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आप बहुत याद आएंगे सुनील दुबे सर, जैसे अंदर वैसे बाहर

सुनील दुबे, वरिष्ठ पत्रकार
हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा आदि अखबारों में सम्पादक रहे सुनील दुबे का 23 अक्टूबर 2020 शुक्रवार को निधन हो गया। उनके साथ बिताए समय को याद कर रहे न्यूज 18 दिल्ली में न्यूज एडीटर संजय श्रीवास्तव
ये अगस्त 1996 की बात है. मेरा चयन हिंदुस्तान लखनऊ संस्करण में उप संपादक के तौर पर हुआ. तब मैं अमर उजाला मेरठ में था. शास्त्रीनगर में घर था. शहर में अच्छा खासा परिचय. दोस्तों की फौज. जब हिंदुस्तान में सेलेक्शन हुआ, तभी अमर उजाला में प्रोमोशन हो गया. उप संपादक से वरिष्ठ उप संपादक. पैसे भी बढ़े. अजीब स्थिति थी. एक ओर हिंदुस्तान टाइम्स जैसा बड़ा ग्रुप, दूसरी ओर अमर उजाला में अच्छी स्थिति, अतुल माहेश्वरी जी का स्नेह और अपना शहर. इसके बाद भी मैं ऑफर लेटर लेने लखनऊ गया.
ऑफर लेटर देने का काम संपादक सुनील दुबे जी के पीए जीवन झा कर रहे थे. उन्होंने ऑफर लेटर दिखाया. पद उप संपादक और वेतन मेरठ के वेतन के बराबर. तभी दुबे जी अंदर आते हुए नजर आए. पीछे-पीछे बड़ा टिफिन और उनका बैग लिए ड्राइवर. मैं उनके केबिन में दाखिल हुआ. पहले कभी दुबे जी के साथ काम नहीं किया था. ना ही वो मुझको जानते ही थे. इसके बाद भी सेलेक्शन किया था.
मैने अनुरोध किया, सर मेरा अमर उजाला में प्रोमोशन हो गया है. पैसे भी कुछ बढ़ गए हैं. दुविधा वाली स्थिति है. क्या ऑफर लेटर बदल सकता है. दुबे जी मुझको तेज नजरों से घूरा. ऊपर से लेकर नीचे तक एक्स-रे किया. फिर डांटने के अंदाज में बोले, “देखिए करना तो इसी ऑफर लेटर पर होगा. मंजूर हो तो ले जाइए. वर्ना आपकी जगह किसी और की भर्ती कर ली जाएगी.” मेरा मूड खराब हो गया. सोचा – “अब ऑफऱ लेटर भी नहीं लूंगा. ना इनके साथ नौकरी करनी है.”
निकल रहा था. तभी जीवन झा ने पीछे से आवाज लगाई, “संजय जी ऑफर लेटर लेते जाइए. भले मत आइएगा.”
बेमन से ऑफर लेटर लिया. निकल गया. मेरठ आकर काम करने लगा. अतुल जी को जरूर बता दिया कि हिंदुस्तान, लखनऊ में सेलेक्शन हुआ है लेकिन जाऊंगा नहीं. अतुलजी ने फिर घर बुलाया. समझाया, “संजय तुम्हारा प्रोमोशन इसलिए हुआ, क्योंकि तुम डिजर्व करते हो. यहीं रहो, यहां तुम्हारा भविष्य अच्छा है.” ये वो समय था जबकि अमर उजाला ग्रो कर रहा था, आने वाले समय में उसे वाकई ऊंचाइयां देखनी थीं. लखनऊ जाने का प्रोग्राम कैंसिल.
ऑफऱ लेटर के अनुसार 07 या 08 सितंबर 1996 को हिंदुस्तान ज्वाइन करने का आखिरी दिन था. इसी दौरान अमर उजाला में न्यूज एडीटर महोदय की कारस्तानियों ने इतना क्षुब्ध किया कि रात में 11 बजे मेरठ से लखनऊ जाने वाली बस पकड़ी. सुबह करीब 10-11 लखनऊ में.
