किताब चर्चा

द रियल फेस ऑफ फेसबुक इन इंडिया किताब चर्चा में, क्या कहती है किताब

  Author(s): Cyril Sam and Paranjoy Guha Thakurta  Publisher: Paranjoy Guha Thakurta  Pages: 214  Published: April 2019 ======================================================== A  book by Paranjoy Guha Thakurta and Cyril Sam finds revolving doors and quid pro quos between India's richest political party and the world's largest social platform. Five years from now, we may well be reading a book about the BJP’s WhatsApp operations in the 2019 elections – featuring two lakh groups of 256 members each, or over 5o million readers of the party line. A recent book, however, tells the story of the 2014 elections, and the role of WhatsApp’s parent company Facebook in the rise of Narendra Modi. In 2019, if we forget Facebook’s... Read more
किताबें

(किताब) समीक्षा की समीक्षा…

एडिटर अटैकः डॉ प्रशांत राजावत दो तीन दिन पहले हमने मीडिया मिरर के लिए एक किताब समीक्षक की तलाश शुरू की, और कह सकते हैं कि एक तरह से एक इश्तिहार दिया। मैंने पाया कि सैकड़ों की संख्या में लोगों ने हमसे संपर्क किया। मेल पर, मैसेंजर पर, ईमेल पर, व्हाट्सएप पर इतने संदेश हमें पहले कभी नहीं मिले किसी रिक्ति के संदर्भ में। पूर्व में भी मिरर ने कुछ रिक्तियां जारी की थीं जैसे वीडियोग्राफर व वीडियोएडीटर। पहली दफा ऐसा हुआ। अभी आज ही सुबह कई संदेश आए, मैं किताब समीक्षा कर सकता हूं, ये मेरा पता है, ये मेरा नम्बर है, मुझे भेज दीजिए। मतलब सीधे भेज दीजिए,... Read more

One Small Magazine’s Fight for the Indian Mind

  By Maddy Crowell , Photography by Saumya Khandelwal ISSUE:  Summer 2020   This story was supported by the Pulitzer Center. The offices of Caravan, a small but influential Indian monthly magazine, are housed on the third floor of a Soviet-style building in New Delhi. For a long time, Vinod Jose, the magazine’s executive editor, didn’t give much thought to the view outside his window: a budding thicket of gulmohar trees where, down below, smokers convened in small circles on their lunch break. But then, a few years ago, the view began to change. The netted steel cage of a new building began to rise out of the foliage, piquing Jose’s interest:... Read more
'डेविल्स ऐडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी

करण थापर साहब की किताब और मेरी बात

- दामिनी यादव, वरिष्ठ उप सम्पादक, गृहलक्ष्मी पत्रिका दिल्ली ‘मेरी अनसुनी कहानी- और मशहूर टीवी कार्यक्रम ‘डेविल्स एडवोकेट’ के दिलचस्प किस्से’ के बारे में मेरी ये बातें सिर्फ़ मेरे विचार हैं। इन्हें करण थापर साहब की इस किताब की समीक्षा हर्गिज़ न समझा जाए। मैं मानती हूं कि किसी भी किताब के बारे में जानने के इच्छुक लोगों को ख़ुद उस किताब को पढ़कर ही उसके बारे में कोई राय बनानी चाहिए। दूसरे के पढ़े के आधार पर कोई राय कायम करना, मुझे दूसरे के खाए के आधार पर अपना ज़ायक़ा तय करने जैसा लगता है, जबकि असल में किसी को नमक तेज़ या कम पसंद होता है तो किसी... Read more
वॉशिंगटन पोस्ट की बीजिंग ब्यूरो चीफ अन्ना फिफील्ड

वॉशिंगटन पोस्ट की अन्ना फिफील्ड ने किम जोंग पर लिखी किताब

उत्तर कोरिया का तानाशाह शासक किम जोंग की क्रूरता के बारे में तो दुनिया जानती है, पर वो तानाशाह कैसे बना, इसके बारे में कम ही लोगों को पता है। वॉशिंगटन पोस्ट की बीजिंग ब्यूरो चीफ अन्ना फिफील्ड ने ‘द ग्रेट सक्सेसर: द डिवाइनली परफेक्ट डेस्टिनी ऑफ ब्रिलियंट कॉमरेड किम जोंग उन’ शीर्षक से लिखी किताब में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित किताब के कुछ अंशों के मुताबिक किम ने बचपन से ही बाहर की दुनिया नहीं देखी। कभी स्कूल नहीं गया, उसकी पढ़ाई भी शाही महल में ही हुई। किम जोंग उन ने देश की गद्दी 27 साल की उम्र में 2011 में संभाली थी।... Read more
किताब 'द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर'

पुस्तक समीक्षा ः किताब ‘द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर’

