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“कंगना” बीजेपी पहन पाएगी?

कंगना रानाउत

त्वरित टिप्पणीः डॉ प्रशांत राजावत

कंगना रनौत आजकल अभिनय से ज्यादा अपने बयानों के चलते सुर्खियों में रहती हैं। इसका मतलब है कि अभिनय पर अब उनका नया औतार हावी है। उनकी पिछली कुछ फिल्में भी चर्चित नहीं रहीं। जिनमें पंगा, जजमेंटल है क्या आदि रहीं।  उनके अभिनय की सुर्खियां नहीं बनतीं अब, उनके विवाद मीडिया में छाए रहते हैं।

कंगना रनौत। कौन। हिमाचल की एक छोटे से जगह की खूबसूरत पहाड़ी लड़की, जिसके सपनों का हीरो ह्रितिक था और सपना बॉलीवुड में जगह बनाना। उन्होंने दोनों को ही पाया और शिद्दत से। लेकिन दोनों से ही उन्होंने बगावत भी खूब की। ह्रितिक को जीभर के प्यार किया तो खुले आम देश दुनिया के सामने जलील किया। वो बातें जो सिर्फ दो प्रेम करने वाले लोगों के बीच थीं, दुनिया ने उनको चटखारे लेकर सुना। जिस बॉलीवुड के दम पर उन्हें जाना पहचाना जाता है उस बॉलीवुड को उन्होंने हर कदम पर चुनौती दी, भाई भतीजावाद से लेकर न जाने क्या क्या कहा। स्टार किड्स हों या स्टार कंगना ने सरेराह, सरेआम किसी को नहीं छोड़ा। जबकि दुनिया गवाह है कि किसी को फिल्म में काम सिफारिश से मिल सकता है लेकिन अभिनय किसी में पैदा करने का काम कोई सिफारिश नहीं करती, वो नितांत निजी प्रतिभा है। वरना तमाम दिग्गज अभिनेताओं व अभिनेत्रियों के पुत्र इंडस्ट्री छोड़ न चुके होते। हेमा मालिनी की बेटियां, राजेंद्र कुमार का बेटा, राजकुमार का बेटा, शहंशाहों के शहंशाह अमिताभ बच्चन के सुपुत्र, मिथुन चक्रवर्ती के बेटे, सन्नी देओल के बेटे.. कहां हैं ये सब। बाकायदा सबकों लांच किया गया। सब दिग्गज अभिनेताओं के बेटे बेटियां हैं। लेकिन अभिनय नैसर्गिक गुण है, इसमें सिफारिश की बहुत बड़ी भूमिका नहीं रही कभी। जो स्टार किड्स सफल हैं ऐसा नहीं है कि उनमें अभिनय नहीं है। यहां काम सिफारिश से मिल सकता है लेकिन अभिनय की मार्किंग की बटन जनता के हाथ है। लेकिन कंगना ने बॉलीवुड को लगातार घेरा। फिल्मों औऱ अभिनेताओं का नाम लेकर लानत मलानत की।

एक समय संजीदा अभिनेत्री की टैग वाली कंगना अब ज्यादातर लोगों के बीच बड़बोली के तौर पर भी प्रसिद्ध हैं। उनका बड़बोलापन इस कदर बढ़ा की उनका अभिनय हाशिए पर चला गया। किसी भी अभिनय करने वाले के लिए और उसके प्रशंसकों के लिए ये ठीक बात नहीं। कहा जाता है जिस आदित्य पंचोली ने कंगना को शुरुआती मदद दी, अपने घर में पनाह दी, कंगना ने उन पर ही शोषण के आरोप लगाए। हालांकि वो आरोप साबित आजतक नहीं हो सके। ह्रितिक रोशन पर लगाए आरोप भी अभीतक साबित नहीं हो सके। उनके ब्वाय फ्रेंड रहे अध्ययन सुमन भी उनके न रहे, उन पर भी कंगना ने चढ़ाई की। फिलहाल हो अकेली हैं।

