यादें

आप बहुत याद आएंगे सुनील दुबे सर, जैसे अंदर वैसे बाहर

हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा आदि अखबारों में सम्पादक रहे सुनील दुबे का 23 अक्टूबर 2020 शुक्रवार को निधन हो गया। उनके साथ बिताए समय को याद कर रहे न्यूज 18 दिल्ली में न्यूज एडीटर संजय श्रीवास्तव ये अगस्त 1996 की बात है. मेरा चयन हिंदुस्तान लखनऊ संस्करण में उप संपादक के तौर पर हुआ. तब मैं अमर उजाला मेरठ में था. शास्त्रीनगर में घर था. शहर में अच्छा खासा परिचय. दोस्तों की फौज. जब हिंदुस्तान में सेलेक्शन हुआ, तभी अमर उजाला में प्रोमोशन हो गया. उप संपादक से वरिष्ठ उप संपादक. पैसे भी बढ़े. अजीब स्थिति थी. एक ओर हिंदुस्तान टाइम्स जैसा बड़ा ग्रुप, दूसरी ओर अमर उजाला में... Read more

तसलीमा नसरीनः निर्वासन के 26 वर्ष

बांग्लादेशी निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन पर टिप्पणी कर रहे हैं उनपर नजरबंद तसलीमा नाम से किताब लिखने वाले लेखक कृपाशंकर चौबे। आज तसलीमा नसरीन का जन्मदिन है। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन से मेरी मित्रता पिछले दो दशकों से अधिक समय से है। जब वे कोलकाता में रहती थीं तो अक्सर उनके घर पर हम अड्डा जमाते। पटना, रायपुर और दिल्ली की यात्राएं हमने साथ-साथ कीं। तसलीमा के साथ हुई अपनी अनेक वार्ताओं में पांच को मैंने अपनी पुस्तक ‘नजरबंद तसलीमा’ के परिशिष्ट में शामिल किया है। पुस्तक शिल्पायन से छपी है। पुस्तक के एक स्वतंत्र अध्याय में तसलीमा के साहित्य की समीक्षा मैंने की है। निर्वासन में लेखिका... Read more
जनसत्ता

स्मृति प्रभाष जोशीः निर्भय निर्गुण ,गुण रे गाऊँगा

आज प्रभाष जोशी जी का जन्मदिन है। उन्हें याद करते हुए लम्बा आलेख लिखा है वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने।  निर्भय निर्गुण ,गुण रे गाऊँगा प्रभाष जी आज होते तो चौरासी बरस के होते। देश की मौजूदा समस्याओं पर उनकी दृष्टि होती। ताकतवर राय होती। वे क्या लिखते यह लिखना मुश्किल है। क्यों कि संतों पर लिखना थोड़ा जोखिम भरा काम है, वजह संत के बारे में आप जितना जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके बारे में जानना बाकी रह जाता है। यह अशेष, एक किस्म का रहस्य पैदा करता है। उनका आभामंडल इतना विस्तृत होता है, जिसमें सारा संसार छोटा पड़ जाए। हम दुनियावी लोग उनके सामने सिर्फ श्रद्धा... Read more

गुजरात पत्रकारिता के “भीष्म” पद्मश्री नगीन बापा नहीं रहे

एनडीटीवी के प्रबंध सम्पादक रवीश कुमार की कलम से गुजरात के पत्रकार नगीनदास जी का निधन, 101 साल के थे हमने मार्च में नगीनदास जी पर एक लेख लिखा था। तब वे 100 पूरा कर 101 वें साल में प्रवेश कर रहे थे। गुजरात के इस क़लमकार को नमन। काश हिन्दी प्रदेश के लोग भी उन्हें जानते और पढ़ते । पुराना पोस्ट : सौ साल के पत्रकार गुजरात के नगीनदास संघवी को जन्मदिन की बधाई हमारे बीच कोई पत्रकार सौ साल पूरे कर रहा है, इसकी तो मुनादी होनी चाहिए। उत्सव मनाया जाना चाहिए। उनकी रचनाओं पर गोष्ठियां होनी चाहिए। उम्मीद है गुजरात की हवाओं में इस बात की खुश्बू... Read more
पत्रिका

मेल मिला कि हम आपकी सेवा डिस्कन्टीन्यू कर रहे हैं

पत्रिका में समाचार सम्पादक रहे आवेश बता रहे आपबीती मेरे लिए खबरनवीसी केवल रोजी रोटी कमाने का जरिया कभी नही रही। खबर कवरेज करते वक्त मेरी आँखों की चमक बढ़ जाती है, मेरे चलने का बोलने का तरीका बदल जाता है। मेरे लिए जर्नलिज्म मेरी पहली मोहब्बत है यह वो तरीका है जिससे मैं इस समाज से आप सबसे जुड़ता हूं , मुझे जानने वाले सभी लोग इस बात को जानते हैं। कई अखबारों से होता हुआ मैं पिछले पांच वर्षों से राजस्थान पत्रिका में बतौर समाचार सम्पादक का काम कर रहा था लेकिन कल अचानक शाम को मेल मिला कि हम आपकी सेवा डिस्कन्टीन्यू कर रहे हैं। मुझे इसका अंदाजा... Read more
खेल पत्रकारिता

