यादें

सिंधिया

माधवराव सिंधिया के साथ पत्रकार एनके सिंह के जीवंत किस्से, भाग-1

[caption id="attachment_3900" align="alignleft" width="135"] वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह[/caption] मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों में से एक एनके सिंह आजकल ग्वालियर स्टेट के महाराजा व कांग्रेस के दिग्गज नेता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के साथ अपने जीवंत किस्सों को कई किस्तों में एक निजी समाचार पत्र के लिए लिख रहे हैं। पत्रकारों के किस्से बड़े लाजवाब होते हैं। जिनसे नए नवेले पत्रकारों को काफी कुछ सीखने को मिलता है। एनके सिंह के किस्से न सिर्फ आपको करिश्माई व्यक्तित्व के धनी माधवराव सिंधिया के बारे में रोचक जानकारी देंगे बल्कि पत्रकारिता को भी समझने में मददगार साबित होंगे। एनके सिंह हिंदुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर आदि में सम्पादक रह चुके हैं।  उन्होंने कई... Read more
अनिक्शु

मुस्कुराओगे तुम , जिएगी जिंदगीः अनिक्शु भारद्वाज

दैनिक भास्कर रोहतक की संवाददाता अनिक्शु भारद्वाज का 20 अगस्त को ब्रेन ट्यूमर के चलते निधन हो गया था। मिरर ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके सम्मान में 7 दिनों तक अपनी सेवाओं को रोक दिया था। आज सातवें दिन मिरर याद कर रहा है अनिक्शु को। अनिक्शु जीवन के अंतिम चरण में जिंदगी को अपने शब्दों में परिभाषित करती थीं। वही कुछ नोट्स उनके साथ ही उनकी कुछ कविताएं।    [caption id="attachment_3707" align="alignleft" width="300"] अनिक्शु[/caption] Writing Note to Lyf - Night outs रातों वाली सड़क शांत बेशक हो। लेकिन अपने साथ जिंदगी लिए घूमती है। जिंदगी तो हम सबकी ही अलग है लेकिन इसे जीने के जज्बे वाली... Read more
अटल-राजीव। दो युग

राजीव के बारे में विपक्षी नेता के तौर पर नहीं बोलूंगा, बोले थे अटल जी

 ‘‘मैं राजीव के बारे में बोलते हुए बहुत खुश हूं,’’  ‘‘मगर मैं एक विपक्षी नेता के तौर पर नहीं बोलना चाहता क्योंकि इससे मुझे वह कहने की आजादी नहीं मिलेगी जो मैं वास्तव में आपसे कहना चाहता हूं। -अटल विहारी वाजपेयी      [caption id="attachment_3697" align="alignleft" width="300"] अटल मुस्कान[/caption] राजनीतिज्ञ के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी की मुस्कान सर्वाधिक आकर्षक थी। ऐसा दिखाई देता था कि जैसे वह उनके पूरे चेहरे पर फैली हो मगर उसके साथ ही उनकी आंखों में भी चमक पैदा करती हो। इससे वह एक आनंदित शरारती दिखाई देते थे। वह लगातार मुस्कुराने से हिचकिचाते नहीं थे। दरअसल मुझे लगता था कि उन्हें मुस्कुराने में मजा... Read more
अटल बिहारी बाजपेयी

अटल यात्राः मृत्यु नहीं मुक्ति का उत्सव

अटल जी के निधन की खबर से मुझे दुख नहीं हुआ। मुझे लगा कि ये मुक्ति थी। मुक्ति थी संसार से, मुक्ति थी असहनीय पीड़ा से औऱ मुक्ति थी असाध्य बीमारियों से और जीर्ण शीर्ण होती काया से। थोड़ा अचरज होगा आप सबको पर अटल जी अगर बोल पाते होते तो वो भी अपने परम मित्र गोपालदास नीरज की तरह इच्छामृत्यु मांग लेते। अटल जी जीवंत व्यक्तित्व थे वो इस तरह से जीना नहीं चाहते कभी। खैर अटल जी की अंतिम यात्रा का प्रसारण मैंने कई चैनलों पर देखा औऱ अंततः आजतक पर आकर रुक गया। आजतक पर आलोक मेहता, नलिनी सिंह, मनीषा प्रियम और साथ में कुमार विश्वास की... Read more
रवीश कुमार

रवीश कुमार का कल जानते थे जितिन भूटानी

एनडीटीवी के कैमरा मेन जितिन भूटानी का हाल ही में निधन हो गया है। उन्हें याद कर रहे एनडीटीवी के कार्य़कारी सम्पादक रवीश कुमार।    कैमरामैन जितिन भूटानी के साथ रवीश कुमार शुरूआती दिनों की मेरी अनगिनत रिपोर्ट इसी बाइलाइन से ख़त्म होती थी। स्टोरी सामान्य हो या विशिष्ट कैमरामैन सबमें बराबर काम करता है। इसलिए मैं उसके साथ शूट की हुई हर स्टोरी में उसका नाम ज़रूर जोड़ता था। जितिन के साथ जाने कहाँ कहाँ गया। वो मेरे पेशेवर ज़िंदगी का गवाह था। मैं उसकी ज़िंदगी का। रिपोर्टिंग का कोई भी क़िस्सा याद करता हूँ जितिन भूटानी ही दिख जाता है। अपनी स्टोरी में इतनी बार उसका नाम लेता... Read more
एक कार्यक्रम में प्रभाष जोशी व अन्य

