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जाति आधारित पत्रकारिताः कई दिलीप मंडलों की जरूरत

दिलीप मंडल, वरिष्ठ पत्रकार

एडिटर अटैक

डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 

दिलीप मंडल का आयां बायां क्या है ये और बात है। लेकिन जब जहां दिलीप मंडल का नाम आता है कहने की जरूरत नहीं कि हमारे दिलो दिमाग में क्या चलने लगता है। जाति के लिए काम करने वाला पत्रकार, जाति के लिए लिखने वाला पत्रकार, जाति के लड़ने वाला पत्रकार, जाति के शोषण, पिछड़ेपन व भेदभाव को उजागर करने वाला पत्रकार।

हां ये औऱ बात है कि वो जाति विशेष के लिए लिखते हैं। वो निम्न जातियों व दलितों के मसीहा पत्रकार के तौर पर पहचाने जाते हैं। आर्थिक, सामाजिक व मानसिक तौर पर पिछड़ चुकी जातियां निम्न या नीची या दलित, पिछड़ी, आदिवासी जातियों जनजातियों के रूप में प्रचलित हैं। श्री मंडल इन्ही जातियों के लोगों को आर्थिक, सामाजिक व मानसिक तौर पर मजबूत बनाने के लिए अपने हिस्से का प्रयास कर रहे हैं।

दिलीप मंडल कि किसी भी पोस्ट पर जाएं उनके चाहने वालों के साथ ही उनके न चाहने वालों की भी लंबी जमात है। मां, बहन व जाति सूचक गालियों के साथ तमाम अन्य अभद्र बातें उनके खिलाफ लोग लिखते हैं। पत्रकारों का भी एक बड़ा समूह उनकी जाति आधारित पत्रकारिता व इसी से जुड़े निजी बयानों व दैनिक कार्यप्रणाली को एकपक्षीय मानता है।  योग्य पत्रकार होने के बावजूद भी जाति मामलों पर प्रमुखतौर पर लिखने व लड़ने के कारण बौद्धिक वर्ग में भी उन्हें सामान्य नजरिए से नहीं देखा जाता। प्रथम दृष्टया तकरीबन हर कोई कहता है मंडल के कमंडल में जाति का जिन्न रहता है। इन तमाम प्रत्यक्ष परोक्ष विरोध-प्रतिरोध के बावजूद मंडल वही कर रहे हैं जो उन्हें करना है। उनका एजेंडा सेट है और वो उसी राह पर अग्रसर हैं। वो हर उस मुद्दे पर प्रमुखता से लिखते व बहस करते हैं जो निम्न जातियों से संबंधित होता है। बगैर किसी आलोचना की परवाह किए बगैर। ऐसा वो वर्षों से करते आ रहे हैं। औऱ जाहिर तौर पर उन्हें जाति विशेष मामलों का पत्रकार कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। आमतौर पर पत्रकारिता में क्षेत्र विशेष के लिए अलग अलग संवाददाता रखने का रिवाज है। उस व्यवस्था के अनुसार देखें तो भारत में हिंदी पट्टी के इकलौते या कहें सामूहिक तौर पर श्री मंडल पहले ऐसे पत्रकार हैं जो पूरी तरह से जाति मामलों को कवर करते हैं। अधिकांशतः जाति मामलों पर ही लिखते व टीका टिप्पणी करते हैं।

हाल ही में उन्होंने यूपीएसएसी चयन प्रक्रिया में दलितों के साथ भेदभाव के न सिर्फ निजी तौर पर आरोप लगाए बल्कि एक पत्रकार के रूप में उन्होंने इस मामले की लंबी तहकीकात की और रिपोर्ट्स भी लिखीं। इस मामले में आगे क्या हुआ मैंने फिर जानकारी नहीं जुटाई। पर निजी तौर पर मुझे खुशी है कि वो एक जाति विशेष के लिए लड़ रहे हैं। खुशनसीब हैं उस जाति के लिए लोग जिन्हें अपनी आवाज उठाने के लिए एक अगुवा मिला है, एक कलम मिली है, एक पत्रकार मिला है। जिसे डर नहीं कि लोग उसे जातिवादी कहेंगे या गाली देंगे।

