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और ललित सुरजन चले गए…

ललित सुरजन जी

डॉ. प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 pratap.prashant@rediffmail.com

मुझे नहीं समझ आ रहा कि कहां से लिखना शुरू करूं। सच तो ये है कि मैं कुछ लिखना ही नहीं चाहता, दरअसल ये दौर भी विचारों के आदान प्रदान का नहीं मौन प्रार्थनाओं का है। कितना भीषण दौर है, क्या प्रकृति, क्या जन मानस, क्या रोजगार और क्या जीवन-मृत्यु। हां बावजूद दुनिया चल रही है। कुछ चमकती-दमकती चीजें हमें दिख जाती हैं। अच्छा है।

फिलहाल मैं देशबंधु के प्रधान सम्पादक ललित सुरजन के बारे में सोच रहा हूं। मेरे फेसबुक मित्र थे। अक्सर उन्हें फेसबुक पर कविता पाठ करते देखता, कभी कभी उनके आलेख। उनके आलेख कुछ ज्यादा ही लम्बे होते। ये बिल्कुल सच है कि शायद ही मैंने उनका कोई कविता पाठ सुना हो या कोई लम्बा आलेख पढ़ा हो, मुझे याद नहीं पड़ता। जबकि मैं उनकी रग रग से वाकिफ़ हूं।

मैं काफी देर से यही सोच रहा हूं। अभी थोड़ी देर पहले एकांत में आसमान तले टहल रहा था, तब भी यही सोच रहा था कि दुनिया दरअसल है क्या। वास्तव में हम यहां आए क्यों। क्या वाकई हम सब वही कर रहे हैं जो वाकई हमें करना चाहिए। क्या हम सब वही पा रहे हैं जो हमें पाना था।

ललित सुरजन जी

सोशल मीडिया के दौर में हम बहुत सारे चेहरों से रूबरू होते हैं औऱ उनके विचारों को पढ़ते हैं। ललित सुरजन पूरे एक वर्ष से फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे थे। और ठीक दो दिन पहले उन्हें तकलीफ बढ़ी, ब्रेन हेमरेज का अटैक आय़ा, दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती किए गए और 2 दिसम्बर शाम उनका निधन हो गया। ललित सुरजन हमेशा कविता पाठ करते दिखते थे। दमकता चेहरा, धीर गंभीर व्यक्तित्व, ओजस्वी उपस्थिति। पर मुझ जैसे ही न जाने कितनों को पता न होगा कि वो फेफड़े के कैंसर रोगी थे।

सुरजन जी जैसे कितने लोग होंगे, कितने ही निपट अकेले और सन्नाटे में जी रहे होंगे। कितनों को एक अदद बात करने के लिए कोई न होगा, कितनों के पास उन्हें सुनने के लिए भी कोई न होगा। लेकिन वो चेहरे छद्म रूप से प्रकट होते रहते हैं औऱ हम उनके मूल प्रकृति को नहीं जान पाते। जैसे दैनिक भास्कर में पर्दे के पीछे स्तम्भ के पूरे देश में चाहने वाले हैं। जो उसके रचयिता जयप्रकाश चौकसे की लेखनी के कायल हैं मेरी तरह। पर शायद उन करोड़ों चाहने वालों के पता न होगा कि जयप्रकाश चौकसे अरसे से कैंसर से जूझ रहे हैं। प्रख्यात लेखक, अनुवादक मंगलेश डबराल कोरोना से एक अस्पताल में जूझ रहे हैं, माखनलाल विवि के निदेशक रहे दीपक शर्मा का आज ग्वालियर में निधन हो गया। बड़े नामों में अहमद पटेल चल बसे, ओमप्रकाश चौटाला कल कोरोना संक्रमित होकर भर्ती हो गए। एमडीएच के महाशय आज चल बसे। बाबा आम्टे की सुपुत्री ने आत्महत्या कर ली। दैवीय चेहरे औऱ ममत्व से आच्छादित चेहरे वाली वो लड़की आत्महत्या कर सकती है। मुझे यकीन नहीं होता। हर कोई जैसे लड़ रहा है मानो मौत से, मानो जिंदगी से।

मैंने सोशल मीडिया से तकरीबन तौबा कर ली है। मुझे लगता है मैं खुद को प्रचारित करने के काबिल नहीं हूं। यहां ऐसे लोगों की जरूरत है जो खुद की बेहतर मार्केटिंग करना जानते हों। मैं मिरर के फेसबुक पेज पर भी टीप नहीं लगाता। अपना स्तम्भ भी नहीं लिख रहा फिलहाल। हालांकि कुछ रोज पहले धूप सेंकते हुए और सरसों के तेल से शरीर को रगड़ते हुए मुझे कुलदीप नैय्यर की शेखर गुप्ता को कही वो बात जरूर याद आ रही थी कि अपने नियमित स्तम्भ को अनियमित नहीं करना चाहिए औऱ मुझे ये जरूर लग रहा था कि मुझे अपना नियमित स्तम्भ एडिटर अटैक लिखते रहना चाहिए। और मैं सोच रहा था कि मैं इस सप्ताह लिखूंगा। पर पता नहीं सुरजन जी के जाने की खबर सुनी और इस लेख की भूमिका बनी।

