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देवदत्त जी अनूठे और निराले प्रसंग खोज लाए हैं, जो ‘सीता’ की रोचकता और पठनीयता को और भी बढ़ा देते हैं

लेखक देवदत्त पटनायक की किताब सीता

किताब चर्चा
दैव दुनिया के लेखक देवदत्त पटनायक की किताब सीता का हिंदी अनुवाद कर रही रचना यामिनी जी किताब में बारे कुछ बता रही हैं। रचना जी देश की लोकप्रिय अनुवादक और लेखक हैं। कई किताबों का अनुवाद कर चुकी हैं जो बेस्ट सेलर साबित हुईं। अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद में महारत है। फरीदाबाद रहती हैं।

मेरा आगामी अनुवाद: रचना यामिनी

भारतीय पौराणिक कथाओं व मिथकों के बीच अद्भुत संतुलन साधने वाले लेखक देवदत्त पटनायक की ‘सीता’ पुस्तक के अनुवाद का प्रस्ताव मिला तो मन का कौतूहल जाग उठा, वे दिव्य पात्रों व चरित्रों को शब्दों के किस ताने-बाने में बाँध देते हैं कि वे चिर-परिचित होते हुए भी, एक अभिवन रंग-रूप व आभा के साथ प्रकट होते हैं। पुस्तक के पृष्ठ दर पृष्ठ पढ़ती चली गई और ‘सीता’ अपने चरित्र के पूरे वैविध्य के साथ सामने आती गईं। अनुवाद करते हुए, कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि मैं रामायण की उस कथा को अनूदित कर रही हूँ, जो हम भारतीयों को जन्म से ही घुट्टी की तरह संस्कारों के साथ दी जाती है। रामायण के सभी उपलब्ध और अनुपलब्ध संस्करणों और विभिन्न माध्यमों से प्रस्तुत राम कथाओं, चित्रों, छवियों और लोकगाथाओं के बीच से देवदत्त जी अनूठे और निराले प्रसंग खोज लाए हैं, जो ‘सीता’ की रोचकता और पठनीयता को और भी बढ़ा देते हैं। राम और सीता की कथा को प्रामाणिक और दुर्लभ तथ्यों के बीच संजोया गया है। जिन्हें पढ कर अनुभूति होती है कि रामायण को मात्र एक भारतीय महाकाव्य नहीं बल्कि एक चेतन परंपरा के रूप में देखा जाना चाहिए।
पुस्तक में सीता व हनुमान के परस्पर संवाद में सीता नर और विचार के विषय में कहती हैं कि विचार ही नर को नारायण तक ले जाते हैं और हनुमान पूछते हैं कि नारायण कौन हैं :
”निद्रालीन विष्णु : हमारी मानवीय संभावना, जो सदैव पुष्पित होने की प्रतीक्षा करती रहती है।“
”यह मानवीय संभावना क्या है?“
”संसार को दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से देखना और उससे सार्थकता पाना।“ सीता उत्तर देती हैं।
रामायण में छिपी यह मानवीय संभावना ही इसकी सार्थकता है। देवदत्त जी उसी मानवीय संभावना को साकार करने में अपनी ओर से महती योगदान दे रहे हैं। उन्होंने संस्कृति व प्रकृति के अंतर को बड़ी बोधगम्यता के साथ प्रस्तुत किया है। अनुवाद की प्रक्रिया बहुत सहज रही क्योंकि लेखक ने कहीं भी अतिरिक्त विद्वता और ज्ञान प्रदर्शन द्वारा कथानक को बोझिल और कठिन नहीं होने दिया। पुस्तक की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि वे रामायण की कथा को अनावश्यक विस्तार देने के लोभ को संवरण कर पाए हैं।
किसी भी अच्छे लेखक की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपनी मान्यताएँ या विचार, पाठक पर न थोपे और मेरे अनुसार देवदत्त जी इसके निर्वाह में पूरी तरह से सफल रहे हैं।
इस सुंदर पुस्तक के लिए उन्हें मेरी शुभकामनाएँ

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