रचनाकर्म

प्रीति राघव

रचनाकर्म में इस बार प्रीति राघव की चुनिंदा कविताएं

प्रीति आहिस्ता आहिस्ता हिंदी काव्यक्षेत्र में अपनी रचनाओं को विस्तार दे रहीं हैं। लम्बी और छोटी कविताएं, गद्यरूपी कविताएं लिख रही हैं। उन्होंने अपनी कविताओं की अभी दिशा और विषय दोनों ही तय नहीं किए। उन्मुक्त लिखे जा रहीं हैं और यही एक विद्यार्थी कवि की पहचान है। गुड़गांव रहती हैं। साहित्य में योगदान के लिए साहित्य सारथी सम्मान मिल चुका है। हिंदी साहित्य से परा स्नातक हैं। प्रीति की कविताएं कभी उनके कल्पनालोक की सैर कराएंगी तो कभी आपको ऐसा लगेगा कि वो बड़ी ही सहजता से अपने अंतर्मन के पन्नों को सार्वजनिक कर रहीं हैं। सीधी सपाट कविताएं लिखती हैं। उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं मीडिया मिरर लेकर आया... Read more
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

चीन के 20 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती हैः वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक बता रहे भाषा का महत्व। कैसे भाषा ज्ञान के अभाव और विस्तार से हानि और लाभ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भी हो सकते हैं।   चीनी के लगभग 20 विश्वविद्यालयों में बाकायदा हिंदी पढ़ाई जाती है। मैं चीन में ऐसे हिंदी विद्वानों से भी मिला हूं, जो हिंदी में पीएच.डी. हैं और जिन्होंने हमारे अनेक शास्त्रीय और काव्य-ग्रंथों का चीनी अनुवाद किया है। मैं जब भी चीन जाता हूं, चीनी सरकार से मैं हमेशा हिंदी-चीनी दुभाषिए की मांग करता हूं। जब प्रधानमंत्री नरसिंहराव चीन गए थे तो मैंने एक मित्र हिंदी प्रोफेसर को उनका दुभाषिया तय करवाया था। भारत का दुर्भाग्य है कि हमारे नेता भाषा... Read more
ज्योति जैन

सेव-गुलाब जामुनः युवा कहानीकार ज्योति जैन के पहले कहानी संग्रह से एक कहानी

ज्योति जैन के बारे मेंः- दुनिया के बनाये रास्तों पर चलने से ज़्यादा अपनी ख़ुद की बनाई पगडंडी पर चलने में विश्वास करने वाली लेखिका ज्योति जैन, राजस्थान से हैं । ईश्वर ने सांसें दी और अब ये बैठकर हर सांस में शब्द पिरो रही हैं। कोई बड़ी ख्वाहिशात नहीं पालती लेकिन खुद के फैसलों के परों से उड़ने के अपने हक को भी नहीं छोड़ती। कई पत्रिकाओं में लेख लिखने के साथ ही अंग्रेजी के दो काव्य संग्रह (anthology) “राइम्स एण्ड रीद्म्स” और “लाईफनामा” में कुछ पन्नें इन्होनें अपने शब्दों से रंगे है। भटकने की शौकीन जब कहीं नहीं होती है तो अपने ब्लॉग या पेज पर होती है।... Read more

माँ की जर्जर आवाज़ ने उतारा मुझे स्टेज़ पर: चार्ली चैपलिन

चार्ली चैपलिन की आत्मकथा का अनुवाद, युवा लेखक और अनुवादक गीत चतुर्वेदी द्वारा   चार्ली चैपलिन --------------- 1889 में मेरे पैदा होने के एक साल बाद, मेरे मां-पिता में अलगाव हो गया। इस अलगाव के पीछे मेरे पिता की बदनाम शराबख़ोरी के अलावा भी कोई कारण था, मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं। लेकिन मां ने बच्चों के पालन-पोषण के लिए गुज़ारे भत्ते की मांग नहीं की। वह ख़ुद रंगमंच की बड़ी सितारा थी, हर हफ़्ते लगभग पचीस पाउंड कमा लेती थी, जो कि हमारे गुज़ारे के लिए काफ़ी था। जब उस पर बदनसीबी का पहाड़ टूटा, तभी वह इतनी मजबूर हुई कि गुज़ारे के लिए उसे पिता से... Read more
प्रतिभा चौहान के नए कविता संग्रह की चुनिंदा कवितायेँ

प्रतिभा चौहान के नए कविता संग्रह की चुनिंदा कवितायेँ

[caption id="attachment_1783" align="alignright" width="188"] प्रतिभा चौहान का नया कविता संग्रह[/caption] बिहार न्यायिक सेवा में न्यायाधीश प्रतिभा चौहान कुशल  लेखिका भी हैं। कवितायेँ और कहानी उनकी अक़्सर हम पत्र-पत्रिकाओं में देखते हैं। हाल ही में उनका कविता संग्रह पेड़ों पर मछलियाँ बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके हालिया प्रकाशित इस संग्रह से कुछ चुनिंदा कवितायेँ मीडिया मिरर आपके लिए लाया है।   सदी की सबलिमिटी     राष्ट्र  की कोख में  तुम्हारा वर्तमान शब्द आने वाले इतिहास का नया कल है गूँज है सदियों की  प्रकृति का विस्तार है आक्रोश है धरा के वीरों का  उगो , बह जाओ  हिमालय की नोक से  गूँजो , तीव्र स्वरों की गहराई से ... Read more
पंडित प्रेम बरेलवी