अभी मैं अपने भोपाल में मित्र समागम पत्रिका के सम्पादक श्री मनोज कुमार को याद कर रहा हूं, वो देशबंधु से ही प्रशिक्षित हैं। इरा झा, अनंत मित्तल, ओम थानवी और कई और पत्रकारों के सुरजन जी पर लिखे संस्मरणों के बारे में सोच रहा हूं। मायाराम सुरजन को याद कर रहा हूं। और सोच रहा हूं कि क्या आज के युवा पत्रकार ललित सुरजन को जानते होंगे। रूबिका, श्वेता, अंजना ओम, रोहित सरदाना, रवीश, सुधीर आदि से इतर क्या चोटी के पत्रकार, देश के श्रेष्ठतम संपादकों में से एक सुरजन को क्या वाकई आज के पत्रकारिता के छात्र व युवा जानते भी होंगे। मुझे ये जानने की उत्सुकता है। सुरजन जी के बराबरी ( बराबरी से आशय उनके ज्ञान-विज्ञान, उनकी समझ से है) के कितने पत्रकार मैं जीते जागते देख रहा हूं। शायद उंगलियों में ही बचे हैं। खुशवंत सिंह गए थे। मुझे बहुत धक्का लगा था। फिर पिछले दिनों कुलदीप नैय्यर के साथ मानो पत्रकारिता के पूरे युग का देहावसान हो गया। उधर साहित्य से कुंवर नारायण, केदार और नामवर का जाते जाना। कृष्णा सोबती का जाना। लगा अब ऐसे लोग इस धरती को कहां नसीब होंगे। अब पत्रकारिता जगत से सुरजन जी का जाना। मैं जिन जीवित पत्रकारों को कुछ बेहतर पाता हूं उनमें ओम थानवी, जयशंकर गुप्त, भोपाल से एनके सिंह, राहुल देव, आलोक जोशी, उर्मिलेश, राजेश बादल, शेष नारायण सिंह, एन राम, अंग्रेजी के कुछ पत्रकार आदि। रामबहादुर राय, हरिवंश सरीखे कुछ ज्ञानी सम्पादक भी हैं पर सत्ता लोलुप हो चुके इन लोगों के बारे में क्या ही कोई कहे। जो बिक चुका वो मर चुका। पत्रकारिता में बहुत पढ़ने लिखने वाले सम्पादक भी अब विरले ही हैं। कुछ चम्पकों को मैं फिटनेस के लिए उछलकूद करते देखता हूं तो कुछ को रसोई में कुछ पकाते। लेकिन चौथे खम्बे के नजरिए से उनका व्यक्तित्व और ज्ञान बहुत निम्न है। वैसे कहने को ये बड़े बड़े अखबार व चैनल समूहों के मोटी तनख्वाह वाले सम्पादक हैं। इन करकटों में राजेंद्र माथुर, मायाराम सुरजन, खुशवंत सिंह, कुलदीप नैय्यर, प्रभाष जोशी, मनोहर श्याम जोशी, दिलीप पंडगांवकर और ललित सुरजन ज़रा सा भी ढूढ़ने पर भी नहीं मिलेगा।

अंत में ये कि मैंने न कभी ललित सुरजन को पढ़ा ही औऱ न सुना औऱ न देखा औऱ मिला। फिर इतना प्रभावित क्यों। दरअसल व्यक्तित्व की एक दमक होती है, एक आभा होती है। वो व्यक्तित्व बरसों बरस कठिन श्रम, अथक परिश्रम से सुगठित होता है जो सहसा किसी को अपना बना लेता है, सामने वाले पर छा जाता है। एक विराट व्यक्तित्व ऐसे ही नहीं बन जाता, और एक विराट व्यक्तित्व आपको देखते ही समझ आ जाएगा। उसी विराट व्यक्तित्व में रचे बसे एक अलहदा प्राणी थे ललित सुरजन। हालांकि सुरजन कथा मैं अक्सर अपने उन वरिष्ठ सहयोगियों व साथियों से सुनता आया हूं, वे सब बस एक शब्द कहते थे कि देशबंधु एक विद्यालय है पत्रकारिता का और उसके हेड मास्टर हैं सुरजन जी। जो वहां पहुंच गया वो मानो पत्रकार बन गया…..

उन्हें सादर प्रणाम.. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे

शेष मैं कुशल हूं, खूब धूप लेता हूं, धूप में खूब मालिश करता हूं। सुबह अर्जुन छाल का काढ़ा लेता हूं। आहार विहार का ख्याल रखता हूं। नौकरी नियमित जाता हूं। आप सबका स्नेह और आशीर्वाद महसूस करता हूं। आशा करता हूं आप सब कुशल होंगे। शायद मैं नए वर्ष से पुनः अपना स्तम्भ नियमित लिखूं।

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