प्रोफेसर रचना कसाना

प्रोफेसर रचना कसाना को नारद जयंती पर सम्मान

फरीदाबाद: डीएवी कॉलेज फरीदाबाद की पत्रकारिता विभाग को प्रोफेसर रचना कसाना को नारद जयंती पर सम्मानित करते वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर रॉय। Read more
इंडिया टीवी

अजीत अंजूम दिल्ली से दूर पहाड़ों की सैर पर

इंडिया टीवी के प्रबंध सम्पादक अजीत अंजूम दिल्ली से दूर पहाड़ों की सैर पर हैं। वो शुक्रवार के सम्पादक अम्बरीश कुमार के बुलावे पर रामगढ़ उत्तराखंड घूमने पहुंचे। कैमरे पर भी हाथ आजमाया अजीत ने, बेहद रिलेक्स दिख रहे हैं। खुद ड्राइविंग करके वो यहाँ पहुंचे दिल्ली से। Read more
दिल्ली

पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मान्नित

राजधानी दिल्ली में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार का सफल आयोजन (रिपोर्ट एवं छाया: एस.एस.डोगरा) नई दिल्ली 20 मई,2017: आज गाँधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में भोपाल के सप्रे संग्रहालय के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मान्नित किया गया. राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली के संयुक्त तत्वावधान में पहली बार आयोजित किया गया. केंद्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष डॉ. कमल किशोर गोयनका ने बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढाई। एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद सिंह तथा आचार्य द्विवेदी समिति के अध्यक्ष विनोद शुक्ल के अनुसार समारोह... Read more
दिलीप पाडगावकर

इतने व्यस्त होते हुए भी मेरे कार्टून रोज़ देखते थे: इरफ़ान

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पाडगावकर से जुडी यादे साझा कर रहे Irfan Cartoonist सर,आपने अपना वादा तोड़ दिया ...... ----------------------------------------------------------- बात ’90 के शुरूआती दशक की है ,जब मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया की बिल्डिंग में नवभारत टाइम्स में ट्रेनी कार्टूनिस्ट के तौर पर दाखिल हुआ .यह वह इमारत थी जहाँ देश की पत्रकारिता जगत के बड़े-बड़े सितारे देखे जा सकते थे .उन्हीं में सबसे बड़े और मेरे लिए बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रधान संपादक दिलीप पडगाँवकर हुआ करते थे .वह जब भी दिखते,हाथ में कोई कागज़ लिए दो चार लोगों से घिरे ,बातचीत करते हुए .मैं उन्हें दूर से देखता था.दिल में एक हसरत रहती थी कि... Read more
दिलीप पडगांवकर,

दिलीप पडगांवकर से बात करना मतलब मेरे लिये उन दिनों अमिताभ बच्चन से बात करने के समान था: ब्रजेश राजपूत

एबीपी न्यूज़ भोपाल के विशेष संवाददाता ब्रजेश राजपूत दिलीप पाडगावकर जी से जुड़ी यादे साझा कर रहे हैं। पढ़ें जरूर आप बहुत याद आओगे दिलीप सर ..... दिलीप पडगांवकर, पत्रकारिता का वो नाम जो नब्बे के दशक में लोगो की नजरों में सम्मान पैदा करता था और हम पत्रकारों की नजर में साख। सागर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढाई के दौरान ही अंग्रेजी अखबार टाइम्स आफ इंडिया को देखा और धीरे धीरे पढने की आदत पडी। इस अखबार के संपादकीय और कभी कभार छपने वाले लेखों से ही दिलीप पडगांवकर साहब के नाम से परिचय हुआ। बाद में पता चला कि वो इस अखबार के संपादक भी है। पत्रकारिता की पढाई... Read more
अनुपम मिश्र

अनुपम जी बहुत सच्चे इंसान थे, उनसे मिलने कोई भी जाए, लौटते वक्त वे दरवाज़े तक छोड़ने आते थे: अविनाश दास

अनुपम जी ने ख़ुद अपनी किताबों के ऊपर अपना नाम नहीं प्रकाशित करवाया था। अंदर के पन्नों पर जहां मूल्य लिखा होता है, वहीं बहुत छोटे फाॅन्ट में उनका नाम होता था। सन '96 अगस्त महीने में बिहार की बाढ़ पर प्रभात खबर में मेरी कई रिपोर्ट्स छपी थी। उनमें से एक रपट को दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका देशकाल ने कवर स्टोरी बनाया था। अनुपम मिश्र पत्रिका के सलाहकार संपादक थे। अगले साल मैं दिल्ली आ गया। अनुपम जी से मुलाकात हुई। वे एेसे मिले, जैसे हमारे अपने घर के बुज़ुर्ग हों। संघर्ष के दिन थे, तो मैं अक्सर दोपहर में लंच से पहले उनके पास चला जाता था... Read more
राहुल देव

