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सेरोटोनिन जब बहता है तो….

किसान आंदोलन
किसान नेता राकेश टिकैत की रोती हुई तस्वीर, जो इस आंदोलन की रीढ़ साबित हुई।

(संदर्भः किसान आंदोलन)

एडिटर अटैक- डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक, मीडिया मिरर

(pratap.prashant@rediffmail.com)

किसान आंदोलन। 26 जनवरी को किसान आंदोलन व किसानों की ट्रैक्टर रैली से उपजी अपार हिंसा। 300 से ज्यादा पुलिस वालों का हिंसा की चपेट में आना। कई पुलिस वालों का अति गंभीर अवस्था में अस्पतालों में पहुंचना। दिल्ली सीमाओं का आंदोलन के चलते लगातार बंद रहना। दिल्ली वासियों को आंदोलन के चलते अव्यवस्थाओं का सामना करना। 26 जनवरी की हिंसा को आग देने के लिए झूठ फैलाना देश के प्रबुद्ध पत्रकारों द्वारा और पकड़े जाना। फिर रोना और फिर शक्ति प्रदर्शन करना।

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हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहां या तो किसान आंदोलन को ही खारिज कर दिया जाता है या फिर हम उसके समर्थन में हैं तो इस कदर हैं कि हम इसकी आड़ में चल रही हिंसा, उपद्रव, झूठ, अराजकता को भी जस्टिफाई कर रहे हैं। राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडे, सिद्धार्थ वरदराजन जैसे कद्दावर पत्रकार ऐसी नाजुक स्थिति में जब गणतंत्र दिवस के दिन लालकिले को बंधक बनाने की होड़ हो तब आप हिंसा को आग देने झूठ फैला रहे हैं। जो आदमी ट्रैक्टर से दबकर मरा हो उसे आप पुलिस की गोली का शिकार बता रहे हों। हद है। आप ही ऐसा करेंगे तो शांति और संतुलन की बात कौन करेगा। सिद्धार्थ वरदराजन इस मामले में सफाई देते हुए कहते हैं कि मृतक के परिजनों ने आशंका जताई थी गोली लगने की, उसी आधार पर मैंने ट्वीट किया। गजब करते हैं साब। द हिंदू जैसे महान अखबार के मुख्य संपादक रहे हैं आप, क्या आशंका के आधार पर रिपोर्टिंग होती है ? पत्रकार आशंका को छांटने का काम करता है या आशंका के आधार पर प्रस्तुति देता है? इतने भोले और नासमझ तो नहीं आप। साब कैसे आप मुजरिम नहीं हैं इस मामले में? कोई एक वजह गिनाइए। पुलिस ने क्या गलत किया आपके खिलाफ मामला दर्ज करके? आपको तो तत्काल जेल में होना चाहिए। राजदीप सरदेसाई। देश के चोटी के पत्रकार। कितनी जल्दी रहती है आपको। कभी प्रणव मुखर्जी को मार देते हैं जीवित रहते भी तो कभी किसान की सामान्य मौत को पुलिस की गोली से मरना कहते हैं वो भी तब जब किसान आंदोलन उग्रता की सीमा लांघ रहा हो और पुलिस बंधक हो। क्या आप पत्रकारिता कर रहे हैं? क्यों न आपके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो? आपके खिलाफ टीवी टुडे नेटवर्क ने तुरंत एक्शन लेकर क्या गलत किया? पुलिस ने क्या गलत किया आपके खिलाफ मामला दर्ज करके?

रवीश कुमार को देखिए कि राजदीप सरदेसाई की मूर्खता को कैसे जस्टिफाई कर रहे हैं। वो लिखते हैं कि हां ये सही है कि राजदीप से गलती हुई है लेकिन तब्लीगी जमात से संबंधित रिपोर्टिंग में गोदी मीडिया के लोगों से भी गलतियां होती रही हैं, भ्रामक रिपोर्टिंग करते रहे हैं पत्रकार, तो उनपर केस तो दर्ज नही हुए। महान पुरस्कार मैगसायसाय की सांय-सांय तो न करिए साब। आपकी रिपोर्टिंग और एंकरिंग शैली का मैं भी प्रशंसक हूं। मतलब एक गलती को आप इसलिए नजरअंदाज करने की बात कर रहे हैं कि ऐसी गलतियां पूर्व में हुई हैं और वो भी उन पत्रकारों द्वारा जो आपकी विचारधारा के नहीं हैं। मतलब अगर कोई गलती करता है तो हमें भी गलती करने का हक है। और इसीलिए हमारी गलती भी उनकी तरह माफ होनी चाहिए। तो फिर आपने औऱ उनमें फर्क क्या बचा। क्यों झंडाबदार बनते हैं स्वस्थ और पारदर्शी पत्रकारिता के।

