुजुर्ग होती हैं।
इसका जवाब भी इसी किताब से मिला। क्योंकि खाप-पंचायतें औरतों और नीची जाति वालों को दबाने के लिए ही बनी हुई हैं। इसके लिए वे परंपरा का इस्तेमाल करती हैं। खैर, अच्छी किताब है। किताबों के प्रेमी हैं तो पढ़ डालिए।
(मैंने हिंदी में पढ़ी है। नीलाभ जी ने बहुत ही अच्छा अनुवाद किया है। हिंदी अनुवाद का कवर पेज नहीं मिलने के चलते अंग्रेजी वाला कवर लगा रहा हूं)

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