मेरे इस आलेख के लिखने के पीछे की भूमिका ही यही है कि इस दौर में दिलीप मंडल एक जरूरी काम कर रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है लाखों लाख लोगों के वो हीरो होंगे, लाखों लाख लोगों के लिए वो एक माध्यम होंगे अपनी आवाज रखने का, उनके पास हजारों संदेश आते होंगे जिनमें एक जाति विशेष अपना दर्द कहती होगी। ये थोड़ा अजीब लग सकता है पर मैं समझता हूं पत्रकारिता को और दिलीप मंडलों की जरूरत है। बहुत सारे दिलीप मंडलों की जरूरत है। और ये बहुत सारे दिलीप मंडल अपनी अपनी जातियों के लिए, उनके अन्याय के लिए, उनके शोषण के लिए, उनकी पीड़ा के लिए आवाज उठाएं और कलम चलाएं। इस दौर में हर जाति शोषित है, हर जाति के लोग अन्याय और अव्यवस्था की मार झेल रहे हैं। कोई थोड़ा ज्यादा तो कोई थोड़ा कम। पर शोषण व पीड़ा, भेदभाव की कहानी हर जाति वर्ग के पास है। उन्हें समान रूप से आवाज मिलनी चाहिए।

अब वो दौर नहीं रहा जहां केंन्द्रीय तौर पर ये मानकर चला जाए कि दलित व पिछड़ी जातियों के लोग ही शोषित व पीड़ित हैं। इस दौर में सामान्य वर्ग की जातियों की भी अपनी समस्याएं हैं, शोषण है, लाचारी है, डर है, बेवजह ही कानूनों का दबाव है। अब हर जाति के लिए एक दिलीप मंडल खड़ा करने की जरूरत है। ताकि जाति आधारित खबरों और आलेखों की जब बात हो तो दोनों पक्ष आएं सिर्फ शोषित या शोषण करने वाले का पक्ष न हो। आमतौर पर जब हम जाति संबंधी खबरों को देखते हैं तो हम केवल पिछड़ी जातियों के शोषण, व्यथा औऱ समस्याओं तक सिमट जाते हैं। हमने आजतक ऐसी रिपोर्ट नहीं देखी कि किसी सामान्य वर्ग के लोगों के साथ जाति आधारित भेदभाव,हिंसा या अत्याचार हुआ हो। दलित लड़की से रेप, दलित लड़की से छेड़खानी, दलित लड़की को पीटा हम अखबारों में अक्सर देखते हैं लेकिन ब्राम्हण, बनिया, ठाकुर की लड़की से छेड़खानी, रेप, या पीटने जैसे शीर्षक क्यों नहीं लगाए जाते। लड़की पर जब अत्याचार होता है तो उसमें जाति का उल्लेख शीर्षक में करने का रिवाज कैसे पैदा हुआ। क्या सामान्य वर्ग की लड़कियों से छेड़खानी, रेप ज्यादा गंभीर नहीं लगते? अगर दलित की लड़की से रेप हुआ, खबर का शीर्षक हो सकता है तो ब्राम्हण की लड़की से रेप होने पर क्यों नहीं लिखते कि ब्राम्हण या सामान्य वर्ग की लड़की से रेप। क्या हिंसा और अपराध को भी हम जाति के आधार पर वर्गीकृत करेंगे। क्या ये सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव नहीं है। क्या जरूरत है दलित लड़की को पीटा लिखने की या दलित लड़की से छेड़खानी लिखने की। सिर्फ लड़की से छेड़खानी लिखने से अपराध कमजोर पड़ जाएगा?

क्यों एक जाति विशेष को लेकर मीडिया का ये रवैय्या है। या फिर हमें ये जाहिर करने की जल्दी है कि शोषित, पीड़ित कौम सिर्फ दलित है। यही नहीं साहित्य, सिनेमा में भी शोषित और पीड़ित दिखाने के लिए एक जाति विशेष का ही चयन किया जाता रहा है और आतातायी औऱ जुल्मी बेचारे अमरीश पुरी ही रहे जो ठाकुर साब बताए जाते।

