रचनाकर्म

रवीश

हिन्दी के अख़बार हिन्दी के पाठकों की हत्या कर रहे हैं

ख़बर नहीं बस ख़बरों के नाम पर अख़बार छपता है, हिन्दुस्तान छपता है रवीश कुमार, एनडीटीवी गर्त इतना गहरा हो गया है कि बात में तल्ख़ी और सख़्ती की इजाज़त मांगता हूं। आप आज का हिन्दुस्तान अखबार देखिए। फिर इंडियन एक्सप्रेस देखिए। एक्सप्रेस का पहला पन्ना बताता है कि देश में कितना कुछ हुआ है। घटनाओं के साथ पत्रकारिता भी हुई है। एक्सप्रेस के पहले पन्ने की बड़ी ख़बर है कि भूपेन हज़ारिका के बेटे ने भारत रत्न लौटा दिया है। रफाल डील होने से दो हफ्ता पहले अनिल अंबानी ने फ्रांस के रक्षा अधिकारियों से मुलाकात की थी। हिन्दुस्तान का पहला पन्ना बताता है कि भारत में दो ही... Read more
रवीश कुमार

चैनल देखना बंद कर दें, ये चुनाव के नाम पर टाइम काट रहे हैं

रवीश कुमार, कार्य़कारी सम्पादक एनडीटीवी  मैं एक सामान्य दर्शक की तरह नहीं सोच पाता हूं। नहीं समझ पाता कि एक दर्शक का सामान्य होना क्या होता है। क्यों वह सतही और घटिया कंटेंट देखता है? क्या टीवी ने आपको इतना सामान्य बना दिया है कि आपको इस टीवी के कारण आपके भीतर और लोकतंत्र के भीतर आ रहे संकटों का अहसास ही नहीं होता है? आपके भीतर का ख़ालीपन और खोखलापन ही लोकत्तंत्र का ख़ालीपन और खोखलापन है। क्या आप कभी महसूस कर पाते हैं कि न्यूज़ चैनल किस तरह आपको सूचना विहीन बनाते जा रहे हैं। एक ही तरह के दृश्य बार-बार दिखाकर आपको दृश्यविहीन बनाते जा रहे हैं।... Read more
हिंदु समूह के एन राम

एन राम को पत्रकारिता मत सिखाइए अब…

एडीटर अटैक - प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर  इस बात को एकदम भूल जाइए कि एन राम यानि नरसिम्हन राम ने क्या छापा और क्यों चर्चा में हैं। सबसे पहले ये बात जान लीजिए कि एन राम उस अंग्रेजी दैनिक अखबार के सम्पादक हैं जो वर्जन नहीं छापता कि एसपी ने कहा है, या डीसी ने कहा है। बस इतना जान लीजिए हिंदू ने कहा बस इतना काफी होता है। हिंदू के रिपोर्टर ने लिख दिया वो लकीर हो गई पत्थर की। उसपर फिर किसी वर्जन की आवश्यक्ता नहीं होती। हिंदू के बारे ये प्रचिलित है। अब आइए एन राम पर। एन राम अभी बीजेपी वालों को चुभ सकते हैं... Read more
अंशु मालवीय

वे कविता पढ़ रहे थे और उनकी पुलिस कवि को अगवा कर रही थी

यूपी सरकार की पुलिस एक कवि अंशु मालवीय को अपहर्ताओं की तरह एक कार्यक्रम के बीच से उठा कर गाड़ी में डाल कर कहीं ले जा रही थी. प्रियदर्शन की कलम से- जिस समय लोकसभा में राष्ट्रपति के भाषण पर चर्चा का जवाब देते समय अपनी पीठ ठोकते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना नाम लिए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पंक्तियां दुहरा रहे थे- कि मैं सूरज को डूबने नहीं दूंगा, लगभग उसी समय झूंसी में यूपी सरकार की पुलिस एक कवि अंशु मालवीय को अपहर्ताओं की तरह एक कार्यक्रम के बीच से उठा कर गाड़ी में डाल कर कहीं ले जा रही थी. अंशु मालवीय गीत और कविता की... Read more
media mirror

विश्वविद्यालय में हुई साक्षात्कार की नौटंकी

 एडीटर अटैकः प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर .. अभी 6 फरवरी को ही यानी 2 दिन पहले ही फरीदाबाद स्थित एक सरकारी विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के लिए साक्षात्कार देने गया था। पत्रकारिता विभाग में अध्यापन के लिए विज्ञापन निकाला था विश्वविद्यालय ने। अपन वही पढ़कर पहुंचे थे। वाक इन इंटरव्यू था। रिज्यूमे के साथ सभी दस्तावेज, अनुभव प्रमाण-पत्र, शोध पत्र की मूल प्रतियों के साथ बुलवाया गया था। 2 पासपोर्ट साइज तस्वीर भी मांगी थीं। विज्ञापन में ये भी लिखा था कि अगर आपका चयन किया गया तो आपको तत्काल ज्वाइन करना होगा। पद की संख्याओं का जिक्र नहीं था विज्ञापन में। हां योग्यता में नेट, पीएचडी अनिवार्य था।... Read more
कुंभ

