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साहित्यिक शनिवार में अंजू खरबंदा के संस्मरण

अंजू
अंजू खरबंदा

संस्मरण
1. बाबू मोशाय
लम्बा ऊँचा गौर वर्णीय बंगाली लड़का। पान की गिलौरी मुँह में दबाए जब बोलता तो इतनी जल्दी-जल्दी बोलता
कि आधी बात उसके मुँह में ही रह जाती ।
;चटर्जी भैया धीरे बोलिए न ! आपकी आधी बात तो मुझे समझ ही नहीं आई ;
मैं उनकी बात न समझ पाने पर अकसर शिकायत करती । मेरी बात सुनकर फिस्स से हँस पड़ते । जब वह
हँसते तो उसके गालों में गड्ढे पड़ जाते। उनकी गहरी काली आँखों पर नजर जाती तो यूँ लगता मानो वह भी
खिलखिलाकर हँस रही हों….सुंदर मोहक मनभावन हँसी ।
मेरी बात में शिकायत का लहजा पा वह अपनी बड़ी – बड़ी आँखों से मेरी ओर देखते। अपने हाथों से होंठों पर
उतर आई पान की लाली पर धीरे से हाथ फेरते। उनका दिल होता तो अपनी बात फिर से दोहराते, नहीं तो हँस
कर निकल जाते। पीछे वाला सोचता ही रह जाता कि बंदे ने बोला तो बोला क्या। उनकी बोलचाल में बंगाली
शब्द बहुत होते जो हम दिल्ली वालों को भला कहाँ समझ आने वाले थे।
वह दिखने में मस्तमौला टाईप के व्यक्ति थे। जाने उनकी कौन सी क्वालिटी देखकर उन्हें नौकरी पर रखा गया
था। न काम करते न किसी को करने देते। जब देखो मजमा लगा बैठ जाते और सबका हाथ देखने लगते।
हाँ ! हाथ देखते हुए उनका खिलंदड़पन एकाएक दार्शनिक व्यक्तित्व में तब्दील हो जाता। उन्हें हस्त रेखाओं की
भरपूर जानकारी थी। बड़ी गहराई से हाथों की रेखाएँ पढ़ा करते।
उन्हें रत्नों की भी बेहद गहरी समझ थी और उनकी खूब पहचान भी थी। एक नज़र देखते ही समझ जाते कौन
सा रत्न असली है और कौन सा सिर्फ पत्थर!
एक बार मैंने भी उत्सुकता वश अपना हाथ दिखाया। मेरा हाथ देख उन्होंने जो भी बताया उसे सुनकर मैं खूब
हँसी पर भविष्य में एक-एक बात शत प्रतिशत सच साबित हुई। जब-जब उनकी बात सच सिद्ध होती तब-तब
वह शिद्दत से याद आते। बीस तीस बरस आगे का भविष्य बातों ही बातों में बता देने वाला वह शख़्स पता
नहीं आज कहाँ हैं?
उनकी मीठी यादें मेरी जिन्दगी के खजाने का अनमोल हिस्सा हैं और उनसे अपनी शादी के लिये बंगाल से
मँगाई एक बंगाली साड़ी भी जिसे आज भी सबसे ज्यादा खुश होकर पहनती हूँ मैं ।

2. टिक्की वाले सरदार जी
सर्दियों की खुशनुमा सुहावनी सर्द शाम।
पीछे के कमरे में रखे इकलौते पलंग पर कॉपी किताबें ले मैं पढ़ने में तल्लीन थी कि अचानक पूरी फिज़ा
मनभावन आकर्षक खुशबू से महक उठी।
कॉपी किताब ताक पर रख खिड़की से गली में झांकती मेरी उत्सुक आँखों ने देखा कि सरदार जी अपनी
साईकिल पर एक बक्सा सा जमाए जोरदार आवाज लगाते हुए हमारी गली से निकल रहे थे
टिक्कीsssssss गर्मागर्म टिक्कीsssss !
जाने उस आवाज में आकर्षण था या कि टिक्की की अद्भुत खुशबू में। ध्यान बरबस ही उस ओर खिंचा चला
जाता।