He changed sports journalism in India

By A JOSEPH ANTONY A Joseph Antony salutes S Krishnan, one of India's finest sports editors. uccess in sports stems mostly from teamwork. Now and then there comes a captain on whose singular strength an entire squad makes huge strides. One such titan, now departed for the Elysian Fields, was The Hindu's Sports Editor Srinivasaraghavan Krishnan, 'Kichan' A university level cricket and tennis player, his fondness for horse racing took him to the sport's leading centres at Bangalore, Ooty, Mumbai and Hyderabad. When he was invited to assume the mantle of sports editor of one of India's oldest dailies, he was initially reluctant. Gone were the days, when he could 'horse' around... Read more
मटियानी

स्मृति में शैलेश मटियानी

विज्ञान लेखक देवेन मेवाड़ी की कलम से  सन् साठ के दशक के अंतिम वर्ष थे। एम.एससी. करते ही दिल्ली के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में नौकरी लग गई। आम बोलचाल में यह पूसा इंस्टिट्यूट कहलाता है। इंस्टिट्यूट में आकर मक्का की फसल पर शोध कार्य में जुट गया। मन में कहानीकार बनने का सपना था। ‘कहानी’, ‘माध्यम’ और ‘उत्कर्ष’ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में मेरी कहानियां छपने लगी थीं। समय मिलते ही कनाट प्लेस जाकर टी-हाउस और काफी-हाउस में जाकर चुपचाप लेखक बिरादरी में बैठने लगा था। पूसा इंस्टिट्यूट के भीतर ही किराए के एक कमरे में अपने साथी के साथ रहता था। कभी-कभी इलाहाबाद से प्रसिद्ध लेखक शैलेश मटियानी जी... Read more
राजनाथ सिंह सूर्य

अच्छे संवाददाता के लिए राजनाथ सिंह सूर्य का गुरुमंत्र

उमेश चतुर्वेदीः सलाहकार, आल इंडिया रेडियो समाचार दिल्ली  अरसे से मन उचाट रहता है..इसका असर अपने ऊर्जा स्तर पर पड़ा है..लिखने की तमाम चाहतें होने के बावजूद लिखना थमता जा रहा है... दो दिन पहले वरिष्ठ पत्रकार, स्वतंत्र भारत अखबार के स्वर्णिम दिनों में संपादक रहे राजनाथ सिंह सूर्य का निधन हो गया...उनसे अपना भी कुछ नाता रहा..उनसे सीखा भी हूं...अव्वल तो उनके निधन की खबर सुनते-पढ़ते ही अपना भावोद्रेक उद्घाटित कर देना था...लेकिन उचाटपन की वजह से नहीं कर पाया.. राजनाथ सिंह सूर्य को पढ़ता तो अरसे से था..लेकिन प्रत्यक्ष परिचय हुआ साल 1999 में...इसके माध्यम बने अमर उजाला के तत्कालीन दिल्ली ब्यूरो प्रमुख Prabal Maitraजी...संसद का शीत सत्र चल... Read more
टीवी 9 भारत वर्ष

टीवी 9 भारतवर्ष की समीक्षा क्रमशः खण्डों में

लेखक हैं समरेंद्र सिंह-  टीवी 9 भारतवर्ष की समीक्षा - भाग एक बाजार में नया चैनल आया है टीवी 9 भारतवर्ष. उसके दो कर्ताधर्ता हैं. एक हैं अजीत अंजुम और दूसरे विनोद कापड़ी. मुझे इन दोनों "महान" पत्रकारों के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है. विनोद कापड़ी के साथ दो महीने और अजीत अंजुम के साथ दो साल. इन दोनों ने टीवी न्यूज की दुनिया को बहुत कुछ दिया है. अजीत अंजुम ने सनसनी दी है और विनोद कापड़ी ने खबरों को सनसनीखेज बनाने का तरीका दिया है. जहां तक मुझे याद आता है इन दोनों ने टीवी 9 भारतवर्ष से पहले कभी भी एक साथ काम नहीं किया. इस... Read more
स्वामी सम्पादक

एक स्वामी जो मेरा सम्पादक था…!

हिंदुस्तान समाचार पत्र पटना के स्थानीय सम्पादक नागेंन्द्र प्रताप साझा कर रहे अपनी यादें   1984 का वह ऐसा दौर था, जब मेरे सपने में भी लखनऊ छोड़ने जैसी बात नहीं आई थी. ‘नवजीवन’ से होते हुए ‘दैनिक जागरण’ में आ चुका था और हिंदी पत्रकारिता के ऐसे मुकाम पर था कि जिसकी चर्चा दूर-दूर तक हो रही थी (उस दौर के लखनउवा पत्रकार मित्र ‘एक और अक्टूबर क्रांति’ के उस दौर की तस्दीक करेंगे). ऐसे में एक दिन अचानक माधवकांत मिश्र आए, एक-दो सिटिंग में बतियाए, फिर हम चार लोगों को लेकर पटना चले गए (इस सब में बमुश्किल पन्द्रह-बीस दिन लगे होंगे)। हम चार यानी, मेरे अलावा अशोक... Read more