यादेंः ऐसे थे प्रभाष जोशी

-शंभूनाथ शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार  साल 1994 के गहमा-गहमी वाले दिन थे और यूपी में तब सपा-बसपा की मिली-जुली सरकार थी. उस समय वहां पर एक गैर-आईएएस नौकरशाह शशांक शेखर सिंह की तूती बोला करती थी. सुना जाता था कि वे अखबारों को निर्देश देते कि अमुक खबर नहीं जाएगी तो सपा-बसपा सरकार से डरे-सहमे अखबार वाले मशीन पर चल रहा अखबार रुकवाते और खबर रोक लेते. ऐसे ही दिनों में एक रात कोई दस बजे मुझे फोन आया. पीबीएक्स से बताया गया कि लखनऊ से कोई शशांक शेखर बोल रहे हैं और उन्होंने कहा है कि शंभूनाथ शुक्ला को फोन दो. मेरे फोन उठाते ही उधर से आवाज आई देखिए... Read more
दैनिक भास्कर के समूह सम्पादक कल्पेश याग्निक

दरअसल असंभव के विरुद्ध संभव कुछ नहीं कल्पेश जी

बहुत लोग। अनेको अनेक लोग कल्पेश याग्निक को शाब्दिक श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। फेसबुक उनकी तस्वीरों और यादों से अटा पड़ा है। दैनिक भास्कर समूह और उसके पत्रकारों पर मानो पहाड़ टूट पड़ा है। पिछले वर्ष दैनिक भास्कर के मुखिया रमेशचंद्र अग्रवाल के निधन के बाद कल्पेश जी ही भास्कर के पितृपुरुष थे। इसलिए ये सब होना लाज़िमी ही है। दैनिक भास्कर के समूह संपादक कल्पेश याग्निक की ह्दय आघात से अचानक मृत्यु से समूचा पत्रकारिता जगत स्तब्ध है। लोग उनसे जुड़े संस्मरण साझा कर रहे हैं। लोग उन्हें याद कर रहे हैं। भारतीय समाज में एक आम धारणा है जब कोई हमारे बीच से चला जाता है तो... Read more
दैनिक भास्कर के समूह सम्पादक कल्पेश याग्निक

यादें कल्पेश याग्निकः कोई ऐब नहीं था, सिवाय एक पिपरमेंट चाटने के

  अलविदा कल्पेश ! यक़ीन नहीं आता । भास्कर के समूह संपादक कल्पेश याग्निक का इस तरह जाना । दिनों दिन क्रूर और भयावह हो रहे मीडिया का शिकार एक भावुक संपादक हो गया । काम का असाधारण मानसिक दबाव । कोई कहाँ तक उठाए । कल्पेश भी कोई दैवीय शक्तियों के साथ काम नहीं कर रहे थे । यह तो होना ही था । हाँ न होता तो अच्छा होता । यादों की फ़िल्म चल रही है । उन दिनों मैं नई दुनिया इंदौर में सह संपादक था । हमारे साथी श्रवण गर्ग ने नई दुनिया छोड़कर फ्री प्रेस जर्नल के साथ जुड़ने का फ़ैसला किया । अख़बार शुरु... Read more
सिंध में रेत की खदाने

भिंड में देखा सिंध में निकलती रेत का खेल

( सुबह सवेरे में ग्राउंड रिपोर्ट )  वैसे हम गये हुये तो थे भिंड में पत्रकार संदीप शर्मा की मौत की खबर करने। मगर संदीप शर्मा की मौत जुडी हुयी थी स्थानीय रेत खनन माफिया से इसलिये खनन माफिया की खबर लेना जरूरी थी। इस साल मार्च के आखिरी दिनों में भिंड में पत्रकार संदीप शर्मा की डंपर से कुचलकर हुयी मौत की खबर ने पत्रकारिता जगत में सनसनी फैला दी थी। भिंड के इस युवा पत्रकार ने खनन माफिया और पुलिस प्रशासन के बीच चल रहे गठजोड को सामने लाया था। चैनल से इस खबर को करने की मंजूरी मिलते ही हम भिंड में थे।  संदीप ने अपने पत्रकारिता... Read more
दैनिक भास्कर के चेयरमैन रमेश अग्रवाल

दूसरे अखबार मालिकों की तरह रमेश जी ने लिखने में रूचि नहीं दिखायी

शोध पत्रिका समागम के सम्पादक मनोज कुमार की कलम से दैनिक भास्कर के  पूर्व प्रधान सम्पादक स्वर्गीय रमेशचंद्र अग्रवाल के व्यक्तित्व व कृतित्व पर चर्चा। मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे.. मनोज कुमार        मैं उन दिनों पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था. और कहना ना होगा कि रमेशजी इस स्कूल के प्रिंसीपल हो चले थे. यह बात आजकल की नहीं बल्कि 30 बरस पुरानी है. बात है साल 87 की. मई के आखिरी हफ्ते के दिन थे. मैं रायपुर से भोपाल पीटीआई एवं देशबन्धु के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे हिन्दी पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सेदारी करने के लिए भोपाल आया था. यह वह समय... Read more