राहुल जी ने अपना महत्व कांच के केबिन से नहीं, लोगों के बीच घुलमिल कर बनाया: वेद उनियाल

पत्रकार वेद उनियाल कुछ कह रहे राहुल देव जी के बारे में आदरणीय राहुल देव जी,  एक संपादक के तौर पर ही नहीं , जनसत्ता परिवार के अग्रज के तौर पर भी हम उन्हें याद करते हैं उनका आदर करते हैं। राहुलदेवजी के साथ जनसत्ता के बहुत अच्छे दिन बीते हैं। वह दौर जब हमें पत्रकारिता सीखने को मिली, हम जैसे नए लोगों को एक बहुत अच्छा माहौल। जनसत्ता परिवार ने मुंबई में हिंदी समाज को जोड़ने का बेहतर प्रयास किया। जनसत्ता , सबरंग , संज्ञा जनसत्ता को पढने के लिए लोगो में ललक बढी। जनसत्ता को उन्होंने अपना अखबार माना। दिन बीतते जाते हैं। ऐसे ही लगता है जैसे... Read more
ओम निश्छल

हमें तो खूब है मालूम अपनी कमजोरी

कवि आलोचक लेखक ओम निश्छल अपनी बेटी की एक कविता शेयर करते हुए। उसे याद कर रहे हैं हमें तो खूब है मालूम अपनी कमजोरी भले ही कोई हमें देवता कहे तो कहे। पा : शब्द और जटिलताऍं । श्रुति मिश्र शब्दों की दुनिया में पापा इतने उलझे रहते हैं 'विरल' किताबी मसलों में कुछ इतने खोए रहते हैं जूझ रहे होते हैं जब जन यहां वहां के मसलों में जूझा करते पिता हमारे 'किंवदन्तियों' - 'जुमलों' में होती होंगी अच्छी बातें, इनकी 'अद्भुत' होती हैं होता होगा जैकेट आपका, पा की तो 'सदरी' होती है शब्द और शब्दार्थ डैडी के अनूठे और नावेल होते हैं साल भर डियर डैडी मेरे... Read more

स्कूल की छुट्टी के बाद कविताएं बस्ते में लेकर साइकिल से प्रभात खबर के दफ्तर जाते थे: अविनाश दास

यादें अनारकली आरा बनाकर अविनाश दास लोकप्रियता के मुकाम पर हैं। पर शुरुआत कैसी थी। जानिए उन्ही के शब्दों में स्कूल में थे, तो कविता लिखने का शौक चढ़ा। मेरा सहपाठी था विनय भरत [Vinay Bharat]। हमदोनों स्कूल की छुट्टी के बाद अपनी कविताएं बस्ते में लेकर साइकिल से प्रभात खबर के दफ्तर (कोकर इंडस्ट्रियल एरिया, रांची) जाते थे। तब दरबान रोकता नहीं था। हम हरिवंश जी से मिलते थे, जो प्रभात खबर के प्रधान संपादक थे। आज वो राज्यसभा सांसद हैं। आपको कुछ कुछ याद होगा घनश्याम भैया [Ghanashyam Srivastava], क्योंकि हमदोनों को सदेह आपके पास ही फारवार्ड कर दिया जाता था। उन्हीं दिनों श्रीनिवास जी [Srinivas] से भी... Read more
यतीन्द्र मिश्र, प्रसिद्ध लेखक

वे माहिर हैं मैं नक्काल: प्रभात रंजन

यतीन्द्र को याद कर रहे जानकीपुल के सम्पादक प्रभात रंजन:- यतीन्द्र मिश्र, प्रसिद्ध लेखक। हाल ही में लिखी उनकी किताब लता सुर गाथा चर्चा में है। अयोध्या रहते हैं। मुझे 15-16 साल पहले का वह दौर याद आ रहा है जब यतीन्द्र की किताब ‘गिरिजा’ आई थी. गायिका गिरिजा देवी पर लिखी वह किताब हिंदी में अपने ढंग की पली ही किताब थी. बड़ी धूम मची थी. तब मैं लेखक नहीं वेखक था. अपने दोस्त की उस सफलता पर आनंदित भी होता था और ईर्ष्या भी करता था. यह संयोग है कि आज जब उनके जन्मदिन पर उनको बधाई देने बैठा हूँ तो उनकी किताब ‘लता: सुर गाथा’ का डंका... Read more