भाषायी हिंसा और झूठ, कुप्रचार, भ्रम फैलाने वालों की भीड़ सोशल मीडिया में इस कदर समाई हुई है कि मुझे अब यहां रहने से बेचैनी होने लगी थी और मैंने यहां से जाने का निर्णय लिया था। मुझे आश्चर्य होता कि 26 जनवरी को आंदोलन से उपजी हिंसा के लिए आप चुप हैं, तमाम सनसनीखेज भ्रम व झूठ फैलाने वालों के खिलाफ आप चुप हैं। ठीक है। लेकिन 300 से ऊपर जख्मी हुए पुलिस वालों के घाव भी आप नजरअंदाज कर गए। इसमें महिला पुलिस वाली भी हैं। अस्पताल में अब भी भर्ती हैं। ये भी किसी के परिजन हैं। दिल्ली में शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी इनके कंधों पर है। अभी भी घायल पुलिसवाले अस्पतालों में भर्ती हैं। आप इतने पक्षपाती कैसे हो सकते हैं। आपको पता है हजारों, लाखों किसानों के आंदोलनों के बीच एक और प्रदर्शन दिल्ली पुलिस ग्राउंड में 26 जनवरी के बाद हुआ। पर वो इतना छोटा था किसान आंदोलन के एवज में कि आप तक आवाज न पहुंची। जी हां ये आंदोलन दिल्ली पुलिस के परिवार वालों व परिजनों का था। दिल्ली पुलिस में कार्यरत पुलिस वालों के बच्चों व पत्नियों, मांओं का था। उन्होंने कहा था कि जान हंथेली पर रखकर हमारे घर वाले आप सबको सुरक्षा देते हैं और आप उन्हें तलवारों से कटने दे रहे हैं, पिटने दे रहे हैं। लालकिले के उपद्रव के दौरान दो महिला सिपाही अपनी आपबीती बताती हैं तो रो देती हैं, कहती हैं कि उपद्रव के दौरान वो व्यवस्था संभालते एक ग्रिल के नीचे दब गईं, आंदोलनकारी किसानों ने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की बल्कि रौंद रौंदकर निकलते रहे, उन्होंने कहा कि ऐसा लगा कि ये हमारे जीवन का अंतिम दिन न हो। एक पुलिस वाले ने कहा कि किसान को उपद्रव से रोका तो तलवार मेरे सिर पर मारी, सिर पर हेलमेट के दो टुकड़े हो गए, और अगर हेलमेट न होता तो क्या होता।

सत्ता व सरकारें सरकारी मशीनरी, पुलिस, प्रशासन का अपने हिसाब से उपयोग करती हैं ये सच है, पर पुलिस वाले जानबूझकर खुद को काटपीटकर या घायल करके अस्पतालों में पहुंच जाएं। इतना तो नहीं होता न….? ये कैसा समाज निर्मित होता जा रहा है। जहां हजारों करोड़ों के निवेश से फल फूल रहे आंदोलन में शामिल लोगों के प्रति आपके मन में दर्द है लेकिन 2 महीने से घर नहीं जा रहे दिल्ली पुलिस के थके हारे, घायल जवानों के प्रति कोई संवेदना व दया नहीं। ( किसान आंदोलन के चलते दिल्ली पुलिस की छुट्टियां रद्द हैं)।

