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रक्षित सिंह की क्रांति के मायने

रक्षित सिंह

एडिटर अटैकः डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

रक्षित सिंह से संबंधित खबर

रक्षित सिंहः रक्षित एबीपी न्यूज के पत्रकार थे जिन्होंने अभी कुछ सप्ताह पहले ही किसान आंदोलन मेरठ की सभा में मंच पर चढ़कर भाषण देते हुए ये कहकर इस्तीफा दिया कि उनसे किसान आंदोलन की एकपक्षीय रिपोर्टिंग के लिए कहा गया था। किसानों का पक्ष न दिखाने की बात कही गई थी चैनल द्वारा। साथ ही वो कहते हैं कि उनसे कहा गया था कि जल्दी जाओ और दिखाओ कि किसान आंदोलन में कम भीड़ रही। बगैरह बगैरह। उन्होंने बाकायदा किसान सभा के मंच से चैनल की आईडी दिखाते हुए कहा कि नहीं करनी ऐसी पत्रकारिता, उन्होंने मंच से ये भी जिक्र किया कि उन्हें 12 लाख रुपए साल का पैकेज है चैनल में, जिसे वो ठुकराते हैं। उन्होंने मंच से कहा कि मैं ऐसी पत्रकारिता नहीं सकता। हो सकता है कि मेरे बच्चे भूंखों मरें क्योंकि पत्रकारिता के सिवा उनसे कुछ आता नहीं और उनके पास आय़ का दूसरा साधन नहीं, लेकिन जमीर मारकर वो पत्रकारिता नहीं करना चाहते। रक्षित ने अपने पूर्व संस्थानों से जुड़े दस्तावेजों को भी भाषण देते हुए दिखाया और कहा कि अबतक उन्होंने अपने मन मुताबिक काम किया, लेकिन बीते कुछ महीनों से वो मन मारकर काम कर रहे थे, अब बरदाश्त से बाहर है।

पूरे घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया से लेकर मुख्य धारा के पत्रकारों के बीच इस मुद्दे की काफी चर्चा हुई। ज्यादातर ने रक्षित के फैसले की सराहना की, बहुत कम लोगों ने सवाल खड़े किए। जिन लोगों ने सवाल खड़े किए उसका नतीजा ये हुआ कि रक्षित को कई बार इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ी और उन्होंने वही सब दोहराया जो मंच से कहा था, उन्होंने कहा कि मैं आखिरकार पत्रकारिता ही करूंगा, मुझे इसके सिवा आता क्या है। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि मैंने अपने चैनल के लिए ( एबीपी जिसमें वो काम करते थे) ही ये बात नहीं की कि मीडिया में नैतिकता नहीं बची, ये समग्र मीडिया के लिए था। जैसे मानों वो अब एबीपी न्यूज के लिए अपना बयान पढ़ रहे थे किसी के दबाव में। खैर मुद्दे पर आते हैं। आपको कुछ पढ़वाते हैं।

पत्रकारिता के प्रथम पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी का बयान-

यहां भी अब बहुत से समाचार पत्र सर्व साधारण के कल्याण के लिए नहीं रहे, सर्वसाधारण उनके प्रयोग की वस्तु बनते जा रहे हैं। एक समय था, इस देश में साधारण आदमी, सर्व साधारण के हितार्थ एक ऊंचा भाव लेकर पत्र निकालता था औऱ उस पत्र को जीवन क्षेत्र में स्थान मिल जाया करता थ। आज वैसा नही हो सकता। इस देश में भी समाचार पत्रों का आधार धन हो रहा है। धन से ही वे निकलते हैं, धन के ही आधार पर वे चलते हैं और बड़ी वेदना के साथ कहना पड़ रहा है कि उसमें काम करने वाले बहुत से पत्रकार भी धन की ही अभ्यर्थना करते हैं।

( विष्णुदत्त शुक्ल की पुस्तक पत्रकार कला की भूमिका से साभार उद्धृत)