जिस मीडिया ने कंगना को रौशनी दी, उस मीडिया को कंगना ने भाड़, कुछ निर्माता निर्देशकों का दलाल, रैकेटबाज बताया। हश्र ये हुआ कि कंगना का बॉयकॉट करना पड़ा था मीडिया को। मनिकर्णिका फिल्म बनाई तो डॉयरेक्टर होते हुए भी डॉयरेक्शन खुद देतीं, उसकी एक न सुनतीं। लोगों के रोल बढ़वाने और कटवाने का भी उनपर आरोप लगा।  मामला बहुत उछला था। उनके साथ काम करने में शायद ही बॉलीवुड का कोई नामी निर्माता निर्देशक, अभिनेता अब सहज हो। कंगना ने सबकुछ इतना जल्दी कर दिया कि उनहोंने एक तरह से अपने अभिनय चक्र को सीमित कर दिया।

जैसा कि लगातार उनके बयानों के रुझान से और लोगों के अनुमान से आशंका जताई जा रही है कि कंगना भाजपा में शामिल हो सकती हैं और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ सकती हैं। दोनों ही बातें हो सकती हैं औऱ दोनों ही बातें बहुत सामान्य हैं। राजनीतिक पार्टिंयां हमेशा से ही फिल्म कलाकारों को लेकर उतावली रहती हैं क्योंकि उन्हें मुफ्त का एक स्टार प्रचारक मिल जाता है और भारत में फिल्म कलाकारों को लेकर एक क्रेज है ही, जिसका लाभ उन्हें एक पक्की सीट के तौर पर मिल जाता है। जैसा मैंने कहा कि कंगना का भाजपा में शामिल होना या चुनाव लड़ना औऱ जीतना भी बड़ी सामान्य बातें हैं,, लेकिन जो असामान्य बात है वो है एक शानदार अभिनेत्री का खत्म हो जाना। कंगना में बहुत अभिनय शेष है। देश के सिनेमा जगत को बहुत कुछ उनसे मिलना शेष है। या कहे उनका सर्वश्रेष्ठ अभी मिलना शेष है। लेकिन कंगना अगर किसी दल में शामिल होती हैं तो हम उनके अभिनय से दूर हो जाएंगे।

आमतौर पर फिल्म कलाकार अपने अभिनय के अंतिम चरण में राजनीति में कदम रखते हैं। कंगना का अभी इतना करियर नही हुआ है। वो जल्दबाजी में हैं। राजनीति तो आप कभी भी कर सकते हैं। लेकिन अभिनय की लय टूटना एक दुर्घटना है। राजनीति में फिल्म कलाकारों का जाना कोई नई बात नहीं है लेकिन राजनीति में उनकी सफलता के बहुत उदाहरण नहीं हैं। अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, संजय दत्त, जया प्रदा, नगमा, गोविंदा, धर्मेंद्र आदि दिग्गज कलाकार सक्रिय राजनीति में आए। कई तो चुनाव लड़े औऱ जीते भी। लेकिन राजनीति रास नहीं आई औऱ वापस बॉलीवुड लौट गए। हाल ही में गुरुदासपुर पंजाब से जीते सन्नी देओल के भी यही हाल हैं। उनको भी राजनीति रास नहीं आई। उन्होंने तो शपथ पत्र देकर अपना पूरा कामकाज एक अन्य व्यक्ति को सौंप दिया है। बहुत संभव है वो अगला चुनाव न लड़ें। कभी गोविंदा ने कद्दावर नेता रामनायक को हराया था, लेकिन पांच साल होते होते राजनीति से मन भर गया। धर्मेद्र ने भी बीकानेर से सांसद बनने के बाद कहा था राजनीति उनके लायक नहीं। अमिताभ बच्चन भी यही कहते हैं। सुनील दत्त, विनोद खन्ना, शत्रुघन सिन्हा, हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी, जया बच्चन सफल राजनेता हुए हैं। लेकिन ज्यादातर कलाकारों को राजनीति जंची नहीं। देखने लायक होगा कि कंगना का घोर विद्रोही स्वरूप, बड़बोला पन बीजेपी को कितना रास आता है और कबतक। क्योंकि कंगना अगर उस व्यक्ति के साथ जमीन आसमान एक कर सकती हैं जिसे उन्होंने ख्वाबों में अपना हीरो माना था। तो बीजेपी से रुसवाई होने पर वो क्या चुप रहेंगी।

बहरहाल कंगना बीजेपी पहन पाएगी। ये बड़ा सवाल है। हालांकि इतनी जल्दी एक शानदार अभिनेत्री का खो जाना भारतीय सिनेमा की क्षति होगा अगर उनका सक्रिय राजनीति में पदार्पण होता है तो…

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