तभी पड़ोस के कुछ बच्चे टिक्की लेने धमक पड़े । अब सरदार जी ठीक हमारे दरवाजे के आगे खड़े थे।
सरदार जी ने तीन चार कागज एक के ऊपर एक जमाए, उस पर गरमा गर्म टिक्की रखी, झट से उसे दो फाड़
खोला। धुंए की लहरों के साथ तेज खुशबू पूरे वातावरण को चीरती हुई सीधे मेरे नथुनों में समा गई।
अरे देखो ! आलू मटर और दाल कैसे टुकुर-टुकुर बाहर झाँकने लगे। सरदार जी ने उस पर हल्का सा मसाला
बुरका, इससे पहले कि आलू बेचारे कुछ समझ पाते पुदीने धनिये हरी मिर्च की तीखी चटनी छपाक से उस पर
पड़ी और फिर उस हरी चटनी पर गुड़ की लाल चटनी।
हरे लाल चटख रंगों ने टिक्की की खूबसूरती को मानो चार चाँद लगा दिए हो।
अर्जुन की भांति मेरा दिमाग मेरी आँखें मेरी नाक….सब पूरी तरह से टिक्की पर केंद्रित थे।
टिक्की वाले सरदार जी की आवाज सुन अधिकतर तो खुद को कंट्रोल कर लिया जाता पर कभी-कभी कंट्रोल
करना मुश्किल। सच पूछो तो नामुमकिन हो जाता । अब अपनी खिड़की से ये नजारा देख भला कितनी देर खुद
को रोक पाती।
अरे बाबा रे ! इतनी हिम्मत न थी कि सीधे पापा जी के पास पहुंच जाएं। पापा तक अपनी बात पहुंचाने का
एक ही जरिया थी- मम्मी
मम्मी टिक्की खानी है।
चुप ! हल्की सी झिड़की पड़ती।
मम्मी ! कितने दिन से नहीं खाई, खिला दो न।
अच्छा, रुक तेरे पापा से पैसे लाती हूँ।
मैं डर के मारे दरवाजे के पीछे दुबक गई कि अभी पापा जी की झाड़ पड़ेगी।
मम्मी खाली हाथ वापिस आई तो मेरा चेहरा उतरा देख मुस्कुरा दी।
दरवाजे के पीछे लगे कील पर पापा जी की पैंट टंगी रहती। उसे कील से उतार पापा के पास ले गई।
अब आशा की किरण मेरी आँखों में भर उठी।
पापा ने पैंट मंगवाई यानी राजी हो गए ।
(मेरी मम्मी ने पापा की जेब में हाथ डालकर कभी भी खुद पैसे नहीं निकाले। उनकी ये आदत कब मेरी आदत
बन गई पता ही नहीं चला।)
अब मम्मी मोहक प्यार भरी मुस्कान के साथ मेरे करीब आई और चमकता हुआ पचास पैसे का सिक्का मेरे
हाथ पर धर दिया।
उस सिक्के को अपने हाथ में पाकर उस समय ऐसे महसूस हुआ मानो दुनिया जहान की खुशियाँ मुझे मिल गई
हो।
सिक्का ले ये जा तो वो जा!
गरमा गर्म टिक्की खा जो रूह को सुकून मिला, जिह्वा को जो आनंद आया वह अवर्णनीय है। सच बताऊँ! मेरे
शब्द उस स्वाद को छू भी नहीं पाएंगे।

3. फ्रिज की बर्फ
1982 का जमाना। पूरी गली में आमने-सामने करीब चौदह घर। उन चौदह घरों में केवल एक घर ऐसा जिनके
घर फ्रिज है।

