रचनाकर्म

दामिनी यादव

दामिनी यादव की 2 कविताएं

बिकी हुई एक कलम... बिकी हुई कलम के दाम बहुत होते हैं पर बिकी हुई कलम के काम भी बहुत होते हैं बिकी हुई कलम को कीचड़ को कमल कहना पड़ता है बिकी हुई कलम को क़ातिल को सनम कहना पड़ता है बिकी हुई कलम को मौक़े पर ख़ामोश रहना होता है और बेमौक़े ‘सरकार की जय’ कहना होता है बिकी हुई कलम एक खूंटे से बंधी होती है बिकी हुई कलम की सियाही जमी होती है बिकी हुई कलम रोती नहीं, सिर्फ़ गाती है बिकी हुई कलम से सच की आवाज़ नहीं आती है बिकी हुई कलम शाहों के तख़्त नहीं हिला पाती है बिकी हुई कलम सिर्फ़ चरण-पादुका... Read more

हिन्दुस्तान अख़बार में छपी यह रिपोर्ट पुलित्ज़र कमेटी को भेजी जानी चाहिए

रवीश कुमार, प्रबंध सम्पादक एनडीटीवी अयोध्या में दीपोत्सव की रिपोर्टिंग ने पत्रकारिता में नए मानक स्थापित किए हैं। यह रिपोर्ट हमें सीख देती है कि अगर सामने भगवान आ जाएं तो उनकी रिपोर्टिंग की शब्दावलियां क्या होंगी। हिन्दुस्तान अख़बार में छपे आदर्श शुक्ल की यह रिपोर्ट पुलित्ज़र कमेटी को भेजी जानी चाहिए। कोलंबिया स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म में इसका अध्ययन होना चाहिए। आदर्श ने उस बात की रिपोर्टिंग की है जो उन्हीं के शब्दों में “सिर्फ महससू किया जा सकता था, बयां करना मुश्किल था।“ भारत में जहां भी पत्रकारिता की पढ़ाई होती है वहां क्लास रूम में इस रिपोर्ट को फ्रेम कर टांग देना चाहिए ताकि युवा पीढ़ी इससे सीखे।... Read more
रवीस

झारखंड के स्वाभिमानी पाठक घरों से अखबार फेंक दें, चैनल बंद कर दें

रवीश कुमार- प्रबंध सम्पादक एनडीटीवी, मैगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित  झारखंड के नौजवानों और पाठकों ने क्या फ़ैसला किया है? आपने देखा कि राज्य सरकार ने विज्ञापन निकाला है कि अख़बारों में काम करने वाले पत्रकार सरकारी योजनाओं की तारीफ़ में लिखने के लिए आवेदन करें। उन्हें एक लेख के 15000 दिए जाएंगे। इसके अलावा 5 हज़ार की प्रोत्साहन राशि भी। ऐसे 30 लेख छपेंगे। सरकार के डर से वहां के अख़बार वैसे ही ख़त्म हो चुके हैं। अख़बार पर दबाव भी होगा कि पत्रकार का लेख छापें। बाद में उन लेखों का संग्रह छापा जाएगा और अख़बार और पत्रकार का नाम दिखाकर दावा होगा कि हमारी योजनाएं ज़मीन पर अच्छा... Read more
किताबें

किताबें करीब लाती हैं- दामिनी यादव

सरेराह, मैट्रो या दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट में, किसी पब्लिक प्लेस पर भीड़ में या अकेले बैठे हुए, आज हम जहां भी नज़र दौड़ाते हैं, हर दूसरे व्यक्ति को नहीं, बल्कि लगभग-लगभग सभी को ही सर झुकाए, फोन की दुनिया में गुमशुदा देखते हैं। इसी के चलते ये घोषणाएं भी ज़ोर-शोर से सुनाई पड़ती हैं कि पूरी दुनिया पर तकनीक इस कदर हावी है कि किताबों की दुनिया महज़ कुछ रोज़ की मेहमान है और आख़िरी सांसें गिन रही है। वाक़ई! मैं सच से नहीं भाग रही, मगर मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे नहीं लगता कि इस दुनिया से किताबों का वजूद मिटने वाला है। मैं ये नहीं कह रही कि... Read more
बीबीसी

एक कश्मीरी लड़की की पाँच दिन की डायरी

मिसबाह रेशीछात्रा, दिल्ली विश्वविद्यालय फ़ेक न्यूज़ की ताक़त और उसके प्रसार का अंदाज़ा तभी होता है जब आप संघर्ष वाले इलाक़े में हों, जहां हिंसा और विश्वासघात दोनों हो रहे हों, तब आपको किसी सूचना के सही होने पर भी विश्वास नहीं होता. शुक्रवार से सोमवार शाम तक हम अलग-अलग लोगों से कश्मीर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए जाने और यात्रियों-ग़ैर-कश्मीरियों से कश्मीर छोड़ने की अपील की अलग-अलग वजहें सुन रहे थे. लेकिन हमें कोई जानकारी नहीं थी. कुछ लोग यह कह रहे थे कि राज्य को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. कश्मीर को केंद्र प्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जम्मू को राज्य का दर्जा दिया... Read more
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

