रचनाकर्म

ममता ब

बंगाली पत्रकार फक्कड़ तो होते हैं पर चोर नहीं

एडीटर अटैक   संदर्भः लंदन में बंगाली पत्रकारों द्वारा चम्मच चोरी हाल ही में ये ख़बर पढ़ने को मिली की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ लंदन गए बंगाली पत्रकारों ने वहां के एक होटल में भोज के दौरान चम्मचें चुराईं। चम्मचें चांदी की थीं। खबर के अनुसार पत्रकारों की ये घटना होटल के सीसीटीवी में कैद हो रही थी। होटल के स्टॉफ ने पत्रकारों को बताया कि आप जो कर रहे हैं वो हम देख पा रहे हैं। होटल स्टॉफ ने पत्रकारों से कहा कि वो चुराई हुई चम्मचें वापस कर दें। अंततः पत्रकारों ने चम्मचें वापस कर दीं, जो उन्होंने अपनी जेबों में रख ली थीं।... Read more
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

शैक्षणिक संस्थाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता पर प्रतिबंध लगेः वेदप्रताप वैदिक

जाने माने पत्रकार वेदप्रताप वैदिक भाषा को लेकर अपनी बात रख रहे हैं। दिलचस्प है। बतातें चलें कि वैदिक ही वो व्यक्ति हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी को सदैव हिंदी बोलने के लिए कहते रहते थे। चाहे वो संयुक्त राष्ट्र का मंच हो या कोई और मंच। इतना ही नहीं वैदिक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे थे। उन्होंने शोध प्रबंध हिंदी में लिखा था। जिसे जेएनयू ने स्वीकार नहीं किया था। अंततः वैदिक भी अपनी बात पर अड़ गए। कोर्ट गए औऱ जीत हुई।  कुल मिलाकर हिंदी भाषा के लिए उनकी लड़ाई जारी है।    2018 में ये 11 काम करें डॉ. वेदप्रताप वैदिक पिछला साल बीत... Read more
एबीपी न्यूज भोपाल के ब्यूरो प्रमुख ब्रजेश राजपूत।

एक जल्दी आया फैसला और उत्साही मीडिया की भूलें

एबीपी न्यूज भोपाल के ब्यूरो प्रमुख ब्रजेश राजपूत मीडिया की वर्तमान स्थिति को एक मामले की कवरेज से जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं। हमेशा दर्शकों को या फिर मीडिया विशेषज्ञों को ये लगता है कि पत्रकार किसी भी दर्दनाक घटना के दौरान कवरेज, बाइट, अनावश्यक सवालों में क्यों उलझे रहते हैं। जैसे गुड़गांव का प्रद्यमन केस। वहां देखने को मिला कि हर चैनल वाला प्रद्यमन के पिता से बात करना चाहता था। कैसे भी, किसी भी कीमत में बात करना चाहता था। नहीं भी राजी तब भी बाइट लेनी ही है। सवाल पूछने ही हैं। प्रद्यमन केस में तो एक अंग्रेजी चैनल की रिपोर्टर प्रद्यमन के पिता से इस बात... Read more
अटल बिहारी बाजपेयी

अटल बिहारी बाजपेयी की कुछ लोकप्रिय कविताएं

ग्वालियर में जन्में अटल बिहारी बाजपेयी मूलरूप से कवि औऱ पत्रकार थे। फिर उन्होंने देश के सर्वोच्च शक्तिशाली पद (प्रधानमंत्री) का भी मान बढ़ाया। वीर अर्जुन, स्वदेश, पांचजन्य के सम्पादक रहे। कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए उनके। उनकी कुछ लोकप्रिय कविताएं।    गीत नया गाता हूँ टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर , पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर, झरे सब पीले पात, कोयल की कूक रात, प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं। गीत नया गाता हूँ। टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी? अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी। हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत... Read more
उदय प्रकाश, कवि, कथाकार

उदय प्रकाश राह चलते पुल बन जाते हैं विश्व साहित्य का

उदय प्रकाश ने विदेश में अपनी यात्रा के दौरान कितना शानदार अनुवाद किया है। पढ़िए   । क़मीज़ ।। मुझे याद है एक बार मैं दौडा था तुम्हारे पीछे और तुम्हारी फहराती हुई क़मीज़ मैंने हवाओं में टाँग दी थी। एक बार, बहुत दिन हुए, मैंने एक भरपूर गिलास कुछ पिया था और तुम्हारी तस्वीर सिहरती हुई उस भरे हुए गिलास के कुछ में फिसल कर तैरने लगी थी। और फिर वह कोई और नहीं, तुम ही तो थीं, जिसे मैंने एक लापरवाह स्त्री की अकेली गुनगुनाहट के संगीत में एक दिन सुना था। एक रात जब दोस्तों के साथ, अलाव की सुर्ख दहकती चिनगारियों के क़रीब बैठा मैं अपनी... Read more
दामिनी यादव