बड़े अमीर होंगे न ये।
पूरी गली में उनका अलग ही रौब। कभी-कभी बड़ा दिल करता अंदर जाकर देखें- ये फ्रिज कैसा होता होगा ।
बर्फ भी जमती है और ठंडा पानी भी निकलता है। कोई अद्भुत निराली चीज ही होगी।
पर कभी हिम्मत न पड़ी कि अंदर जाएं और फ्रिज को जी भर देखें, उसका जायजा लें।
अरे जरा सा हाथ लगाते ही खराब हो गया तो!
गली के दरवाजे से ही थोड़ी तांक-झांक करते, सफल न हो पाने पर खेल में मस्त हो जाते।
हाँ जिस दिन घर में कोई खास मेहमान आता फिर ये सुअवसर मिलता –
जा भाग कर जा लवली की मम्मी के घर से थोड़ी बर्फ ले आ! बोलना बाहर से मेहमान आएं हैं शिंकजी के
लिये बर्फ चाहिए।
हम तो कब से इस अवसर की ताक में होते। बाकी कोई काम कहा जाता तो तू जा! तू जा! पर बर्फ लेने जानी
होती तो तू नहीं मैं जाऊंगी।
फ्रिज को देखने की हसरत जो मन में कुलबुलाती रहती।
ठक-ठक! भरी दोपहरी जब उनका दरवाजा खड़खड़ाया जाता तो डपट भरी आवाज सुनाई पड़ती-
कौन है इस समय?
आंटी वो….बर्फ….मेहमान…!
गले से जबरदस्ती शब्दों को बाहर उडेलते हुए मिमियाता सा स्वर निकलता।
शर्म नहीं आती। दोपहर को भी चैन से सोने नहीं देते!
भुनभुनाती आंटी अंदर जाती और फ्रीजर से बर्फ का कटोरा लाकर धम्म से हाथ पर धर देती।
रुआंसा सा चेहरा लिये घर आती तब तक मम्मी छोटी बाल्टी में चीनी घोल चुकी होती। पूरा वातावरण नीम्बू
की खट्टी-खट्टी खुशबू से भरा होता और जब बाल्टी में छनाक से बर्फ डाली जाती तो मैं झट से छोटी कटोरी
उठा लाती। कटोरी बाल्टी में डुबो-डुबो शिकंजी भरती और बर्फ पर उडेलती जाती।
अहा! देखते ही देखते बर्फ में छेद हो जाता और बर्फ तेजी से घुलने लगती। अम्मा, तायाजी, पापाजी, मम्मी, हम
पाँच भाई बहन और घर आये मेहमान – सभी शिकंजी का लुत्फ़ लेते और बीच-बीच में लवली की मम्मी को
बर्फ के लिये दुआएं भी देते जाते।
मम्मी! हम कब फ्रिज खरीदेंगे?
चुप! पहले नल लगवाएंगे घर पर, ये फ्रिज व्रिज खरीदना हमारे बस का कहाँ!
मम्मी प्यार से घुड़की देते हुए समझाती ।
बस फिर क्या! फ्रिज की चाहत ठंडी-ठंडी शिकंजी में पिघल कर बर्फ की तरह गुम हो जाती ।

4. सुरिन्दर
;सुरिंदरsss! अरे भई एक कप चाय पिला दो बढ़िया सी।;
ऑफिस पहुँचते ही मैं आवाज लगाती।
उस समय ग्रेटर कैलाश में मेरा ऑफिस था जो मेरे घर से ऑफिस करीब 27 किलोमीटर दूर था। सुबह जल्दी
निकलती घर से। घर के सारे काम समेटते-समेटते अपने लिये एक कप चाय पीने का समय भी न मिलता।
अपने हिस्से का नाश्ता हाथ में पकड़े ही बस स्टॉप की ओर भागती कि कहीं चार्टेड बस मिस न हो जाए।

ये तब की बात है जब मेट्रो नहीं हुआ करती थी। तकरीबन डेढ़ घंटा लग जाता ऑफिस पहुँचने में।
और जाते ही तलब लगती एक कप गरमा गर्म चाय की।
सुरिन्दरsss !
अपने केबिन में बैग रखते ही मैं आवाज लगाती ।
और मुस्कुराता हुआ हाजिर हो जाता सुरिन्दर!
एक दिन उसे आवाज लगाई पर कोई रिस्पोंस न पा रिशेप्शन पर फोन किया
;भारती! प्लीज पेन्ट्री में मेसेज दे दो एक कप चाय के लिये।;
कुछ ही देर में सुरिन्दर चाय लेकर मेरे केबिन में आया।
आज उसके चेहरे से मुस्कुराहट गायब थी।
;अरे क्या हुआ तुम्हें! सब ठीक तो है न!;
मुझे उसका उदास चेहरा देख चिंता हुई तो पूछ लिया।
;आज आपने मुझे आवाज नहीं दी चाय के लिये।;
;दी थी। तुमने सुना नहीं तो भारती को कहा।;
;आप मुझे खुद ही आवाज लगाया कीजिये;
;क्यूँ!;
मुझे उसकी बात पर बेहद हैरानी हुई तो पूछ बैठी ।
;वो आप मुझे सुरेन्द्र की जगह अपने पंजाबी स्टाइल में सुरिन्दरssss आवाज लगाते हो न!;
एक पल को तो कुछ समझ न आया ।
समझ आया तो खूब हँसी ।
मैंने तो इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया था।
अपनी गलती का अहसास भी हुआ कि सिर्फ मैं ही पूरे ऑफिस में उसे सुरिन्दरsss कहकर आवाज लगाया
करती थी बाकी लोग तो सुरेन्द्र ही कहा करते ।
पर मुझे नहीं पता था कि मेरी ये पंजाबी टोन उसे इतनी भाती है।
अब मैंने कई बार उसे सुरेन्द्र पुकारने की कोशिश की पर वह अनमना सा हो जाता तो फिर मैं उसे उसी नाम
से ही आवाज लगाती।
;सुरिन्दरsss! अरे भई चाय तो पिला दो एक कप।
और वो पल भर में मुस्कुराता हुआ किसी जिन्न की तरह हाजिर ।