कुंभ, तकनीक, कैमरा और इतिहास रचते लोग

धनंजय चोपड़ा सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज में शुरू हुआ इस बार का कुंभ पहले से काफी अलग है। संगम पर हो रहा स्मार्टफोन युग का यह पहला कुंभ है। कुछ साल पहले हरिद्वार में हुए कुंभ के दौरान भी स्मार्टफोन प्रचलन में थे, लेकिन इनका जितना व्यापक प्रसार इस समय है, पहले नहीं था। संगम की रेती पर टेक्नोलॉजी का रोमांच कुछ अलग ही आभा देता है। यही वजह है कि इस रोमांच को हर कोई अपनी स्मृतियों में दर्ज कर लेना चाहता है और करे भी क्यों न, जब उसके हाथ में नई दुनिया का एक नायाब तोहफा ‘मोबाइल कैमरा’ हो। इतिहास का यह पहला कुंभ... Read more
प्रियंका गांधी

प्रियंका को इंदिरा मत बनाओ

एडीटर अटैक- प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर  सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया, चैनल्स, अखबार, वेबसाइट्स हर जगह एक ही नाम नजर आ रहा है। और वो है प्रियंका (गांधी)। प्रियंका की खबरें जैसे जैसे गति ले रही हैं। जो सबसे प्रमुख बात निकल कर सामने आ रही है। वो है उनकी इंदिरा गांधी से तुलना। ठीक बात है इंदिरा की पोती हैं। तुलना करना नाजायज नहीं और इंदिरा कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं थीं कि तुलना से कोई नुकसान होने वाला है। लेकिन इंदिरा से तुलना अगर हम कर बैठे तो इंदिरा को देश ने खो भी दिया था। प्रियंका को प्रियंका ही रहने दो। जानी मानी राजनीतिक विश्लेषक... Read more
media mirror

गिद्धों की तरह शिकार करती मीडिया

वुसअतुल्लाह ख़ान, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए दो रोज़ पहले पाकिस्तानी पंजाब के शहर साहिवाल के क़रीब हाईवे पर एक गाड़ी में सवार सात में से चार यानी मां-बाप-बेटी और गाड़ी ड्राइव करने वाला फ़ैमिली फ़्रेंड पुलिस ने चरमपंथी होने के शक में गिरफ़्तार करने की बजाय उन्हें मार डाला. सरकार ने जैसे कि रिवाज है तुरंत एक जांच कमेटी बना दी. अब एक और रिपोर्ट आएगी. कुछ पुलिसवाले सस्पेंड होंगे और चंद दिनों में यह मामला भी ऐसे पिछले कई मामलों की तरह इधर-उधर हो जाएगा. मगर ऐसे मामलों में मीडिया खोज लगाने की होड़ में जिस बुरी तरह से एक्सपोज़ होती है वह भी किसी एनकाउंटर... Read more
रामनाथ गोयनका

मीडिया पुरस्कार चैय्ये.. सबसे प्रतिष्ठित वाला

[caption id="attachment_3921" align="alignleft" width="100"] प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर[/caption] एडीटर अटैक प्रशांत राजावत- सम्पादक मीडिया मिरर  सर्दी में साहित्य का मेला सजता है, किताबों का मेला भी। तो वहीं अवार्ड फंक्शन भी इन्ही दिनों परवान चढ़ते हैं। अभी हमसब रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार से रीते नहीं हैं कि एक औऱ निजी संस्थान की ओर से मीडिया अवार्ड देने की घोषणा की गई। इसीक्रम में भारतीय जनसंचार संस्थान भी अवार्ड के लिए आवेदन पत्र निकाल चुका है। अपने जयपुर वाले जेएलएफ में तो अवार्ड मिलते ही हैं। दरअसल मुझे इस विषय पर लिखने का ख्याल कुछ ऐसे आय़ा कि रामनाथ गोयनका पुरस्कार की सूची जब मैं इंडियन एक्सप्रेस में देख रहा... Read more
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रवीश कुमार।

क्या 2019 में टीवी के दर्शकों को कोई काम नहीं है

एनडीटीवी के कार्यकारी सम्पादक रवीश कुमार की कलम से  कहीं से घूमते-फिरते हुए आकर बैठे और बिठाए गए ये लोग गिनती में दो, चार, छह और कभी-कभी दस भी होते हैं। कई साल से आते-आते इनके चेहरे पर टीवी की ऊब दिखने लगी है। जो नया आता है वो भी इसी टाइप के टीवी को देखते-देखते ऊबा हुआ लगता है। बहस के दौरान कोई मेज़ पर पसर जाना चाहता है, कोई कुर्सी पर पीछे तक झुक कर पीठ सीधी कर लेना चाहता है। कुछ वक्ता तो बोलते वक़्त सोते नज़र आते हैं और कुछ को बोलते हुए सुनकर सोने का मन करने लगता है। किसी के कान से स्काइप की... Read more