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गणेश शंकर विद्यार्थी 26 अक्टूबर 1890 को जन्में थे औऱ 25 मार्च 1931 को मर गए थे। यानि की ये स्वतंत्रता पूर्व की ही बात है और निश्चित है 1931 से काफी पहले कही हो। मेरे कहने का आशय महज इतना है कि पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी स्वतंत्रा पूर्व की पत्रकारिता, पत्रकार व पत्रकारिता माध्यमों के बारे में जो कुछ कह रहे हैं वो कितना गंभीर है। अब उस दौर में ही पत्रकारिता, पत्रकार व पत्रकारिता माध्यम व्यावसायिक, नैतिक शून्य, उद्देश्य हीन हो गए थे, तो आज की मीडिया के बारे में हम क्या बात करें। क्यों हम मान के चलें कि कोई पत्रकार, कोई अखबार, कोई चैनल जनहित की बात करेगा, आम आदमी को प्राथमिकता देगा, सच का साथ देगा, झूठ का पर्दाफाश करेगा। क्यों। चम्बल मूल के पत्रकार आलोक तोमर की पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह यादों में आलोक कार्य़क्रम में बोलते हुए एक बार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने बहुत अच्छी बात कही थी.. कि अमूमन बड़े अस्पताल क्या कोई डॉक्टर खोलता है?  बड़े बड़े कॉलेज-स्कूल की श्रृंखला क्या कोई शिक्षक खोलता है?  ऐसे ही क्या बड़े-बड़े चैनल व अखबार कोई पत्रकार खोलता है या खोल सकता है? कुव्वत है?  नहीं। ये सब उद्योगपति करते हैं। वो धनवान हैं। बहुत धन लगता है अखबार व चैनल खोलने में। उद्योगपति धन लगाता है। चूंकि वो उद्योगपति है तो वो चैनल व अखबार खोलकर पत्रकारिता क्यों करेगा, निश्चित है वो अखबार व चैनल खोलकर उद्योग करेगा, जो निवेश किया है उसका कई गुना करके लाभ अर्जित करेगा। उसे पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं है।

तो एक उद्योगपति के उद्योग ( अखबार व चैनल) में काम करने वाले नौकर (पत्रकार) और दर्शक या पाठक क्यों ऐसी उम्मीद बांधे कि ये वो दिखाए या पत्रकार बोले कि दिखाने या लिखने दे जो सच हो। अरे भाई वो तो वही करेगा न जिससे उसे धन लाभ हो। सच दिखाने के चक्कर में और आपकी क्रांतिकारी पत्रकारिता की तुष्टिकरण के चक्कर में वो सरकारों से मिलने वाले करोड़ों के विज्ञापनों का नुकसान कर ले। अमा यार आप भी हद करते हैं। रक्षित सिंह को इस पूरे इस्तीफा प्रकरण में मैं एक मासूम या भावनाओं में बह गया प्राणी मानता हूं। काहे का पत्रकार, कैसा पत्रकार औऱ कैसी पत्रकारिता? साहब आप एक बिजनेस मैन के बिजनेस में नौकरी करते हैं, तनख्वाह लीजिए और उसकी नौकरी बजाइए। किसान आंदोलन को कई माह होने को हैं, भारत में इकलौते आप ही पत्रकार हैं जिसका जमीर जाग गया? और सबके जमीर मरे हुए हैं? अरे किसी का तो जगा होगा, पर ये क्रांति मंच पर चढ़कर औऱ किसी ने नहीं की न…? आपको भी नहीं करनी थी। ये चैनल, ये अखबार आज नंगे नहीं हुए। गणेश शंकर विद्यार्थी का कोट फिर से पढ़ लीजिए। जमीर वाले लोगों के लिए पत्रकारिता है नहीं साब। वो पत्रकारिता तो विद्यार्थी जी के जमाने में ही चुकने लगी थी। जो उन्होंने साफ लिखा है।

आप गलत इस पेशे में आए। कोई अरुण पुरी, कोई सुभाष चंद्रा, कोई रूपर्ड मर्डोक, कोई अंबानी, कोई रामोजी राव, कोई अग्रवाल, कोई गुप्ता, कोई चोपड़ा, कोई गोयनका, कोई भरतिया, अरबों अरब लगाकर आपके जमीर के लिए काम करेगा?  हद करते हो साब। खेती करो, फसल उगाओ, अब तो ऑर्गेनिक का जमाना है, उसे उगाओ। मैं भी उगा रहा हूं। जमीर रखते हो तो अखबार चैनलों में मत आओ। और पत्रकारिता का ही कीड़ा है तो अपना साप्ताहिक पाक्षिक अखबार डाल दो या अपना पोर्टल वहां जमीर जगाओ। मैं भी जगा लेता हूं इस प्रकार से मीडिया मिरर में। आपने जो क्रांति जमीर के चक्कर में कर डाली है और अपने खुद के संस्थान ( जहां से आपका परिवार चलता था, एबीपी न्यूज) की लानत मलानत की है, उससे मुख्यधारा के चैनलों के लिए तो अब साहब तुम अछूत बन गए। क्रांति के चक्कर में रोटी पर लात जरूर मार दी आपने, हां रवीश जैसे कुछ महान पत्रकारों की प्रशंसा के दो शब्द जरूर मिल गए जो खुद करोड़ों के पैकेज में काम कर रहे हैं और आपको उन्हीं से सीखना चाहिए कि वो स्वयं कभी एनडीटीवी चैनल की नीतियों के खिलाफ नहीं गए। इसलिए आप जहां काम करें, जहां से रोटी चले वहां झंडा बुलंद करना मतलब समझ ही गए होंगे।

( एडिटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है)

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