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पिंजरा, प्रेम और प्रतिरोध संग्रह से निवेदिता की कविताएं

निवेदिता सिंह, पत्रकार-लेखक

लखनऊ की रहने वाली निवेदिता सिंह गत 21 वर्षों से स्वतंत्र लेखन कार्य़ कर रही हैं। स्त्री विमर्श पर अक्सर सोशल मीडिया पर मुखर रहती हैं। हाल ही में उनका कविता संग्रह पिंजरा, प्रेम औऱ प्रतिरोध प्रकाशित हुआ है। उसी संग्रह से कुछ कविताएं यहां प्रस्तुत हैं।

 

आवारा लड़कियों तुम बहुत प्यारी लगती हो

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सुनो थोड़ी बुरी लड़कियों

तुम बहुत प्यारी लगती हो

जब ज़माने की फ़िक्र किये बिना

खिलखिलाकर हँसती हो

और रख देती हो लाज और शर्म

रसोई से लगे नून तेल के लिए बने ताक़ पर…

 

सुनो थोड़ी ज़िद्दी लड़कियों

तुम बहुत प्यारी लगती हो

जब चुनती हो काँटों भरी अपनी राह

सोने के पिंजरे की परवाह किये बिना

और उड़ती हो दूर गगन में

जीती हो ज़िंदगी अपनी शर्तों के साथ…

 

सुनो थोड़ी आवारा लड़कियों

तुम बहुत प्यारी लगती हो

जब खुलेआम प्यार का इज़हार कर बैठती हो

प्रेमी की पहल का इंतेज़ार किये बिना

और प्रेम में ठुकरा दिए जाने पर आत्महत्या न करके

फैसला करती हो ज़िंदगी में आगे बढ़ने का…

 

सुनो थोड़ी मनमौजी लड़कियों

तुम बहुत प्यारी लगती हो

जब तुम किसी और के चाहे जाने से पहले

ख़ुद से प्रेम करना सीख जाती हो

और अपने आत्मविश्वास के बल पर

रचने निकलती हो नया इतिहास

 

सुनो बेहद प्यारी लड़कियों

तुम बहुत प्यारी लगती हो

जब ढूँढती हो ज़िंदगी में मिठास

चखकर अनुभवों का कड़वा स्वाद

और निकाल लेती हो जीने की कोई नई वजह

भूलकर सारी बुरी बात….

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औरतें इश्क़ बोती हैं

 

औरतें इश्क़ बोती हैं

सींचती हैं उसे

प्रेम और चाहत की खाद से

वही इश्क़ जवान होते ही

बेच दिया जाता है

समाज के ठेकेदारों द्वारा

धर्म, जाति, बिरादरी

और सरहद की मंडी में

 

औरतें नदी होती हैं

भरी होती हैं गले तक लबालब पानी से

जिसका अपना कोई रंग नहीं होता

इसलिए फिर से चढ़ा लेती हैं

प्रेम की नई परत अपने ऊपर

और बहती हैं उसी प्रवाह से

पूरा करने को अपने सभी

पारिवारिक और सामाजिक दायित्व

 

औरतें कुआँ होती हैं

समा लेती हैं सब दर्द अपने भीतर

उठाकर रख देती हैं

अपनी सभी चाहनाएँ ताखे पर

और जब कभी कमज़ोर पड़ती हैं

दिल में उग आए एहसास से

चख लेती हैं थोड़ी सी

पुरानी याद सबसे छुपाकर

 

औरतें मज़दूर होती हैं

जोड़ती है एक-एक ईंट

किसी का महल बनाने के लिए

और सो जाती हैं ख़ुद

सड़क किनारे किसी झोपड़ी में

आहुति देकर अपने मोहब्बत की

समर्पित कर देती हैं ख़ुद को

पति रूपी नए प्रेमी को…

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स्त्रियाँ तर्क करना नहीं जानती

कुछ स्त्रियाँ काजल को ही अपना ख़्वाब समझ

आँखों में सजा लेती हैं बड़े क़रीने से

देखती हैं पति और बच्चों के लिए हज़ारों सपने

और उन्हें पूरा करने के लिए करती हैं

ज़िंदगी से हर रोज़ कई समझौते

जिससे बना रहता है भ्रम सुखद दाम्पत्य का…

 

कुछ स्त्रियाँ गोल-गोल रोटियों को ही अपनी दुनिया मान

याद करती हैं विज्ञान की किताबों को

जिसमें पढ़ा था कभी बचपन में कि दुनिया गोल है

नापती हैं चाँद, तारे  और धरती की गोलाई अपनी गोल रोटियों से

और इतराती हैं अपनी पाक कला की कुशलता पर

जो रास्ता है पति के दिल तक पहुँचने का…

 