लोगों को अशांति और अव्यवस्था फैलाने की इतनी हड़बड़ी है कि पूछिए मत, और ये वो लोग हैं जिन्हें लाखों लोग पढ़ते हैं। मतलब इनके भ्रम व झूठ के सहारे कितनी अराजकता फैलती होगी। इन्हें एहसास नहीं, बावजूद ये इंसानियत के स्व-घोषित प्रारंभिक सिपाही बने बैठे हैं। एक छोटा सा नमूना देखिए। पिछले दिनों एक व्यक्ति किसान आंदोलन से पकड़ा गया, किसानों ने उसे पुलिस को सौंपा, उसने बयान दिया कि वो एक शूटर है, जिसे राई थाने के एसएचओ प्रदीप ने किसानों के बीच भेजा था 26 जनवरी से ठीक पहले। ताकि जब 26 को आंदोलन हो तो वो किसानों की तरफ से फायरिंग करे, हिंसा बढ़े तो किसानों का नाम हो। मामला सामने आते ही किसान आंदोलन के झंडाबादारों ने इस व्यक्ति के वीडियो बयान को लेकर शुरू कर दिया शांति फैलाना कि देखिए अमुख व्यक्ति को केंद्र सरकार ने भेजा था, केंद्र सरकार ने एक शूटर किसानों के अंदर भेज दिया जो हिंसा फैलाता। सरकार बेनकाब हुई और न जाने क्या क्या। और जब छानबीन हुई तो पता लगा कि उस व्यक्ति को किसानों ने ही पीट पीटकर अधमरा कर दिया था और जबरन ये वीडियो बनवाया था. और वीडियो इतना झूठा था कि राई थाना जो हरियाणा में है वहां जब जांच की गई तो प्रदीप नाम का कोई एसएचओ है ही नहीं और आरोपी व्यक्ति एसएचओ को शक्ल से भी नहीं पहचानता। फिर आरोपी ने बयान जारी किया कि किसानों ने उसे ये झूठ बोलने और वीडियो जारी करने के लिए कहा था। लेकिन इस झूठ को फैलाने की इतनी जल्दी थी इंसानियत के सिपाहियों में कि करोड़ों लोगों के लिए आज भी यही सच है कि भाजपा सरकार ने किसानों के बीच हिंसा फैलाने के लिए अपना एक शूटर भेजा था। क्योंकि इंसानियत के सिपाहियों ने अपनी गलती स्वीकारी नहीं और जो असली बयान फिर शूटर ने दिया कि किसान ही खिलाड़ी हैं, वो सब लोगों ने देखा हो ये बहुत संभव नहीं। तो ऐसे झूठ फैलता है। दुखद ये है कि ऐसे झूठ औऱ भ्रम फैलाने के काम वो लोग कर रहे हैं जिन्हें हम पत्रकार, प्रोफेसर, साहित्यकार, लेखक यानि की समाज के प्रबुद्धवर्ग से जोड़ते हैं। ये बहुत दुख की बात है।

28-30 साल का एक लड़का। जिस पर पुलिस ने धारा 186, 323 व 353 के तहत मामला दर्ज किया है। जिस पर पुलिस के काम में दखल, पुलिस से अभद्रता जैसे संगीन मामले हैं, उसे आप भगत सिंह बनाने में अमादा हैं। पुलिस ने अंडरटेकिंग ली है इनसे (इसके साथ गिरफ्तार दूसरे लड़के से) कि आप दोबारा सरकारी काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। अंडर टेकिंग समझते हैं, मतलब जब पुलिस तंग आ जाती है किसी असामाजिक तत्व से।  ये भगत सिंह लगते हैं आपको। मैंने इस लड़के की थोड़ी रिसर्च की। ये कहते हैं कि जो इनके पक्ष में नहीं है उनको ये देख लेंगे, उनको ये पीला मुतवाएंगे। ये भाषा है। खुलेतौर पर सोशल मीडिया में लिख रहे हैं कि पुलिस दंगा करवा रही है, दंगाइयों से मिली हुई है। मौके पर पुलिस वाले से भिड़ रहे हैं, पुलिस जो कर रही है उस पर कह रहे हैं ऐसा क्यों कर रहे हो।

पत्रकार के भी अपने संस्कार, मैनरिज्म, नैतिकता, सीमाएं, भाषा और व्यवहार है। सीखना होगा। मीडिया लॉ है। पढ़ना होगा। जहां पर लॉ एन आर्डर संभाला जा रहा है, जहां पर पुलिसिया एक्शन हो रहा है, उच्च स्तरीय बैठकों पर बैठकें शांति या व्यवस्था बनाए रखने के लिए चल रही हैं, जो मुद्दा देश का प्रमुख मुद्दा बन गया हो। उस पर कुछ भी तो नहीं बोल सकते, बहुत गैरजिम्मेदाराना तरीके से पत्रकारिता के नाम पर नहीं प्रस्तुत हो सकते। बहुत कुछ है कहने को समझने वाले समझते हैं। पत्रकारिता के भी एथिक्स हैं। माना कि सरकारें, प्रशासन, पुलिस ताकत का दुरुपयोग करते हैं पर कुछ मामलों में हमें फिर से स्वस्थ पत्रकारिता पर भी विश्लेषण करना होगा। आप क्या वाकई पत्रकारिता कर रहे हैं या फिर मूलरूप से आंदोनकारी या उनके समर्थक हैं और पत्रकारिता का चोला पहनकर घूम रहे हैं। ऐसी हरकतें पत्रकार नहीं करेगा, वरना दो महीने में कुछ नहीं तो तकरीबन कुछ तो भगत सिंह सामने आते। ये मामला पत्रकारिता का नहीं है, ये मामला कुछ और ही है। अब या तो यही पत्रकार है पूरी दिल्ली में या फिर पूरी दिल्ली में शेष पत्रकार ही पत्रकार है ये वाकई पत्रकार नहीं है। अजीत अंजुम भी तो घूम ही रहे हैं। दिग्गज पत्रकार हैं, सरकार के एकदम खिलाफ खड़े हैं, किसानों की एक एक बात दमदारी से रख रहे हैं। पहले दिन से आखिरी दिन तक डटे हैं। उन पर तो कोई धारा नहीं लगी, वो भी स्वतंत्र पत्रकार हैं। वो भी सत्ता से दो दो हाथ करती रिपोर्टिंग कर रहे हैं। क्यों। थोड़ा विश्लेषण करिए। आग होनी चाहिए पर आग का उपयोग कैसे करना है इसकी समझ होनी चाहिए वरना आग से भूख भी मिटती है और घर भी जलते हैं।