सरकार क्या बदली सरकार ही बन गए माखनलाल के ठाकुर साब

एडीटर अटैकः प्रशांत राजावत   मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से उड़ती उड़ती नहीं बल्कि चलती फिरती खबरें आ रही हैं कि वहां के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक ठाकुर साब प्रदेश में सरकार बदलते ही खुद सरकार बन बैठे हैं। सच है कि उन्हें बड़े पद से सरकार ने नवाजा है और वरिष्ठ अध्यापक हैं लेकिन ऐसे थोड़े न होता है..ठाकुर साब दिग्विजय सिंह और कमलनाथ से तो नीचे बात ही नहीं करते। ऐसी चलती फिरती खबरें हैं। हालांकि संघ काल में ये उपेक्षित महसूस कर रहे थे लेकिन उपेक्षित न थे। अब ये सर्वशक्तिमान की तरह दिख रहे हैं। कभी कभी तो कुलपति पर भी हावी हो जाते... Read more
कार्टून बीबीसी से

राजसत्ता पत्रकारिता से क्यों डर रही है?

रामशरण जोशी, वरिष्ठ पत्रकार लगता है, राजसत्ता के कर्ताधर्ताओं ने लोकतांत्रिक राज्य के चौथे स्तंभ मीडिया को सबक़ सिखाने की ठान रखी है. देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश की पुलिस ने दिल्ली-नोएडा क्षेत्र से तीन मीडिया कर्मियों को गिरफ़्तार किया. उन्हें 14 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. और एक पत्रकार के ख़िलाफ़ उत्तरप्रदेश में ही एफ़आईआर दर्ज करा दी गई है. देश के संपादकों की सबसे बड़ी संस्था 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया' ने गिरफ़्तारियों की कड़ी निंदा की है और पुलिस की कार्रवाई को क़ानून का निरकुंश दुरूपयोग क़रार दिया है. मुख़्तसर से, इन पत्रकारों का अपराध यह है कि इन्होनें महंत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ... Read more
दैनिक जागरण

कठुआ केस में दैनिक जागरण को बरी कौन करेगा?

एडीटर अटैकः    दैनिक जागरण को अब तो अपने पाठकों से इस मुख्य खबर के लिए माफी मांग लेनी चाहिए। अखबार में वैसी ही प्रमुख जगह पर और पहला सम्पादकीय लिखकर। अपनी गलतियों के लिए माफी मांगने में हिचकना नहीं चाहिए। किसी को भी नहीं ः सत्यानंद निरूपम, सम्पादक, राजकमल प्रकाशन    कल कठुआ मामले पर कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। गौरतलब है कि बच्ची के साथ दुष्कर्म औऱ हत्या के जिस मामले को बेहद संगीन मानते हुए कोर्ट ने कल फैसला दिया है उसको भारत के सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी अखबार दैनिक जागरण ने नकार दिया था। दैनिक जागरण ने पहले... Read more
गिरीश कर्नाड

बहुमुखी प्रतिभा और संकल्प का धनी अनूठा कलाकार

महान रंगकर्मी, फिल्मकार और अभिनेता गिरीश कर्नाड का 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे भारत के एकमात्र व्यक्ति थे, जिन्हें अमेरिका से भारत में हिंसा विषय पर शोध करने के लिए धन उपलब्ध कराया गया था। उन्हें रोड्स स्कॉलरशिप मिली थी। उनका नाटक ‘हयवदन’ यह रेखांकित करता है कि जीवन में संपूर्णता की खोज एक महान आदर्श है परंतु यथार्थ यह है कि हम सब आधे अधूरे लोग हैं। एक कवि और पहलवान में गहरी मित्रता है परंतु एक ही स्त्री से प्रेम के कारण वे प्रतिद्वंद्वी हो जाते हैं। बियाबान में एक मंदिर के सामने वे एक-दूसरे से लड़ते हैं और दोनों के सिर धड़ से... Read more
‘टाइम’ कवर- मोदी,

‘टाइम’ मैगजीन, तुम पत्रकारिता कर रहे हो या दलाली?

गिरीश उपाध्‍याय  वैसे तो इस विषय पर कल यानी 30 मई को ही लिखा जाना चाहिए था जिस दिन ‘हिन्‍दी पत्रकारिता’ दिवस मनाया जाता है, लेकिन देर आयद दुरुस्‍त आयद। एक दिन बाद लिखने से भी विषय के महत्‍व और उसकी प्रासंगिकता पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। क्‍योंकि पत्रकारिता से जुड़ा यह मामला ही ऐसा है जिस पर सिर्फ एक खास दिन तो क्‍या, चौबीसों घंटे सोचा जाना चाहिए। प्रसंग अमेरिका से प्रकाशित होने वाली दुनिया की सबसे चर्चित पत्रिका ‘टाइम’ से जुड़ा है। आपको याद होगा भारत में जब चुनाव चल रहे थे तब मई के अंक में इस पत्रिका ने अपने एशिया एडिशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी... Read more