पत्रकार और शायर पंडित प्रेम बरेलवी की कुछ चुनिंदा ग़ज़लें

 पंडित प्रेम बरेलवी  बरेली उत्तरप्रदेश से हैं दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं हिंदी दैनिक अख़बार में। उनकी कुछ चुनिंदा ग़ज़लें अब तक पंडित प्रेम बरेलवी  : ग़ज़लों के अलावा कविता, गीत, छंद, दोहे भी लिखे। देश के कई राज्यों में मुशायरों एवं कवि सम्मेलनों में शायर के रूप में ग़ज़ल/कविता पाठ। 17 साल की अवस्था में आकाशवाणी के बरेली केंद्र से प्रसारित कविता पाठ के कार्यक्रम युवा मंच से दो बार सम्मानित। जिला स्तर पर 20 वर्ष की अवस्था में मैथिली शरण गुप्त सम्मान। कॉलेज में सम्मान। कई प्रदेशों में मंच से सम्मानित। आकाशवाणी नई दिल्ली के युव वाणी पर स्क्रिप्ट राइटर, उद्घोषक एवं शायर के रूप में दर्जनों कार्यक्रमों में अग्रणी... Read more
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद रमेश पोखरियाल निशंक

आज ज़रूरत बन गई है सोशल मीडिया : रमेश पोखरियाल निशंक

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद रमेश पोखरियाल निशंक अपने राजनीतिक जीवन से पूर्व सक्रिय पत्रकार रहे हैं। कवि हैं। कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं निशंक जी के। सोशल मीडिया पर शानदार आलेख उनकी कलम से।   एक समय था कि जब हमें खबरों के लिए 7 से 15 दिनों का इन्तजार करना पड़ता था फिर दैनिक, साप्ताहिक पत्र - पत्रिकाओं , रेडियो, टीवी आदि के बाद आज हम आधुनिकता की उस दहलीज पर खड़े हैं जहां हमें अब ख़बरों का इन्तजार नहीं करना पड़ता है बल्कि पल-पल की खबरें हमारे स्मार्ट फोन के मार्फत हमारे छोटी सी जेब में हर पल उपलब्ध रहती है । जबरदस्त प्रतिष्पर्धा के इस... Read more
सतीश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार मुम्बई

ये है जनसंचार क्रांति का युग !

अखबारों के E-paper संस्करण को मिलनेवाले पाठकों और हिट्स की संख्या में हर दिन होते विस्तार ने प्रिंट मीडिया की नींद उड़ा दी है। Transformation का एक ऐसा ही दौर डेढ़-दो दशक पहले पत्रिकाओं में भी आया था। पत्रिकाएं नहीं संभल पाईं और वजूद खो बैठीं। ऐसे परिदृश्य पर चर्चा करता 1 जुलाई, 2017 का मेरा साप्ताहिक कॉलम "अपनी नजर से"।   ये है जनसंचार क्रांति का युग !"दैनिक और पत्रिकाओं का तो बदल गया सब सार, पांच मिनट में पढ़ लेते हैं, दस पन्नों का अखबार।" यह दो पक्तियां आज के दौर की सबसे बड़ी सचाई हैं। 30 मई, 1826 को प्रकाशित हुए भारत पहले अखबार ‘उदंत मार्तंड’ से... Read more
वर्तिका अशोक

वर्तिका की कविता

 वर्तिका अशोक मूलरूप से आजमगढ़ की हैं। नेटवर्क 18 दिल्ली में उप सम्पादक हैं। शहरी रोज़गार के लालच में खत्म होते गांव, खेत, खलिहान का मार्मिक वर्णन कविता के माध्यम से। अपनी जड़ें काट के आए खुद, खुद को अनाथ कर आए। बाबा का वो गाँव का घर, कल उसे किसी को सौंप के आए। लगा मसहरी, जिस दालान में करते थे दद्दा कटबइठी, वो दालान, वो मचिया-मसहरी सब बातें-यादें छोड़ के आए। जिस बगिया में, हर गर्मी खेले पेड़ वो सारे, भेज टाल पे हम अपना बचपन बेच के आए। देहरी, ओसारा महुआ, कुँआ कच्चे आँगन का, मन पक्का कर हम कल सौदा कर आए। अपनी जड़ें काट के... Read more
विभा परमार

विभा परमार की कवितायेँ

विभा अपने शब्दों को, अपनी कल्पनाओं को दिनों दिन विस्तार देती जा रही हैं। जो सुन्दर कविताओं के रूप में प्रकट होते हैं। धीरे धीरे वो साहित्य जगत में अपना स्थान बना रही हैं। मूलरूप से बरेली की हैं।  उनकी एक कविता आज वो मिली थी सड़कों पर मुझे जो रिस रही थी धीरे धीरे खुद से नाराज़ सी लगी कभी चुप, कभी ख़ामोश सी हो जाती कुछ डरी डरी और कुछ सहमी सहमी सी  देखकर मुझे और दूर जाने लगी और कहने लगी मैं भी तुम इंसानों के अंदर पाई जाती थी और तुमने मुझे भावना का नाम दिया था जिसमें रहती थी संवेदनायें पर जैसे जैसे तुम्हारे अंदर... Read more