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मीडिया मिरर वीकली न्यूज बुलेटिन

ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार
ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार

आर-9 चैनल से अमिताभ अग्निहोत्री ने दिया इस्तीफा

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– हाथरस कांड में पीड़िता का नाम उजागर करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कई मीडिया संस्थानों को नोटिस जारी किया है। जिन संस्थानों को नोटिस जारी किया गया है कि उनमें टेलीग्राफ, दैनिक जागरण आदि हैं।

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-हिन्दुस्तान टाइम्स के स्वामित्व वाली हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (एचएमवीएल) ने हॉस्पिटैलिटी कंपनी ओयो रूम्स में 54 करोड़ रुपए का निवेश किया है.

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-आजतक इटावा के संवाददाता साबिर शेख का लम्बी बीमारी के बाद निधन

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-जानी-मानी लेखिका अरुंधति रॉय ने दिल्ली में किसान आंदोलन को संबोधित करते हुए कहा कि अडानी, अंबानी से खतरनाक है गोदी मीडिया। उन्होंने कहा कि मीडिया अपने उद्देश्य से भटक गया है। इतना गैर जिम्मेदार मीडिया विश्व में कहीं नहीं है।

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-एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने दैनिक भास्कर के राजस्थान स्टेट ब्यूरो चीफ प्रेम प्रताप सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि दैनिक भास्कर जैसे अखबार भी अब फेक न्यूज फैलाने के लिए पत्रकार रख रहे हैं। दरअसल प्रेम प्रताप ने अपने ट्वीटर हैंडल से ट्वीट किया था कि रवीश कुमार को राजस्थान के किसी विश्व विद्यालय में बड़ी जिम्मेदारी  मिलने वाली है। इसी खबर को रवीश कुमार ने आड़े हाथ लेते हुए फेक बताया और पत्रकार को फेक न्यूज फैलाने वाला कहा।

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-आमतौर पर संघ समर्थित पत्रकारों को विश्वविद्यालयों में कुलपति औऱ प्रोफेसर पद से नवाजा जाता रहा है। मध्यप्रदेश के माखनलाल पत्रकारिता विवि, भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि छत्तीसगढ़ में भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से नजदीकी रखने वाले पत्रकारों को कुलपति व प्रोफेसरों के पद पर नियुक्ति मिली है। विरोधी दल इसका विरोध करते रहे हैं। लेकिन ठीक इसके विपरीत वामपंथी विचारधारा से वास्ता रखने वाले जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी की नियुक्तियों ने तो गजब कर दिया। राजस्थान सरकार की कृपा उन पर ऐसी बरसी की एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन विश्वविद्यालयों में एक साथ वो कुलपति का कार्य देख रहे हैं। सत्ता और सत्ता के केंद्र में रहने वालों का यही स्वरूप है। फिर सत्ता किसी दल की क्यों न हो।

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-जाने माने पत्रकार व हरिदेव जोशी पत्रकारिता विवि के कुलपति ओम थानवी मीडिया की सरल, सहज व शुद्ध भाषा के हिमायती रहे हैं। जिसका तेजी से पतन इस दौर में चालू है। थानवी लिखते हैं कि

हिंदी अख़बार भी कोरोना के टीके को टीका नहीं, वैक्सीन लिख रहे हैं। भाषा ऐसी बरतनी चाहिए, जो हरेक तक निर्बाध पहुँच जाए। अख़बार गाँव-क़स्बों में भी पढ़े जाते हैं। टीवी वे भी देखते हैं जो साक्षर नहीं। उन्हें वैक्सीन शब्द ज़्यादा समझ आएगा या टीका?
ऐसे ही, आज अख़बारों ने ख़ूब लिखा है कि वैक्सीन का ‘ड्राई रन’ किया गया। क्या इसका अर्थ हर कोई समझ लेगा? टीके कैसे लगेंगे, इसके विभिन्न चरणों का दिखावटी प्रयोग यानी अभ्यास भर किया गया है। जयपुर में सिर्फ़ एक अख़बार में मुख्य ख़बर के साथ यह खुलासा देखने को मिला कि “ड्राई रन क्या है”। … ड्राई रन, मॉक ड्रिल जैसे प्रयोगों के हिंदी समानार्थी रचना/बरतना मुश्किल काम नहीं। पर अंगरेज़ी के रास्ते आने वाली ख़बरों की शायद यही नियति है
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दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन का पेड प्रकाशन व प्रसारण मीडिया में शुरू हो गया है। ऐसी खबरें हैं। कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया, साप्ताहित व पाक्षिक अखबारों से लेकर मुख्यधारा तक की मीडिया में अब किसान आंदोलन की कवरेज के लिए पैसा पहुंच रहा है। किसान आंदोलन को प्रमुखता से कवर करने के लिए आखिर पैसा कौन दे रहा है। इसका पता करने की दिलचस्पी किसी को नहीं है। सवाल ये है कि एक ओऱ मीडिया मोदी सरकार का हिमायती कहा जाता है तो दूसरी ओर वो मोदी विरोधी किसान आंदोलन को हवा देने में भी पीछे नहीं हटता बशर्ते डील बेहतर हो।
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