ऑफिस पहुंच कर जब ज्वाइनिंग लेटर दिया तो जीवन झा मुस्कुराए. कहा, “अच्छा किया था जो आपको जबरदस्ती ऑफर लेटर दे दिये.” आफिस में एक-दो घंटे बिताए. कुछ साथी कंप्युटर पर पेज बनाने का अभ्यास कर रहे थे. तब अखबारों में संपादकीय विभाग में कंप्युटर का आगमन नहीं हुआ था. जबकि लखनऊ हिंदुस्तान में पहली बार संपादकीय के लोगों को कंप्युटर पर पहले खुद अपनी खबरें संपादित करनी थीं, अनुवाद करना था. फोटो सर्वर से फोटो छांटनी थीं. उन्हें साइज करना था. फिर खुद ही पेज डिजाइन करे इसने प्रिंटिग मशीन के लिए रवाना करना था. सभी साथियों ने ये काम बखूबी किया. तब तक हिंदी या किसी भी भाषा के अखबारों में संपादकीय के लिए लोगों के लिए इतना सबकुछ कंप्युटर पर करना दूर की कौड़ी थी.
पहले दिन दो घंटे संपादकीय में बिताने के बाद दुबे जी के केबिन में पहुंचा. कहा, “सर, ज्वाइन कर लिया है, क्या आज पहले दिन कुछ जल्दी जा सकता हूं. कुछ ठहरने की व्यवस्था भी कर लूं.” दुबे जी ने बड़ी बड़ी आंखें निकालीं. बरस पड़े, “यहां नौकरी करने आए हैं कि मटरगस्ती करने. यहां ये सब बिल्कुल नहीं चलने वाला. जाइए जाकर सीखिए कि कैसे पेज बनाना है.” अंदर से मन उदास हो गया कि यार ये कैसा संपादक है.
फिर अगले छह सालों तक हिंदुस्तान लखनऊ में काम करता रहा. काफी सीखने और करने का मौका मिला. दुबे जी ने खेल डेस्क की जिम्मेदारी दी थी. खेलों के खुद बहुत शौकीन थे. तो इस पेज पर उनकी सबसे ज्यादा नजर होती थी. कह सकता हूं कि दुबे जी की सबसे ज्यादा डांट अगर किसी ने खाई होगी तो उसमें मैं जरूर था. काम भी खूब करता था और डांट भी खाता था. कई बार तो ये हुआ कि गलती से ‘वीकली ऑफ’ के दिन आफिस पहुंचा और दुबे जी ने देख लिया तो अगर उस दिन कोई मसला निकला तो केबिन में बुलाकर रेल बना दी.
डांटने के बाद दुबेजी मन में कुछ नहीं रखते थे. खेल पेज पर नए प्रयोगों के लिए पूरी छूट थी. बहुत से नई चीजें खेल पेज पर की गईं. तुरंत शाबासी मिलती थी, “वेलडन प्यारे. बहुत बढ़िया किया है.” उन दिनों लखनऊ में टेनिस का एटीपी इवेंट था. मैं उसमें रिपोर्टिंग करने गया. चार दिनों में 04-05 ऐसी ब्रेकिंग निकाली कि रोज दुबे जी तारीफ करते थे कि “प्यारे तुम्हारी खबर की शहर में चर्चा है. बहुत बढ़िया.”
उन दिनों लखनऊ में फीचर पेज भी तैयार होता था. उस पर मैं लगातार इसलिए लिखता था कि सेलरी कम है तो फीचर के पारिश्रमिक से संतुलन बन जाएगा. लखनऊ में खर्च की गाड़ी को इस संतुलन से बखूबी चलाया. अच्छा लिखने पर भी हमेशा दुबे जी की शाबासी मिलती थी.
लखनऊ हिंदुस्तान में ज्वाइन करने वाली ज्यादातर टीम युवा थी. छुट्टी के दिन या किसी दिन रात में पेज छोड़ने के बाद दारू पीने वालों की बैठकी अविकल थपलियाल के घर पर जमा करती थी. कई साथी ऐसे थे. जो पीते नहीं थे लेकिन ये देखने जरूर आते थे कि पीने के बाद हम क्या बोल रहे हैं, क्या कर रहे हैं, सारी बातें दुबेजी तक पहुंचा देते थे. जाहिर है पीने-पिलाने वाली मंडली अगर आफिस के सहकर्मियों की हो तो बॉस अक्सर निशाने पर होता है. लिहाजा हमारी वो बातें उन तक पहुंचतीं तो जरूर लेकिन उन्होंने इसे लेकर शायद ही कभी कुछ कहा हो. हां, कभी-कभार इस पर चुटकी जरूर ले लेते थे.
