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अल्का सोनी की 5 कविताएं

अल्का सोनी

1) ■■ मरघटों की शांति ■■

मौन रहकर

अंतर में

लहू को एक

उबाल दे

भय दिखाती हो

अगर मृत्यु तो

भुजबल से

उसको

टाल दे

सुनाई देती हो

हाहाकार तो

जूझकर तू

कदमों को

मिलाकर ताल दे

बधिरों से भरी

सभा में

ऊंची कर

आवाज़ तू

मरघटों की शांति में

एक बवाल दे।

2)◆◆ चूड़ियां ◆◆

हाथों में सजने से पहले
मोहकता से खनकने के पहले
प्रिय को रिझाने से पहले
कलाइयों को
अपने रंग ओ आब से
दमकाने से पहले
गुजरती हैं ये चूड़ियां
तपते और दहकते
अंगारों से,
पिघलती हैं मोम सी ये
और झुलसा देती हैं
कितने ही बचपन.
उसी ताप में जलकर
चिपके रह जाते हैं
कितने फूल….
खिलने से पहले,
देकर अपनी मासूम हंसी
औऱ हर रंग
अपने जीवन का
वे सजाते हैं चूड़ियां
नगों से ,मोतियों से
कई सपनों और
उम्मीदों को बेरंग
करती ये चूड़ियां
तय करती हैं
ताप से श्रृंगार
तक का सफर
और सज उठता है
किसी नवयौवना का रूप।
3) ) ** उस पार हो तुम **
जीवन के इस
समांतर पथ में
 इस पार हूं मैं
उस पार हो तुम
विरह मिलन की
इस धूप छांव में
प्रेम का रूप
साकार हो तुम
तपती जमीन पर
चलते चलते
पांव में जो छाले
पड़ते उनका कोई
उपचार हो तुम
हार जीत से रहे
अछूते जाने कैसे
प्रीत का निर्मल
व्यापार हो तुम।
4) ■■ हमें क्या ■■
घर लौट रही
युवतियों पर
कसती हुई
फब्तियां
लेकिन सब चुप
यह सोचकर कि
वो बेटी नहीं
उनकी
उन्हें क्या !!!!
मंदिर में मूरत के
आगे चढ़े हुए
रुपयों के अंबार
बाहर बूढ़ी मां
कुछ भूखे बच्चे और
बुजुर्ग की पंक्तियों को
अनदेखा कर
आगे बढ़ते लोग
लेकिन इनसे
हमें क्या !!!!!
नई नई
पत्नी कर रही
बूढ़े मां-बाप का
पग पग पर तिरस्कार
अभी नहीं सन्तान
हमारी जो सीखेगी
गलत संस्कार
इसलिए इन सबसे
हमें क्या !!!!
सेवानिवृत्त अधेड़
काट रहा है
चक्कर पर चक्कर
पेंशन अपना पाने को
देर है अपनी
रिटायरमेंट में
सोच रहा है
दफ्तर का बाबू
अभी हमें क्या ??
5)●● असुर ●●

 

कई युग बीत गए

उसको मरे लेकिन

आज भी वह हँस रहा है

अट्टहास कर रहा है

बार बार अपने वापस

लौट आने पर

मानों कह रहा हो कि

वो मर ही नहीं सकता

 

अब कोई श्राप

कोई ब्रह्मास्त्र या अवतार

उसका कुछ नहीं

बिगाड़ सकता है

अमृत अब उसकी

नाभि से निकल कर

फैल चुका है ,

उसके पूरे शरीर में

 

अब उसका कोई भेदी नहीं

चारों तरफ बस

और बस वही है

उसका दम्भ है

वो व्याप्त हो चुका है

अनगिनत वेश धर

हर जगह

अपनी पूर्व अवस्था छोड़

ले चुका है वह

रक्तबीज का रूप

 

जिसे किसी शस्त्र से

मारा नहीं जा सकता,

धरना होगा कालिका को

रौद्र रूप उसके

संहार के लिए

ताकि फिर पनप

न सके एक नया असुर……

लेखक परिचय-
अलका ‘सोनी’
बर्नपुर, पश्चिम बंगाल।
औपचारिक संक्षिप्त परिचय:-
जन्मस्थान- झारखंड, भारत
जन्मतिथि – 23/11/1986
शिक्षा – बी ए ( हिंदी प्रतिष्ठा )
           एम ए ( हिंदी )
            बी एड ।
भारत के अनेक बड़े समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, कादम्बिनी पत्रिका, नेपाल व अमेरिका के समाचार पत्र में रचनाओं का प्रकाशन।
रुचियां – लेखन, अध्ययन, बागवानी, संगीत सुनना।
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