Home > किताब चर्चा > “सेपियंस” दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली, सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबों में से एक

“सेपियंस” दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली, सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबों में से एक

"सेपियंस"
“सेपियंस”

किताब चर्चा
सुशोभित सक्तावत वेबदुनिया इंदौर

______________________”सेपियंस”______________________

[ मैं यह किताब लेने तो नहीं गया था, लेकिन जब मेरी नज़र इस पर पड़ी तो मैं इसको छोड़कर नहीं आ सका ]

##

“चीनो-अरब” का इतिहास लिखा जाता है, “हिंदोस्तां” का इतिहास लिखा जाता है, यह “मनुष्यता” का इतिहास है : एक विकास-यात्रा के रूप में मनुष्यता के विचार का इतिहास। एक बहुत बड़े कैनवास पर इस किताब की परियोजना रची गई है। लेकिन इसका सबसे रोमांचक पहलू वह है, जिसने इसे पिछले दो साल में आई सबसे महत्वपूर्ण किताबों में से एक और “इंटरनेशनल बेस्टसेलर” बना दिया : मनुष्यता के विकासक्रम के आरंभिक दौर की एक चौंका देने वाली पड़ताल।

मनुष्य के साभ्यतिक और राजनीतिक विकास का इतिहास कई कई बार, कई कई तरीक़ों से लिखा जा चुका है। प्रागैतिहासिक मनुष्य के विकासक्रम की गाथाएं भी अनेक बार बांची जा चुकी हैं। लेकिन युवल नोह हरारी अपनी इस किताब में कुछ नई स्थापनाओं को सामने रखते हैं। जब यह किताब आई थी, तो इसे मनुष्यता के विकासक्रम में उतने ही महत्व की किताब माना गया था, जितनी कि कॉस्मोलॉजी के क्षेत्र में स्टीफ़न हॉकिंग्स की “अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम” थी। यानी एक ऐसी “ग्राउंडब्रेकिंग थिसीस”, जो अपनी महत्वाकांक्षा में जितनी व्यापक है, अपनी ग्राह्यता में जितनी सुगम, अपने समग्र “स्वीप” में उतनी ही नवोन्मेषी भी।

युवल नोह हरारी यह स्थापना देते हैं कि आज से कोई 70 हज़ार साल पहले मनुष्यों की कोई छह प्रजातियां अस्त‍ित्व में थीं, जिनमें से केवल एक ही यानी “होमो सेपियंस” आज शेष रह गई है। यानी आज दुनिया के मनुष्यों के भीतर चाहे जितने “रेशियल” भेद हों, वे सभी आख़ि‍रकार “होमो सेपियंस” की ही श्रेणी में आते हैं, जबकि “निएंडर्थल” सरीखी प्रजातियां हज़ारों साल पहले ही समाप्त हो चुकी हैं। “निएंडर्थल” बहुत हद तक “होमो सेपियंस” से मिलते-जुलते थे किंतु वे “आजानुबाहु” हुआ करते थे, यानी उनके हाथ उनके घुटनों तक लंबे थे। बाद में भी अनेक विलक्षण मनुष्य “आजानुबाहु” पाए गए हैं। क्या उनमें “निएंडर्थल्स” के कोई जीन्स शेष रह गए होंगे?

मनुष्यता की वे सभी छह प्रजातियां कैसे ख़त्म हो गईं और उनमें से केवल “होमो सेपियंस” ही कैसे शेष रह गए? हरारी कहते हैं कि इसमें कोई शक़ नहीं कि “होमो सेपियंस” ने बड़े पैमाने पर “नरसंहार” या “जेनोसाइड” किया था। हरारी यह भी जोड़ते हैं कि दुनिया के इतिहास में दूसरी कोई ऐसी प्रजाति नहीं है, जो “होमो सेपियंस” से अधिक घातक साबित हुई हो। “सेपियंस” ने अनेक प्रजातियों का हमेशा के लिए ख़ात्मा कर दिया है। और बहुत उदासी के साथ हरारी बार-बार अपने इस पूर्वग्रह पर लौटते हैं कि इस “कॉस्म‍िक स्कीम” में मनुष्य का अस्त‍ित्व एक “एब्सर्ड” क़िस्म की परिघटना है, कि मनुष्य को इस धरती पर होना ही नहीं चाहिए था।

चार भागों में विभाजित इस किताब के पहले हिस्से “द कॉग्न‍िटिव रिवोल्यूशन” को पाठकों और समालोचकों दोनों ने एकमत से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्वीकारा है। दूसरे चैप्टर “एग्रीकल्चरल रिवोल्यूशन” के बाद से वे फिर एक जानी-पहचानी परिपाटी पर नज़र आते हैं और बाद के अध्यायों में तो उन्होंने “ख़ुशी क्या है” जैसे सब्जेक्ट‍िव क़िस्म के विषयों पर भी मनन किया है, लेकिन यह पहला चैप्टर ही है, जो इस किताब को एक यादगार दस्तावेज़ बना देता है। हरारी कहते हैं कि जब मनुष्य “नेचरल फ़ूड चेन” में सबसे ऊपरी क्रम पर नहीं था तो वह श्रेष्ठ कैसे सिद्ध हुआ? आदिम मानव के तो हथियार भी इस लायक़ नहीं थे कि वे पशुओं की हत्या कर सकें। वे अन्य पशुओं द्वारा मारे गए पशुओं के अवशेषों पर जीवन-यापन करते थे। लेकिन अपनी “कॉग्न‍िटिव” क्षमता के ज़रिये — विश्लेषण, पर्यवेक्षण, मननशीलता, भाषा और संवाद के ज़रिये — मनुष्य ने अपने निकटस्थ पर्यावास पर विजय पाई। यह मनुष्य के लिए जितना अच्छा था, धरती के लिए उतना अच्छा क़तई नहीं कहा जा सकता।

मसलन, हरारी का यह कहना कि मनुष्य में काल्पनिक चीज़ों में भरोसा करने की अद्भुत क्षमता है — जैसे ईश्वर, राष्ट्र, वित्त-व्यवस्था, मानवाधिकार — जिनका कि वस्तुत: कोई अस्त‍ित्व ही नहीं है। नतीजतन उसने धर्म, क्षेत्र, राजनीति, अर्थव्यवस्था, क़ानून जैसी परिघटनाएं रची हैं, जो उसके स्तर पर “हाइपोथेटिकली” चाहे जितनी तार्किक हों, वस्तुगत रूप से जिनका इस सृष्ट‍ि के व्याकरण में कोई भी स्थान नहीं है। यानी मनुष्यता की समूची बुनियाद निहायत अमूर्त धारणाओं पर टिकी हुई है, जिन्हें कभी भी डिगाया जा सकता है।

विकास-क्रम, मानवविज्ञान, इतिहास, मनोविज्ञान और संज्ञान के अनेक आयामों को छूने वाली किताब है यह। हाल के सालों में दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली, सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबों में से एक। इस किताब को आपकी आलमारी में क्यों नहीं होना चाहिए?

Share this: