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युवा पत्रकार आदित्य श्रीवास्तव की किताब वायरस से वैक्सीन तक आपके बीच में

वायरस से वैक्सीन तक पुस्तक का विमोचन करते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, साथ हैं आदित्य श्रीवास्तव, लेखक।
– आदित्य श्रीवास्तव दूरदर्शन भोपाल में न्यूज रीडर हैं
– शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है उनकी नई पुस्तक 
भोपालः 
कोरोनाकाल के शुरुआती 500 दिनों के सिलसिलेवार घटनाक्रम पर आधारित डीडी न्यूज़ मध्यप्रदेश के एंकर संवाददाता आदित्य श्रीवास्तव की किताब वायरस से वैक्सीन तक इन दिनों खूब चर्चाओं में है। इस किताब में पत्रकार आदित्य श्रीवास्तव ने कोरोना संक्रमण की शुरुआत से लेकर वैक्सीन आने और दूसरी लहर से जूझती मानव जाति की पीढ़ा को बांध कर रख दिया है।
कोरोनाकाल में अधिकांश समाचार चैनलों पर जब फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या, भारत और चीन के बीच टकराव और राजस्थान में सचिन पायलेट का अपने विधायकों के साथ एक रिसॉर्ट में पहुंच जाने की खबरें दिन रात चल रहीं थीं तब दुनिया की सबसे बड़ी महामारी कोविड-19 के संबंध में कई खबरें ऐसी भी थीं जो दब रहीं थीं। कई जानकारी ऐसी भी थीं जो जनता तक नहीं पहुंच पाईं। कई तथ्य ऐसे भी थे जो कोई बता ही नहीं रहा था। देश और दुनिया में कई घटनाएं ऐसी घट रहीं थीं जिनकी कोई चर्चा ही नहीं कर रहा था। किताब वायरस से वैक्सीन तक में आदित्य श्रीवास्तव ने महामारी से संबंधित उन सभी खबरों, तथ्यों और जानकारियों को एकत्र कर सिलसिलेवार ढंग से एक दस्तावेज़ तैयार किया है।
किताब की भूमिका में आदित्य श्रीवास्तव ने लिखा है कि ये किताब कोरोनाकाल को देखने वालों से ज्यादा आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत उपयोगी होगी। उन्होने लिखा है कि जब कोरोना संक्रमण के दौरान देश लॉकडाउन था तब वे पुरानी महामारियों को जानने के लिए किताबें ढूंढ रहे थे लेकिन ऐसी इक्का-दुक्का किताबें ही मिलीं जिनमें पुरानी महामारियों के बारे में पढ़ने को विस्तार से मिला। तभी उनको लगा कि यदि भविष्य में आने वाली पीढ़ी को कोरोना महामारी के बारे में जानना हो तो वो क्या करेगी ? कोरोना महामारी के दौरान दुनियाभर में चल क्या रहा था ?  हुक़मरान क्या कर रहे थे ? मानव जाति कैसे उससे लड़ रही थी ? कैसे ये महामारी एक के बाद एक लोगों की जान ले रही थी ? इन सब जानकारियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम आदित्य श्रीवास्तव ने इस किताब के जरिये किया है। इस किताब के पन्नों को विचारों से बर्बाद करने की बजाए लेखक आदित्य ने जो कुछ भी घट रहा था उसको तथ्यों और आधिकारिक आंकड़ों के जरिए प्रस्तुत किया है। किताब में जहां कोरोना संक्रमण की शुरुआत, लॉकडाउन और फिर अनलॉक की प्रक्रियाओं का वर्णन किया है बल्कि कोरोनाकाल में हुए चुनावों के बारे में भी लिखा गया है। उस वक्त जो कुछ भी घट रहा था अप्रत्याशित था। अप्रत्याशित दौर में घटने वाले घटनाक्रमों से क्या वो ऐसी प्रक्रियाएं हुईं जो आने वाले समय में भी नज़ीर बनेगी उन बातों की तरफ भी आदित्य