कुछ स्त्रियाँ प्रेम और बेबसी के अंतर को नहीं समझती

अपनी लाचारी को प्रेम के पतीले में पगाकर

पति को सौंप देती हैं अपने शरीर के साथ साथ

अपनी इच्छाएँ और अपना मन भी

और बदले में पा लेती हैं अपने मालिक रूपी पति से

कभी मीठे दो बोल मनपसंद साड़ी और ज़ेवर के साथ…

 

कुछ स्त्रियाँ तर्क करना नहीं जानती

निभाती हैं हर परम्परा बिना किसी सवाल के

जिससे स्थापित कर सकें वह ख़ुद को

अच्छी बेटी, पत्नी, बहू और माँ के रूप में

और खो बैठती हैं अपना वास्तविक अस्तित्व और स्वाभिमान

जो किसी भी रिश्ते से पहले आता है….

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तुम्हारा भेजा हुआ चुम्बन….

बादलों ने तुम्हारा दुःख समेटा

बारिश की बूँदों ने तुम्हारा प्रेम

और बरस पड़ा सावन बनकर

घर के आँगन में,गली और चौबारे में,

पेड़ों की टहनियों पर, फूलों और कलियों पर

पर मैं जानती हूँ ये तुम्हारा भेजा हुआ

वो चुम्बन है जो मैं छोड़ आयी थी

तुम्हारे माथे पर पिछली मुलाक़ात में

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मौन प्रेम

न मिलता प्रेम तुम्हारी बातों में

न तुम्हारी आँखों में

तुम्हारी पोटली की भी तलाशी ली मैंने

पर प्रेम वहाँ से भी नदारद रहा

कई बार तुम्हारी शर्ट की जेब पर पहरा बिठाया

पर प्रेम वहाँ भी न नज़र आया

थक हारकर मैंने समझा लिया ख़ुद को

प्रेम एक ख़्याल मात्र ही तो है

राज और सिमरन वाला प्यार असल ज़िन्दगी में कहाँ होता है

असल प्यार तो छुपा होता है

उस फ़िक्र में जब रातभर जागकर

कोई सुलाता है बीमार साथी को

उस दुआ में जब दवा जवाब दे देती है

किसी अपने को वापस ज़िंदगी में लाने में

उस सुबह में जब नींद में चूर होने पर भी

कोई घोल देता है मिठास एक प्याली चाय में

उस शाम में जब काम से थककर लौटने पर

कोई खड़ा मिलता है दरवाज़े पर इन्तेज़ार में

उस बुरे वक़्त में जब ज़माना छोड़ देता है साथ

कोई चट्टान बन हौंसला देता है तूफ़ान के थम जाने का

उस बुढ़ापे में जब सताता है अकेलापन

और कोई धीरे से आकर थाम लेता है झुर्रियों वाला हाथ

शायद हमारा प्रेम भी ऐसा ही है

जो शब्दों से ज़्यादा मौन में परिभाषित होता है…

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तुम्हारी चोरी….

जितनी बार भी तुमसे मिलती हूँ

तुम्हारी नज़रों से बचाते हुए

तुम्हें थोड़ा सा चुराकर अपनी पर्स में डाल लेती हूँ

कभी तुम्हारे होठों की वो हँसी

जिसमें बच्चों सी मासूमियत झलकती है

तो कभी तुम्हारे सिगरेट के धुँए की महक

जो कॉफ़ी पीने के बाद भी घुली रह जाती है

तुम्हारी साँसों में

तुम्हारा दर्द छुपाने का हुनर भी

धीरे से चोरी कर लेती हूँ कभी कभी

जब तुम आँखें नीचे करके

अपना चश्मा साफ़ करने का बहाना करते हो

और पी लेते हो आँसू का एक क़तरा सबसे छुपकर

तुम्हें बताया नहीं मैंने कभी

पर मैंने तुम्हारा झूठ बोलने का वो अंदाज़ भी

चुरा लिया था एक दिन

जब तुम्हारा बटुआ ख़ाली था और तुमने पेट दर्द का बहाना कर मना कर दिया था उस मँहगे पाँच सितारा होटल में जाने से