दरअसल समाज इतना संकुचित औऱ संकीर्ण हो चुका है, भाषायी हिंसा का स्तर इस कदर बढ़ गया है, मुद्दों को लेकर विचारधारा इतनी विध्वंशक हो गई है कि हम अपने अपने छदम नायक गढ़ने में व्यस्त हैं। इससे पहले भी कई युवा नायक गढ़े गए, मैं नाम नहीं लेना चाहता बस इतना संकेत करूंगा उनमें से एक वो है जो संवैधानिक पदों की गरिमा नहीं समझता और हर दूसरे दिन ट्वीट करके राष्ट्रपति को अभद्र लिखता है। ये व्यक्ति भी एक टोली का नायाब नायक है। तो फिर नायकों की चयन समिति व चयन प्रक्रिया के बारे में क्या ही कहा जाए। भाषायी संवेदनशीलता तो जाती रही। बहुत आदर के साथ जिन्हें मैं देखता था वो इतनी गिरी हुई भाषा का उपयोग करते हैं कि मैं निराश हो जाता हूं। आलोचना की भी एक स्वस्थ भाषा है। प्रधानमंत्री तेली है, गपोड़ है, मक्कार है, हरामी है, सुप्रीमकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश टुच्चा है। ये भाषा है हमारे शीर्ष पत्रकारों की जिन्हें हम अपना अगुवा समझते रहे।

दिल्ली की सीमाओं पर जो सख्त बंदोबस्त हैं उसपर जो चटखारे लिए जा रहे हैं वो चिंतनीय हैं। इसको दूसरी दृष्टि से देखें तो आप पाएंगे कि ये कैसा माहौल बन पड़ा है कि दिल्ली को एलओसी सरीखी सुरक्षा में कैद किया जा रहा। पुलिस का काम है व्यवस्था बनाना, अपने नागरिकों को सुरक्षा की गारंटी देना। सड़कों पर कंक्रीट की दीवारें और ठुक रही कीलें जिन पर आप हंस रहे हैं उनपर आपको रोना चाहिए कि एक शांति पूर्ण आंदोलन को आप जैसे ही लोग किन स्थितियों में ले आए कि आज दिल्ली और उसके नागरिकों को सुरक्षित रखने के लिए पुलिस को इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। ये सब क्यों हो रहा है क्योंकि हिंसा और उपद्रव का पूर्व अनुमान है खुफिया एजेंसियों को, ये कंटीले तार, ये सड़क पर ठुंकी बड़ी बड़ी कीलें और हजारों में तैनात फौज… ये हार है किसान आंदोलन की, ये नाकाफी है किसानों की… ये गिरती गरिमा है अन्नदाताओं की…. सामान्य सड़कों पर ठुंकी ये कीलें, कंक्रीट की दीवारें सबूत हैं कि आपने भरोसे को तोड़ा है (26 जनवरी को).. हम दोबारा भरोसा करने का रिस्क नहीं ले सकते…..

( ये पूरा मामला मुझे सेरोटोनिन का लगता है, सेरोटोनिन दरअसल एक हार्मोन है, जिसे फीलगुड हार्मोन बुलाते हैं। इस हार्मोन की खासियत ये है कि इसकी जब शरीर में अधिकता हो जाती है तो हमें कोई चीज अच्छी लगती है तो इतनी अच्छी लगती है कि हम उसकी खामियों को भी जस्टिफाई करते चलते हैं । वही आजकल हो रहा है जिन्हें मोदी जी से प्रेम है, उन्हें आंदोलन की सार्थकता और वजूद से भी मतलब नहीं और जिन्हें किसान आंदोलन में दिलचस्पी है वो इस कदर है कि वो आंदोलनकारियों के सौ खून माफ करते चल रहे हैं औऱ पुलिस के घाव उन्हें टोमैटो कैचप दिखते हैं)

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