पढ़िए वो कविता जो आजकल सबसे ज्यादा चोरी हो रही है

दिल्ली की पत्रकार व युवा लेखिका दामिनी यादव की शानदार कविता माहवारी बहुत लोकप्रिय रही। लोगों ने बड़ी तारीफ की। पर समस्या ये रही इस कविता के साथ कि तमाम वेबसाईट और सोशल मीडिया में लोग इसे अपने अपने नाम से छाप रहे हैं। साहित्यिक चोरी नई बात नहीं है पर ये निराशाजनक है। इस कविता को बचाने के लिए मीडिया मिरर भी अपनी ओर से लेखिका से आपको मिलवा रहा है ताकि कोई भ्रम न रहे। दामिनी खुद इस कविता की बार बार हो रही चोरी से खासी दुखी हैं। दामिनी तमाम अखबारों से जुड़ी रहीं, किताब भी लिख चुकी हैं।    पढ़िए कविता और तस्वीर में मिलिए कविता... Read more
वो आपत्तिजनक खबर जिसपर बवाल हुआ।

गलत खबर पर अब बख्शे नहीं जाएंगे सम्पादक जी

---- महज दो या 3 दिन पहले की बात है उत्तरप्रदेश के लोकप्रिय न्यूज चैनल हिंदी खबर के पोर्टल पर एक आपत्तिजनक शीर्षक वाली खबर प्रकाशित होती है और उसके बाद पाठकों की ओर से हंगामा मच जाता है। सम्पादक को बचाव के लिए उतरना पड़ता है और गलती भी स्वीकारनी पड़ती है। सीधा सा मतलब ये है कि अब वो दौर नहीं है कि आप अपने चैनल, अखबार या बेवसाईट पर कुछ भी परोसेगें और पाठक स्वीकार कर लेंगे। सम्हल जाइए और आंख कान खोलकर काम कीजिए। ये पब्लिक है सब जानती है।.....   [caption id="attachment_2504" align="alignleft" width="169"] हिंदी समय के सम्पादक की प्रतिक्रिया आपत्तिजनक खबर को लेकर[/caption] अब... Read more
जस्टिस लोया

दिल्ली की मीडिया मौन क्यों है इस रिपोर्ट परः रवीश कुमार

पत्रकार इस रिपोर्ट को छोड़कर बाकी सारी रिपोर्ट धुंआधार तरीके से ट्वीट कर रहे हैं ताकि बर्फ की इस सिल्ली पर जितनी जल्दी हो सके, धूल जम जाए. बहुत मुश्किल से निरंजन टाकले नाम के एक रिपोर्टर ने एक जज की लाश पर जमी धूल की परत हटा कर ये रिपोर्ट छापी है, बहुत आसानी से उस रिपोर्ट को यह दिल्ली बर्फ की सिल्ली के नीचे दबा देना चाहती है. पहाड़ों में जितनी बर्फ नहीं गिरी है उससे कहीं ज़्यादा दिल्ली में सत्ता के गलियारों में बर्फ गिर रही है. दो दिनों से दिल्ली में बर्फ की सिल्ली गिर रही है मगर कोई इसके बारे में बात नहीं करना चाहता.... Read more
चित्तौगढ़ स्थिति रानी पद्मावती महल।

महारानी पद्मावती काल्पनिक हैं तो ढहा दो चित्तौड़ दुर्ग

  हमें काल्पनिक और झूठी कहानियों के सहारे नहीं सुननी क्षत्रियकुल की गौरव गाथाएं ( पद्मावती बनाम मीडियाः राजपूत समाज को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित क्यों है मीडिया)     - विरोधाभाष की बात करें तो संजय लीला भंसाली ने करणी सेना और जयपुर राजपरिवार को लिखित आश्वासन दिया था कि फिल्म का ट्रेलर भी आपको दिखाने के बाद ही रिलीज होगा, पर ट्रेलर रिलीज हो गया और न जयपुर राजघराने से कोई संपर्क किया गया और न ही करणी सेना से। तय बात है जब आप अपनी कही बात से पलट रहे हैं और आपको डर है दिखाने से। तो कहीं कुछ गड़बड़ है जिसे भंसाली चतुराई से प्रस्तुत... Read more
पत्रकारिता व मीडिया

प्रेस का कुशल मंगल किसके लिए

राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश रीवा के वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल का आलेख। जयराम जी कई दैनिक अखबारों में सम्पादक रहे। फिलहाल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के रीवा केंद्र में प्राध्यापक हैं।    संविधान के प्रावधानों से इतर लोकमानस में चौथे स्तंभ के तौरपर स्थापित प्रेस आज भी अन्य स्तंभों से ज्यादा विश्वसनीय, सहज और सुलभ है। समस्याओं से घिरा आम आदमी सबसे पहले अखबार के दफ्तर में जाकर फरियाद करता है। थाने, दफ्तरों और भी सरकारी गैर सरकारी जगहों में जब वह दुरदुराया जाता है तो उसका आखिरी ठिकाना भी प्रेस का ही दफ्तर होता है। यह छपे हुए शब्दों की ताकत है जो प्रेस को तमाम... Read more