(टीवी पत्रकार पुष्पेन्द्र वैद्य की ताज़ा किताब 'द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर' पर पाठकीय टीप) भारतीय मीडिया के 25 सालों  का सफ़र कितना आगे, कितना पीछे  एक पत्रकार की नज़र से कविता वर्मा भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पिछले पच्चीस सालों  में लम्बा सफर तय किया है। आज यह मीडिया कहाँ पहुँचा यह बताना तो कठिन है लेकिन कैसे किस राह किस डगर पर चलते हुए पहुँचा और उन रास्तों की क्या कठिनाइयाँ क्या तनाव रहे यह जानना रोचक है। खबरों के पीछे का सच उनकी महत्ता उनकी उपेक्षा मीडिया हाउस की विचारधारा किसी रिपोर्टर को किस तरह प्रभावित प्रताड़ित करती है यह जानना भी कम रोचक नहीं है। यूँ तो... Read more
गौतम राजऋषि

आप बेपनाह मोहब्बत में और डूबना चाहें तो “गौतम राजऋषि” को पढ़ें

रंग भर जाते हैं ख़ुशी के जिन्दगी में तमाम,जब भी लहराये वो तिरंगा, नींद तकिये से करती है इश्क-ए- सुकूँ ,जब घेर के हमें "वर्दियाँ हरी" खड़ी हों । कहते हैं कि अगर आपको किसी से बेपनाह मोहब्बत हो तो "अमीर खुसरो"साहब को पढ़ें...मगर मेरा कहना है कि आप बेपनाह मोहब्बत में और डूबना चाहें तो "गौतम राजऋषि जी" को पढ़ें ,यकीनन आप प्रेम में गोते लगायेंगे और प्रेम एक नहीं कई परिपाटी का होगा.... उन्मुक्त प्रेम, कमसिन प्रेम,गलियों,चौराहों,छतों,बालकनी,मोबाइल,छज़्जों ,स्कूटी का,रसोई से बैठक तक,घर से दफ़्तर तक, और यही सितम क्या कम है कि हिज़्र की यादें भी डुबकियाँ मारती हैं ,,, सच्चा एक देशप्रेम जो हम सब के दिल... Read more
नदिया के पार फिल्म की पात्र गुंजा।

इन दस दिनों में गुंजा के दसों कर्म हो गए..

केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास कोहबर की शर्त के हिस्से क्रमशः आपको हम पढ़वा रहे हैं..आज दो खंड.. ये क्रम जारी है। कोहबर की शर्त उपन्यास पर प्रसिद्ध हिंदी फिल्म नदिया के पार का निर्माण हुआ था।    चन्दन का पैर ठीक होने में लगभग दस दिन लग गए। किन्तु इन दस दिनों में गुंजा के दसों कर्म हो गए। वह छटपटाकर रह गई। कब चन्दन घर आये कि वह देखे ! ओंकार के हाथ खाना भेजती तो तड़पकर रह जाती। रामू कुछ-कुछ बोलने लगा था, चन्दन उससे बाते करता - खाने के बारे में, दूध के बारे में, सोने के बारे में। रामू एक-एक बात गुंजा से कहता, जब... Read more
नदिया के पार फिल्म का एक दृश्य

मिश्र जी के उपन्यास में गुंजा की शादी ओंकार से ही होती है…

[caption id="attachment_3354" align="alignleft" width="202"] उपन्यास[/caption] छिबरामऊ के विशाल समर्पित की कलम सेः प्रसिद्ध फिल्म नदिया के पार उपन्यास कोहबर की शर्त पर बनी है। पर जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है उपन्यास उससे थोड़ा अलग है। पढ़िए      भारतीय सिनेमा के हिंदी दीर्घा की सुप्रसिद्ध फिल्म 'नदिया के पार' केशव प्रसाद मिश्र के प्रसिद्ध उपन्यास "कोहबर की शर्त" पर फिल्माई गई है। २ घंटे २४ मिनट की यह अत्यंत प्रसिद्ध फिल्म १ जनवरी १९८२ को रिलीज हुई थी। और तब से लेकर आज तक यह फिल्म और इसके चरित्र {चन्दन,गुंजा,ओंकार,रूपा,वैधजी व् काका} हिंदी की सदाबहार फिल्मों की दीर्घा में अपना स्थान निरंतर अग्रिम पंक्ति में बनाये हुए है।... Read more
परफेक्ट फ्रेम

पत्रकारिता के विद्यार्थी के पास ये किताब ज़रूर होनी चाहिए

[caption id="attachment_3149" align="alignleft" width="300"] होमई व्यारावाला [/caption] टीवी पत्रकार रवीश कुमार समय-समय पर अच्छी किताबों की वकालत करते हैं। इस बार महिला फोटोग्राफरों की दुनिया पर आधारित किताब परफेक्ट फ्रेम के बारे में बता रहे हैं और कह रहे हैं ये किताब पत्रकारिता के छात्र अनिवार्य रूप से पढ़ें।    होमई व्यारावाला की बेटियां बड़ी हो गईं हैं पिछले साल किसी वक्त मुंबई से मेरे दोस्त ने एक किताब भेजी। आज उसका जन्मदिन भी है। मुझे तो यही जानकर हैरानी हुई थी कि वो कैसे आधुनिक कला संग्नरहालय पहुंच गया। उसे लगा कि ये किताब मेरे लिए बहुत ज़रूरी है, मैं तो इसी बात से भाव-विभोर हो गया। सोचता रह गया... Read more