क्या क्या बताऊँ तुम्हें

पर यह सच है मेरा पर्स तुम्हारी चोरी की हुई चीज़ों से भरा पड़ा है

जिसे मैं तुम्हें कभी वापस नहीं करने वाली…

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कसक

रिश्तों के चूल्हे पर

प्रेम की गरमाहटें नहीं मिलतीं

स्नेह की आँच में पकी सोंधी ख़ुश्बू वाली

अब रोटियाँ नहीं मिलतीं

 

बिकने लगे हैं खिलौने शहर में

गली के हर मोड़ पर

पर लाख ढूँढने से भी उनमें

वो बचपन की निशानियाँ नहीं मिलतीं

 

छोटे छोटे बच्चों की आँखों मे

बड़े बड़े सपने पलने लगे हैं

पर मीठी बातों से दिल जीतने वाली

वो मासूमियतें नहीं मिलतीं

 

चारपाई पर अकेला बैठा पिता

बेटों की कामयाबी के क़िस्से सुनाता है

पर हाथों में उसके दुआओं वाली

वो भभूत नहीं मिलतीं

 

ज़माने के साथ चलने की चाह में

दादी-काकी हिसाब-किताब में पक्की हो गयी है

पर पोटली में उनकी बच्चों के लिए

अब वो कहानियाँ नहीं मिलतीं..

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मौन

 

आज मैं मौन हूँ

तुम जितना चाहो मेरे ऊपर वार कर सकते हो..

मेरे जिस्म से लगी फुनगियों और पत्तियों को मुझसे अलग कर सकते हो..

मेरी पीठ पर उग आए फूलों को नष्ट कर सकते हो..

मेरे गर्भ में पल रहे फलों को पल भर में गिरा सकते हो..

क्योंकि तुमने मेरे दर्द को कभी महसूस नहीं किया है..

क्योंकि तुमने सीखी ही नहीं है मौन की भाषा..

मौन को समझना पड़ता है दिल की गहराइयों से..

पर तुम तो विकास पुरुष हो

तुमने सिर्फ़ दिमाग़ को इस्तेमाल करना सीखा है

दिमाग़ के सामने छोटे से नाज़ुक से दिल की भला क्या बिसात..

पर ज़रा रुकना, पल दो पल सोचना

क्या सचमुच यह तुम्हारी जीत है..

क्या मेरी मौत ही एकमात्र विकल्प है जिससे तुम्हारे विकास के रथ का पहिया घूमेगा…

क्या सचमुच तुम सिर्फ़ मेरा विनाश कर रहे हो

नहीं..बिल्कुल नहीं…

मेरे विनाश के साथ ही तुम बेघर कर रहे हो उन तमाम जानवरों को

जिनसे तुम्हारी जान को ख़तरा है..

और इस तरह तुम खुला आमंत्रण दे रहे हो उन्हें अपने घर की ओर..

तुम छीन रहे हो लाखों घोंसले जिनमें किसी पक्षी ने अभी अभी नया जीवन पाया है..

और जिनकी माएँ निश्चिंतता के साथ निकली हैं अपने बच्चे के लिए दाना चुगने…

मुझे बर्बाद करने के साथ ही तुम घोल रहे हो वातावरण में वो ज़हर

जिसे तुम्हारी आने वाली पीढ़ियाँ विष की तरह पियेंगी..

और कोसेंगी तुम्हें उनका पूर्वज होने पर..

तुम मेरे मौन को मेरी कमज़ोरी मान बैठे हो

पर याद रखना मेरा चीत्कार मेरे न रहने के वर्षों बाद

तुम्हारे कानों में शीशा बनकर पिघलेगा

और तुम्हारे पास पछताने के सिवा कुछ न बचेगा

क्योंकि जंगल की मार बहुत देर और बहुत तेज़ असर करती है..

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मेरा बचपन

एक बचपन था एक पालना था…

आँखों में पलता ढेर सारा सपना था..

गुड़िया और गुड्डा थे गिल्ली और डंडा था…

उड़ती पतंगे थीं खुला आसमां था..

सावन का महीना था पेड़ों पर झूला था..

घर में पकते पकवानों से हर रिश्ता मीठा था..

क़ाग़ज की कश्ती थी बारिश का पानी था..

कोयल की कूक थी मुँडेर पर बैठा कबूतरों का जोड़ा था..

छोटे छोटे पोखरे थे बड़ा तालाब था…

ग़ोता लगाने को हर मन तैयार था…

त्योहारों का मेला था सबकुछ अलबेला था..

चटपटी चाट थी चौपड़ का खेला था…

दादी की कहानियाँ थीं बाबा का दुलार था..

पापा की शाबाशी और माँ का प्यार था…

हाँ कुछ ऐसा मेरा बचपन था ऐसा ही बचपन था…

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