5. लॉक डाऊन के चलते
न पापा से मिलना हो पाया और न नन्हें – नन्हें भतीजे भतीजियों से न मायके की नींव भाभियों से। पापा फोन
पर बात करते रहते हैं। पूरा हाल हवाल पूछते हैं। वह इत्मीनान से बात करते हैं तकरीबन हर विषय पर बात
होती ही है उनसे। फोन उठाते ही
;राम राम बेटा! क्या हाल है मेरी बिटिया का। जवाई बाबू कैसे हैं, मेरे बाल गोपाल कैसे हैं! मेरे किचन गार्डन में
तो खूब सब्जियां उग रही हैं टमाटर, पुदीना, हरी मिर्च, बैंगन। तू सुना तेरे करी पत्ते का क्या हाल है? रोज पौधों
को पानी देती है न! हाँ बेटे उनका अच्छे से ख्याल रखा कर। तेरे चुन्नू मुन्नू कबूतर कैसे हैं? रोज बाजरा

डालती है न! हाँ बेटा ये बहुत पुण्य का काम है। प्याज टमाटर आलू सब हैं न घर में! राशन पानी सब भरा
हुआ है न! नहीं तो भाई को फोन कर देना, जो चाहिए पहुंच जाएगा। ;
पापाजी की चिंता, उनका प्यार, उनका मोह…. उनसे बातें करते हुए दुनिया की सारी परेशानियाँ उन पलों में जैसे
अपना अस्तित्व ही खो बैठती हैं। वह कभी सीधा नहीं पूछते तू खुश हैं न! पर उनकी बातें हर दर्द हर परेशानी
हर लेती हैं।
एक दिन बोले
;कब से नहीं देखा तुझे। भाभी के फोन पर विडियो कॉल कर। शक्ल तो देख लूँ अपनी बिटिया रानी की।;
उस समय ऐसा लगता है नन्हीं सी बच्ची बन गयी हूँ। बस चले तो झट उनकी गोद में जाकर बैठ जाऊं या
उनके कंधे से लटक जाऊं या उनकी पीठ पर सवार हो ;आटा_बोरी; खेलूँ।
कितनी बड़ी हो गई हूँ पर उनके सामने आज भी वही छोटी सी बच्ची ही हूँ।
;ए मेरी कुड़ी है!;
ऐसा कहते हुए वह जब किसी से मिलवाते है तो मन गदगद हो उठता ह । उनके चेहरे पर छाई संतुष्टि साफ
दिखलाई पड़ती है। हर कदम पर वह सदा साथ रहते हैं। सम्मान पुरस्कार हो या फिल्म की शूटिंग, रिकार्डिंग हो
या कहीं दूसरे शहर में जाना। सिर्फ मेरे लिये ही नहीं हर पल हर किसी की सेवा के लिये तत्पर। खुद में हिम्मत
न हो तो भी तैयार।
;पापाजी आप की तबियत ठीक नहीं, आप रहने दो;
;अरे बूढ़ा होगा तेरा बाप! मैं तो अभी बिलकुल फिट हूँ;
हँसकर जवाब देते हैं।
कोरोना के चलते उन्हें सख्ती से मना किया गया है घर से निकलने के लिये। नहीं तो पहुंच जाते सब्जी मंडी।
;यहाँ गली में सब्जियां बहुत महंगी हैं, वहीं से लाऊंगा थोक के भाव।;
चैन से बैठना तो उन्हें आता ही नहीं, कुछ न कुछ क्रिएटिव करते ही रहते हैं।
छोटी बहन साल में एक बार मायके आती है इस बार वो भी रह गया। उसके आते ही चहल पहल शुरु हो जाती
है। कभी इसके घर कभी उसके घर, कभी शॉपिंग कभी फिल्म।
इस बार सब कुछ रह गया। भांजा दक्ष कितनी प्लैनिंग करके बैठा था कि इस बार दिल्ली जाएँगे तो ये करेंगे
वो करेंगे, ये खाएंगे वो खाएंगे, यहाँ जाएँगे वहाँ जाएँगे….पर कोरोना ने सब पर विराम लगा दिया।
सभी अपने-अपने घरों में बन्द हैं। सब काम धंधे बन्द। अब खुले भी हैं तो रौनक ही नहीं है न मार्किट में न
चेहरों पर।