ने किताब के जरिए समाज का ध्यान खींचने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए कोरोनाकाल में हुए चुनावों में पहली बार 80 साल से उपर के बुजुर्ग और दिव्यांग मतदाताओं के लिए चुनाव आयोग ने डाक मतपत्र के जरिए मतदान की सुविधा दी थी हो सकता है ये प्रक्रिया संक्रमण का दौर पूरी तरह खत्म होने के बाद भी भविष्य में चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जाए। इसके अलावा चुनाव आयोग ने मतदान कराने से लेकर मतगणना तक कैसे मतदाताओं और चुनाव कर्मचारियों के लिए संक्रमण रहित माहौल बनाने का प्रयास किया था ये भी बरसों तक याद रखा जाएगा। कोरोनाकाल में सबसे ज्यादा इंतजार और चर्चा वैक्सीन को लेकर भी हुई। वैक्सीन बनाने को लेकर दुनिया के तमाम देशों के बीच स्पर्धा किसी से छुपी नहीं है। बड़े से बड़े देश जहां वैक्सीन राष्ट्रवाद में अंधे हो चुके थे तब विकासशील देश होने के बाद भी भारत किस तरह वैक्सीन मैत्री के जरिए दुनिया के अनेक देशों को वैक्सीन पहुंचा रहा था ये इतिहास में याद रखा जाएगा। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत ने जो नीति अपने नागरिकों को वैक्सीन उपलब्ध कराने को लेकर बनाई उसे क्यों दुनिया के कुछ अन्य देशों ने भी अपनाया ये भी इस किताब के जरिए जानने को मिलता है। साथ ही भारत की वैक्सीन के पेटेंट पर सबका हक़ की मांग के आगे क्यों दुनिया को भारत की बात को सुनना पड़ा इसको भी रोचक तरीके से आदित्य ने इस किताब में लिखा है। भारत का वैक्सीन को लेकर पहले से तैयार कोल्ड चेन मैनेजमेंट सिस्टम महामारी के दौरान किस प्रकार मील का पत्थर साबित हुआ ये बहुत कम लोग ही जानते हैं लेकिन अब इस किताब के जरिए दुनिया ये जानेगी कि कैसे विकासशील देश होने के बाद भी भारत वैक्सीन को लेकर अपनी ट्रायल्ड और टेस्टेड तकनीक के जरिए अपने लोगों को वैक्सीन उपलब्ध करवा रहा था।
आने वाले समय में सरकारें इस महामारी को पाठ्यक्रमों में शामिल करने पर विचार कर सकती है। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं  में इससे संबंधित सवाल पूछे जा सकते हैं।ऐसे में ये किताब छात्रों खासकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यार्थियों के लिए बेहद उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस किताब को लेकर वरिष्ठ टीवी पत्रकार अशोक श्रीवास्तव लिखते हैं कि जैसे-जैसे समय बीतेगा इस किताब की उपयोगिता बढ़ती जाएगी तो वहीं जाने माने टीवी एंकर सईद अंसारी का कहना है कि पुस्तक में जिस संवेदना के साथ घटनाओं का वर्णन किया गया है वो पाठकों को उद्वेलित करेगा,हमें स्वार्थी होने से रोकेगा। टीवी पत्रकार ब्रजेश राजपूत लिखते हैं कि ये किताब से ये समझाइश मिलती है कि इतिहास भूलने की नहीं सबक लेने की चीज़ है तो वहीं वरिष्ठ साहित्यकार पंकज सुबीर लिखते हैं कि पत्रकारिता में इन दिनों शोध बहुत कम हो रहा है ऐसे में आदित्य श्रीवास्तव की इस किताब पर नज़र जाती है तो मन की चिंता इस बात को लेकर कम हो जाती है कि आज की युवा पीढ़ी में कई लोग हैं जो गहरी शोध के साथ लिख रहे हैं।
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