जब भी हम अखबार में गलती करते थे तो अगर खुद इस बारे में सुबह फोन करके दुबेजी से कबूल कर लिया तो समझिए अभयदान. अगर ये सोच रहे हैं कि इस छोटी गलती का किसी को पता भी नही चलेगा तो पक्का था कि आफिस पहुंचने पर डांट का तगड़ा डोज मिलने वाला है. खैर शुरुआती डांट के बाद मैने भी समझ लिया कि भाई अगर गलती हो तो सुबह पीसीओ से फोन करके क्षमायाचना कर लो. बडी से बड़ी गलतियों पर दुबे जी हमेशा सभी से स्पष्टीकरण जरूर लेते थे लेकिन किसी को आंच पहुंची हो, ऐसा कभी नहीं हुआ.
एक बार मुझसे बड़ी गलती हुई. शायद एक पेज खबर दो बार रिपीट हो गई. वो भी डबल कॉलम की. सुबह सुबह मुंह लटकाकर दुबे जी घर पहुंचा. वो हाफ पेंट पहनकर बैठे हुए थे. देखकर मुस्कुराए. छूटते ही बोले, “अच्छा तो खेल पेज के ब्लंडर के लिए बताने आए होगे.” मैने कहा-“हां, सर, बड़ी गलती हो गई.” दुबे जी हंसे, “देखो भाई जो काम करेगा, उससे गलती होगी ही, मस्त रहो.” फिर भाभी जी से चाय और नाश्ता लाने को कहा. मैं भरपेट नाश्ता करके उनके घर से लौटा.
संपादकीय में करीब 40-50 लोगों की टीम थी. किसी को 03-04 साल तक प्रोमोशन नहीं मिला. जब तीन-चार साल बाद अखबार लखनऊ के मार्केट में जम गया, तब उन्होंने 04-05 लोगों को प्रोमोशन दिया, उसमें मैं भी था. सब एडीटर से सीनियर सब एडीटर. वैसे तो दुबे जी की किचन कैबिनेट भी थी. तमाम खबरें आती थीं कि किचन कैबिनेट के लोगों की पहुंच कैसे उनके घर तक है लेकिन उनमें से शायद किसी का प्रोमोशन दिया. उन्हें हर किसी की परख बखूबी थी. वो अक्सर कहते थे,” प्यारे, टीम में गड्ढों को भी साथ लेकर चलना पड़ता है”.
लखनऊ जैसे शहर में सालभर में कई दिन ऐसे होते हैं जब हॉकर अखबार नहीं उठाते, छुट्टी मनाते हैं. उस दिन अखबार के आफिस की भी छुट्टी हो जाती है.ऐसे दिनों में दुबे जी सारे स्टाफ के साथ अक्सर पिकनिक का आयोजन करते-कराते थे.
2003 में मैं लखनऊ में हिंदुस्तान की नौकरी छोड़कर दिल्ली आ गया. दुबे जी भी कुछ साल बाद दिल्ली आए. उनसे कई बार मिलना होता रहा. कई बार नोएडा में मैने उनको स्कूटर से घुमाया भी. वो घर खाना खाने आए.
वाकई गजब के इंसान थे सुनील दुबे सर. जिंदादिल. सहयोगियों को समझने वाले. कभी किसी के साथ जानबूझकर खुन्नस नहीं पाली. ना ही पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर अहित करने की कोशिश की. वो किसी के दबाव में नहीं आते थे. ना ही मौजूदा संपादकों की तरह मंत्रियों औऱ मुख्यमंत्री की लल्लोचप्पो करने वाले. बस अपना काम करना जानते थे. उसको बखूबी करते थे. तीन दशक के करियर में मैने कई संपादकों के साथ काम किया, उसमें केवल 02-03 ही प्रोफेशनल भी थे और भले भी. दुबे जी उनमें से एक थे. कई संपादक ऐसे मिले, जिन्हें ढोंगी या भ्रष्ट कहना चाहिए. लेकिन दुबेजी जैसे अंदर थे वैसे ही बाहर. आप बहुत याद आएंगे सुनील दुबे सर
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