6. बंटवारा
प्रॉपर्टी डीलर ने जेब से नोटों का बंडल निकाला और झुककर झाईजी की गोद में रख दिया।
;बधाई हो बधाई;
रसोई में सब्जी बनाते हुए एकदम से बधाई की गूँज कानों में पड़ी।
डीलर लोग बधाई देकर सीढिय़ां उतर गए।
झाईजी गोद में पड़े रुपयों को एकटक देख रही थी। चेहरे का रंग फक्क पड़ गया था।
पतिदेव गुमसुम पलंग पर बैठे थे।
;मम्मा मैं नहीं जाऊंगा ये घर छोड़कर;

आशीष सुबकते हुए आँखों में भर आये आँसुओं को पोंछता हुआ बोला।
;मम्मा ! अब क्या होगा। ; कहते हुए आयुष की आवाज लरज गई ।
मैं कभी रसोई में सब्जी हिलाने जाती तो कभी बच्चों के पास।
कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा। हिम्मत कर मैंने पूछा
;खाना लगा दूं!;
किसी ने भी उत्तर न दिया !
कब से तो हम इस दिन का इंतजार कर रहे थे और आज ये दिन आ गया तो किसी के चेहरे पर कोई खुशी ही
नहीं दिखलाई पड़ती।
सोचते-सोचते मेरी आँखें बरबस ही भर आई।
उस रात किसी ने न कुछ खाया और न ही कोई चैन से सो पाया।
अगले दिन सुबह गली में शोर मच गया।
;अरे तुमने तो रात ही रात में घर बेच दिया और किसी को कानों कान खबर तक नहीं होने दी।;
क्या कहती!
ये तो एक दिन होना ही था।
संयुक्त परिवार था और बंटवारे की बात बरसों से चल रही थी। भला इसमें नया क्या था। दोनों भाईयों के
हिस्से में एक-एक फ्लोर था पर जरूरतें बढ़ रही थीं तो एक फ्लोर कम पड़ता था। जेठानी के बेटे की शादी के
बाद बंटवारे की बात अधिक उठने लगी थी। वह भी अपनी जगह सच्ची थी। परेशानी तो हमें भी बहुत थी।
सबसे बड़ी बात साझे खर्चे पर बहसबाजी की। कोई टूट-फूट होती तो खर्चा आधा-आधा! उस पर भी अक्सर चिक-
चिक हो जाती।
फँसता कौन हैं? बड़े लोग! झाई जी इस बात पर अक्सर नाराज हो जाती।
हम देवरानी जेठानी में कभी तू-तू मैं-मैं नहीं हुई। कोई बात बढ़ जाने पर दोनों मुँह बंद कर लेते। मन में
कितने भी गिले शिकवे हो फालतू बातें बोलकर कभी मुँह गंदा नहीं किया। हाँ बोलचाल बन्द हो जाती और
कटोरियों का लेन देन भी।
बड़े बेटे को टायफायड हुआ तो जेठानी जब भी अस्पताल आती उसकी पसंद की डिश बनाकर लाती। इतना ही
बहुत होता है एक-दूसरे को जोड़ने के लिये ।
उनके बेटे की शादी पर मैं भी कहाँ एक कदम पीछे रही। शादी के कार्ड बांटने से लेकर डोली घर लाने तक एक
पैर पर साथ खड़ी रही।
पर बंटवारा तो होना ही था। आज नहीं तो कल ।
खुशी ज्यादा थी या दुख, पता नहीं।
बयाना मिलने के बाद तीन महीने का समय मिला। उन तीन महीनों में नया घर ढूँढने की कवायद लगातार
चलती रही। मन उचाट रहता और घर का वातावरण बोझिल।
वक्त धीरे-धीरे सब ठीक कर देता है।
अब दोनों परिवार अपने-अपने घर में खुश हैं। दूरियों ने नजदीकियाँ बढ़ा दी हैं। कोई सप्ताह नहीं जाता कि
आपस में बात न होती हो।
पर पुश्तैनी घर के बंटवारे का दर्द अभी भी कहीं न कहीं जिंदा है।

7. बाल आश्रम
इस बार माँ की बरसी पर सभी भाई बहनों ने फैसला किया कि बाल आश्रम जायेंगे। वहाँ जाने पर पता चला
हाइजिन की दृष्टि से वे पका हुआ खाना नहीं लेते। आप दाल चावल आटा तथा नवजात बच्चों के लिये सेरेलक
दे सकते हैं।
जब हम सामान लेकर पहुंचे तो उन्होंने हमें बच्चों से मिलवाया। पूरी तरह से अनुशासित तकरीबन दस साल
तक की उम्र के बच्चों से हम मिले।
;आपने बताया कि नवजात शिशु भी हैं यहाँ, क्या हम उनसे मिल सकते हैं?; लीना ने उत्सुकता से पूछा।
;नहीं, इंफेक्शन के डर से उन्हें अलग रखा जाता है।;
;अगर हो सके तो मिलवा दे ….. बड़ी मेहरबानी होगी।; मैंने विनम्रता से कहा ।
थोड़ी मिन्नत चिरौरी के बाद वे तैयार हो गये इस ताकीद के साथ –
;जूते चप्पल कमरे से बाहर उतार कर अंदर जाइएगा और किसी भी बच्चे को छूइएगा मत।;
;जी।; आज्ञाकारी बच्चों की तरह हमने हाँ में सिर हिलाते हुए कहा।
कमरे के अंदर जाते ही हम हैरान रह गये। साफ सुथरा बड़ा सा हॉल, बड़े-बड़े पालने उनमें बिछी सफेद झक
चादरें …..।
नन्हें-नन्हें शिशु ! उन्हें देखते ही दिल धक से रह गया एकदम से। नर्सें देखभाल में व्यस्त थीं। एक पालने की
ओर बरबस ध्यान गया तो देखा नीम गहरी निंद्रा में सोया नन्हा सा बालक। अनायस कदम उसकी तरफ बढ़
गये।
नर्स ने बताया ;आज सुबह ही इसे रेल की पटरी से उठा कर लाया गया है। बुखार से पूरा बदन तप रहा था।
अभी दवाई देकर सुलाया।;
अभी हम बातें ही कर रहे थे कि वह बालक रोने लगा।
;क्या मैं इसे उठा सकती हूं… ;
कहते-कहते मेरी आवाज भर्रा गई।
जाने क्या सोचकर नर्स ने हामी भर दी।
जैसे ही मैंने उस नन्हीं सी जान को उठाकर गले से लगाया तो दिल भर भर आया।
कुछ क्षण पश्चात नर्स उस बच्चे को वापिस लेने लगी तो उसने मेरी कमीज की बाजू कसकर थाम ली।
;अरे अरे !; कहते हुये नर्स ने उसकी नन्हीं सी मुठ्ठी खोलने की कोशिश की।
उस समय हम सभी की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली ।

 

परिचय
अंजू खरबंदा
207 भाई परमानंद कालोनी
दिल्ली 110009
फोन 9582404164
*शिक्षा – स्नातक (कला)
*विधा – लघुकथा, संस्मरण व कविता
*संप्रति – अध्यापिका, लेखिका, रेडियो आर्टिस्ट
*रुचियां – साहित्य, पर्यटन, पाककला
*व्हाट्सअप नम्बर- 9582404164
*अन्य जानकारी –
* ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन दिल्ली, रेडियो आर्टिस्ट
* मुल्तानी फिल्म में चीफ गेस्ट का रोल
* लघुकथा शोध केंद्र भोपाल की दिल्ली शाखा की संचालिका
* किस्सा कोताह साहित्यिक पत्रिका में सहयोगी संपादक
*अनेक साझा संकलनों व पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
*एकल पुस्तक की तैयारी

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