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नया काव्य संग्रहः चालीस पार की औऱत

कलावंती
काव्य संग्रह चालीस पार की औरतें

झारखंड रांची से कलावंती सिंह साहित्य जगत में लम्बे अरसे से सक्रिय हैं, वैसे मूलरूप से उनकी पहचान साहित्य समीक्षक की रही है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में वो अक्सर किताबों की समीक्षाएं लिखती रही हैं। लेकिन इसके अलावा वो खुद भी एक अच्छी रचनाकार हैं ये पक्ष खुलकर सामने नहीं आया। कारण वो समय समय पर कविताएं तो लिखती रहीं और उनका लिखा पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होता रहा पर उन्होंने इनका संकलन कर किसी संग्रह के रूप में प्रकाशित नहीं करवाया। लेकिन अब कलावंती जी की कविताओं का संकलन एक किताब में रूप में पाठकों के सामने है। नाम है चालीस पार की औरत। किताब को प्रकाशित किया है बोधि प्रकाशन ने। कलावंती जी की रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी हुआ है। आकाशवाणी रांची के लिए धारावाहिक का निर्माण भी आपने किया है, वर्तमान में भारतीय रेलवे में सेवाएं दे रही हैं। उनके काव्य संग्रह से कुछ कविताएं-

 

कलावंती सिंह

चालीस पार की औरत- एक

किसी बरसात की घनघोर बारिशवाली रात,

एक चालीस पार की औरत

भीगती हुई थरथराती है।

कुछ अघोरी आवाज़ें,

हर वक़्त उसका पीछा करती हैं।

यह बरगद की जटा पकड़कर

झुलनेवाली डायनों की आवाज़ें हैं।

वे हर अमावस की रात,

बरगद की जड़ें पकड़कर

खेलती हैं छुआ – छुई का खेल।

चालीस पार की औरत को लगता है,

ठीक बरगद की तरह ही ठहर गई है

उसकी ज़िंदगी भी।

वे जहां हैं, वहाँ से हिल भी नहीं सकतीं।

कभी कभी उन्हें लगता है

बरगद की झूलती हुई जड़ें,

उनके ही खुले हुए केश हैं।

रातभर अपनी ही चिंताओं और कुंठाओं के साथ

वे ही उनमें झूलती हैं।

 

चालीस पार की औरत – दो

 कभी कभी बड़ी खतरनाक होती है

ये चालीस पार की औरत

वह तुम्हें ठीक- ठीक पहचानती है

जिसे

तुम नहीं पढ़ा सकते,

चालीस का पहाड़ा

क्योंकि वह खुद को भी अच्छी तरह पहचानती है ।

वह समझती है जीवन का ऊँच- नीच

जानती है कहाँ लपेटेंगे उसे पंक –कीच।

वह तुम्हारे छल पहचानती है

और हँसती है एक निच्छल हंसी।

वह घूमती है तीनों लोकों में

तीनों युगों में – त्रेता, द्वापर , कलयुग

बचाए रहती है अपने हिस्से का सतयुग

वह पानी पिला भी सकती है

और पानी उतार भी सकती है

चालीस पार की औरत के पास होती है सत्ता

उसके अपने संविधान के साथ

 

मासूमियत

मासूमियत

सबको अच्छी लगती है ।

पर कौन खड़ा होना चाहता है

मासूमियत की रक्षा के लिए

हाशिये पर लिखी समीक्षा के लिए ।

इसलिए अपनी मासूमियत बचाने के लिए

कभी कभी शातिर होना पड़ता है मेरे दोस्त ।

ठोंक-पीट बजा के देखा है ज़िंदगी को

बजता है ठीक से तभी

जब अंदर हो कुछ ,

वरना तो यूं ही उड़ जाता है

हल्के बादलों सा इधर –उधर ।

अच्छी और अच्छी के लालच में

छूटती जाती हैं –

जीवन की सभी अच्छी चीजें

मासूमियत भी ।

 

दुख और सुख

चमकीले नगीनों की तरह पड़े रहते हैं

दुख और सुख मेरे सामने

मैं हमेशा दुख उठा लाती हूँ अनजाने नहीं

जान- बूझकर

कभी नहीं हो पाती दुनियादार

थोड़े प्यार के बदले में

दे आती हूँ ढेरों अधिकार

कुछ भी चुनने की स्वतन्त्रता है

पर ताप उठा लाती हूँ  शीत के बजाय

पूर्णिमा के बदले चुनती हूँ अमावस

छूटता है पावस

पड़ा रहता है काँच और हीरा पास – पास

हमेशा काँच उठा लेती हूँ

कुछ अलग सा दिखने की जिद है क्या यह ?

या हर पत्थर को हीरा बना लेने का आत्मविश्वास ।

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