खबरों में हम पाते हैं कि दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ा तो पीटा। इसमें दलितों की कहानी का एक पक्ष है लेकिन तथाकथित पीटने वालों का पक्ष नहीं रखा जाता। पिछले दिनों दक्षिण भारत की एक खबर काफी सुर्खियों में रही कि दलित लड़की ने फूल तोड़ा तो अगड़ी जातियों ने जमकर पीटा औऱ गांव निकाला दे दिया। धनहीन औऱ शक्तिहीन व्यक्ति किसी भी जाति से संबंद्ध हो पीड़ित हो सकता है लेकिन अब पहले जैसी स्थितियां नहीं रहीं और कभी कभी ऐसा नहीं लगता कि एक फूल तोड़ने के लिए पूरे दलित समाज को पीटा जाएगा औऱ देश निकाला दे दिया जाएगा। क्या ये अब संभव है।  कई दफा हम सुनते हैं और समझते हैं कि दलितों के हितों व उनको शोषण से बचाने के लिए जो सख्त कानून बने उनका दुरुपयोग भी इन जातियों ने जमकर किया। इसके कई प्रत्यक्ष और प्रायोगिक प्रमाण हैं। मैंने कई दफा सामान्य वर्ग के लोगों से सुना कि दलित भाई अक्सर कहते हैं कि हरिजन एक्ट लगा देंगे पड़े रहोगे जेल में। जो कानून उनको सामाजिक सुरक्षा देने के लिए बनाए गए थे वो आज घुड़की का काम कर रहे हैं। जैसे अगड़ी जातियों के जुल्मों की दास्ताने सच मानी जा सकती है तो कानूनों के दुरुपयोग भी आपको स्वीकारना होगा। कानून का दुरुपयोग जातिगत मामलों में ही नहीं अन्य मामलों में भी होता रहा है। दहेज कानून हो, रेप कानून हो सबका दुरुपयोग आज हो रहा है। न्यायालयों में सैकड़ो हजारों ऐसे मामले हैं जिनमें माननीय कोर्ट ने ये पाया कि कानूनों की आड़ में बेगुनाहों को फंसाया गया-डराया गया। दहेज कानून पहले बहुत मजबूत था, एक शिकायत पर पूरा ससुराल अंदर। लेकिन जब इसका दुरुपयोग बढ़ा तो इसमें संशोधन किया गया। लचीला बनाया गया। पूरी तफ्शीस के बाद ही गिरफ्तारी को जायज ठहराया गया। बिल्कुल सच है कि मैं सामान्य वर्ग से आता हूं औऱ सामान्य वर्ग से अलग जातियों के लोगों को लग सकता है कि मैं अपनों के लिए डिफेंस कर रहा हूं। तो यही सही। दिलीप मंडल भी तो यही करते हैं। जब दिलीप मंडल के करे को आप जायज मानते हैं और मैं उचित। तो मैं अपने वर्ग के लिए क्यों न लड़ूं औऱ लिखूं। हमारे लिए कौन लिखेगा। हमें हर बार आतातायी, शोषक बताकर आप हमारा छविभंजन करते रहेंगे और हम अपना पक्ष भी रखें तो हम जातिवादी हो जाएंगे। नहीं हम जातिवाद की बात कर ही नहीं रहे हैं लेकिन जाति पर आरोप, मिथ्या बातें, मिथ्या खबरें थोपी जाएंगी तो आपको अपने जाति के लिए निसंकोच आगे आना ही होगा जैसा दिलीप मंडल आते हैं। मुझे उनके लिए खुशी है।

जिस देश, जाति में जन्म लिया

बलिदान उसी पर हो जावे….

 

और अंत में ये कि जिन दलितों को अगड़ी जातियों द्वारा शोषित करने, पीड़ित करने की कहानियां किस्से ही सिर्फ सुनाए जाते रहेंगे तो ये कौन बताएगा कि कि सामान्य व दलितों के बीच सिर्फ शोषण, अपराध व हिंसा का रिश्ता नहीं रहा, ये रिश्ता विश्वास, प्रेम, आस्था का भी रहा है। मैंने स्वयं आजतक नहीं सुना कि हमारे यहां दलित वर्ग के सयानों को किसी ने नाम से पुकारा हो। काका, कक्कू, चाचा कहकर ही बुलाया। हमारे घर का चूल्हा बाद में जले लेकिन कक्कू व उनका परिवार भूखा न सोए। ये सदा जिम्मेदारी निभायी है। कक्कू और हमारा अगड़ी व पिछड़ी जातियों का नहीं दिल का रिश्ता होता था। हर अच्छे बुरे फैसले साथ लिए जाते थे। साल में जब अनाज आता तो ये तय किया जाता कि कक्कू को इतना दिया जाए कि सालभर किसी भी स्थिति में कम न पड़े। मेरी दादी जब हमारे यहां कक्कू ( जो पूरा जीवन हमारे यहां खेती का काम करते रहे) को इतने आदर से भोजन कराती कि अगर रोटी थाली में न बची और हम बच्चे नहीं देख सके तो खैर नहीं। ये कहानियां कौन कहेगा। वो दिल से हमारे लिए प्रार्थनाएं करते और हम उनके शोक में दुखी होते। खुशी में शामिल होते। आप सिर्फ हमारे बीच वैमनस्यता की कहानियां समाज में गढ़ते जाएंगे तो ये तो खायी डालने की कोशिश हुई न.. नहीं हमें जोड़ने की कहानियां भी कहिए।

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