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लखनऊ के हुस्न का हाल जानना हो तो योगेश प्रवीन से मिलिए

तस्वीर में नीली कमीज में दयानन्द और योगेश जी
तस्वीर में नीली कमीज में दयानन्द और योगेश जी

साथी की ख़ूबी
दयानंद पाण्डेय गोरखपुर की ज़ुबानी

  • लखनऊ के हुस्न का हाल जानना हो तो योगेश प्रवीन से मिलिए। जैसे रामकथा बहुतों ने लिखी है, वैसे ही लखनऊ और अवध का इतिहास भी बहुतों ने लिखा है। पर अगर रामकथा के लिए लोग तुलसीदास को जानते हैं तो लखनऊ की कथा के लिए हम योगेश प्रवीन को जानते हैं। अब यही योगेश प्रवीन अब की अट्ठाइस अक्टूबर को पचहत्तर वर्ष के हो रहे हैं तो उन की कथा भी बांचने का मन हो रहा है। कभी नवाब वाज़िद अली शाह ने कुल्लियाते अख्तर में लिखा था :

लखनऊ हम पर फ़िदा है हम फ़िदा-ए-लखनऊ
आसमां की क्या हकीकत जो छुड़ाए लखनऊ।

तो योगेश प्रवीन भी इस लखनऊ पर इस कदर फ़िदा और जांनिसार हैं कि लोग-बाग अब उन्हें लखनऊ का चलता फिरता इनसाइक्लोपीडिया कहते हैं। आप को लखनऊ के गली-कूचों के बारे में जानना हो या लखनऊ की शायरी या लखनऊ के नवाबों या बेगमातों का हाल जानना हो, ऐतिहासिक इमारतों, लडा़इयों या कि कुछ और भी जानना हो योगेश प्रवीन आप को तुरंत बताएंगे। और पूरी विनम्रता से बताएंगे। पूरी तफ़सील से और पूरी मासूमियत से। ऐसी विलक्षण जानकारी और ऐसी सादगी योगेश प्रवीन को प्रकृति ने दी है जो उन्हें बहुत बड़ा बनाती है। लखनऊ और अवध की धरोहरों को बताते और लिखते हुए वह अब खुद भी एक धरोहर बन चले हैं। उन का उठना-बैठना, चलना-फिरना जैसे सब कुछ लखनऊ ही के लिए होता है। लखनऊ उन को जीता है और वह लखनऊ को। लखनऊ और अवध पर लिखी उन की दर्जनों किताबें अब दुनिया भर में लखनऊ को जानने का सबब बन चुकी हैं। इस के लिए जाने कितने सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं।

लखनऊवा नफ़ासत उन के मिजाज और लेखन दोनों ही में छलकती मिलती है। उन्हें मिले दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान भी उन्हें अहंकार के तराजू पर नहीं बिठा पाए। वह उसी मासूमियत और उसी सादगी से सब से मिलते हैं। उन से मिलिए तो लखनऊ जैसे उन में बोलता हुआ मिलता है। गोया वह कह रहे हों कि मैं लखनऊ हूं ! लखनऊ पर शोध करते-करते उन का काम इतना बडा़ हो गया कि लोग अब उन पर भी शोध करने लगे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय की हेमांशु सेन का योगेश प्रवीन पर शोध यहां कबिले ज़िक्र है। लखनऊ को ले कर योगेश प्रवीन के शोध तो महत्वपूर्ण हैं ही, लखनऊ के मद्देनज़र उन्हों ने कविता, नाटक आदि भी खूब लिखे हैं। लखनऊ से यह उन की मुहब्बत ही है कि वह लिखते हैं :

लखनऊ है तो महज़, गुंबदो मीनार नहीं
सिर्फ़ एक शहर नहीं, कूच और बाज़ार नहीं
इस के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इस की गलियों में फ़रिश्तों के पते मिलते हैं
तस्वीर में नीली कमीज में दयानन्द और योगेश जी

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